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बहाने पर ज़माना चल रहा है-ग़ज़ल

1222 1222 122

बहाना ही बहाना चल रहा है
बहाने पर ज़माना चल रहा है

बदलना रंग है फ़ितरत जहाँ की
अटल सच पर दिवाना चल रहा है

नही गम में हँसा जाता है फिर भी
अबस इक मुस्कुराना चल रहा है

निवाला बन गया अपमान मेरा
ये कैसा आबो दाना चल रहा है

वफा मेरी मुनासिब है तो फिर क्यों
अगन सेआजमाना चल रहा है

नहीं रिश्ता है पहले-सा हमारा
मग़र मिलना-मिलाना चल रहा है

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार on January 24, 2018 at 6:40pm

आदरणीय लक्षमण धामी सर,उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 24, 2018 at 3:20pm

अच्छी गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by सतविन्द्र कुमार on January 20, 2018 at 9:29pm

आदरणीय बृजेश भाई जी हौंसलाफ़ज़ाई के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by सतविन्द्र कुमार on January 20, 2018 at 9:26pm

आदरणीय बसन्त कुमार शर्मा जी,उत्साहवर्धन के लिए सादर हार्दिक आभार

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 20, 2018 at 2:46pm

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय..

Comment by बसंत कुमार शर्मा on January 18, 2018 at 9:42pm
  • उम्दा अशआर , वाह आनन्द आ गया 
Comment by सतविन्द्र कुमार on January 17, 2018 at 11:56pm

आदरणीय नीलेश भाई जी अनुमोदन एवं प्रोतसाहन के लिए बहुत बहुत हार्दिक आभार।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 17, 2018 at 9:52pm

वाह वा.. आ. सतविंदर जी..अच्छी ग़ज़ल और उम्दा इशारों के लिए बधाई 

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