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सतविन्द्र कुमार's Blog (107)

बढ़े तो दर्द अक्सर टूटता है-ग़ज़ल


1222 1222 122
बढ़े तो दर्द अक्सर टूटता है
अबस आँखों से झर कर टूटता है

गुमाँ ने कस लिया जिस पर शिकंजा
भटकता है वो दर-दर,टूटता है

नहीं गम घर मेरे आता अकेले
कि वो तो कोह बनकर टूटता है

सुने गर चीख बच्चे की तो देखो
रहा जो सख़्त पत्थर टूटता है

बजें बर्तन हमेशा साथ रह कर
भला इनसेे कभी घर टूटता है

मौलिक अप्रकाशित

अबस:बेबस

कोह:पहाड़

Added by सतविन्द्र कुमार on January 21, 2018 at 9:00pm — 2 Comments

बहाने पर ज़माना चल रहा है-ग़ज़ल

1222 1222 122

बहाना ही बहाना चल रहा है
बहाने पर ज़माना चल रहा है

बदलना रंग है फ़ितरत जहाँ की
अटल सच पर दिवाना चल रहा है

नही गम में हँसा जाता है फिर भी
अबस इक मुस्कुराना चल रहा है

निवाला बन गया अपमान मेरा
ये कैसा आबो दाना चल रहा है

वफा मेरी मुनासिब है तो फिर क्यों
अगन सेआजमाना चल रहा है

नहीं रिश्ता है पहले-सा हमारा
मग़र मिलना-मिलाना चल रहा है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on January 17, 2018 at 6:16pm — 6 Comments

कुंडलियां

कुण्डलियाँ



१.

मिलना-जुलना जान लो,है रिश्तों को खाद

स्नेह-मिलन होता रहे,चखें नेह का स्वाद

चखें नेह का स्वाद,बात औरों की जानें

करकें बातें चार,स्वयं को अच्छा मानें

'सतविंदर' इस स्नेह,की न हो सकती तुलना

पनपें एक्य विचार,रहे यदि मिलना-जुलना।।



२.

समरथ हैं बस देवता,सच्चे रचनाकार

गीत गजल संगीत के,हैं अच्छे फ़नकार

हैं अच्छे फ़नकार,रचें नित न्यारी माया

इनका हर सद्कर्म, ज़माने को है भाया

'सतविंदर' कविराय,करो न प्रयास… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on January 15, 2018 at 9:31am — 8 Comments

एक जुगनू भी है दीपक तीरगी में- गजल



2122 2122 2122

इश्क में, व्यापार में या दोस्ती में

दिल दिया है हमने अपना पेशगी में

बूँद भर भी आब काफी तिश्नगी में

एक जुगनू भी है दीपक तीरगी में

ठोकरें खाकर नहीं सीखा सँभलना

क्या मज़ा आएगा  ऐसी जिन्दगी में

दर्द,आंसू,बेबसी के बाद भी क्यों

मन रमा रहता हमेशा आशिकी में

किस जमाने…

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Added by सतविन्द्र कुमार on January 9, 2018 at 8:30pm — 10 Comments

मत्त सवैया छंद

16,16 पर यति,चार पद, दो-दो पद समतुकांत

बढ़ती जाती है आबादी,रोजगार की मजबूरी है

पैसे की खातिर देख बढ़ी,किस-किस से किसकी दूरी है

उस बड़े शहर में जा बैठे, घर जहाँ बहुत ही छोटे हैं

विचार महीन उन लोगों के, जो दिखते तन के मोटे हैं

पहले गाँवों में बसते थे,घर आँगन मन था खुला-खुला

थोड़े में भी खुश रहते थे,हर इक विपदा को सभी भुला

कोई कठिनाई अड़ी नहीं,मिल उसका नाम मिटाते थे

जो रूखा-सूखा होता था,सब साथ बाँट कर खाते थे

तब धमा चौकड़ी होती…

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Added by सतविन्द्र कुमार on December 25, 2017 at 2:21pm — 12 Comments

मोम नहीं जो दिल पत्थर है-ग़ज़ल

22 22 22 22

मोम नहीं जो दिल पत्थर है
उसका चर्चा क्यों घर-घर है?

मंजिल को पा लेता है वो
जिसने साधी खूब डगर है

लोग पुराने बात पुरानी
फिर भी उनका आज असर है

देख! सँभलना उसने सीखा
जिसने भी खायी ठोकर है

होठों पर मुस्कान भले हो
दिल में गम का इक सागर है

माना सच होता है कड़वा
'राणा' कहता ख़ूब मगर है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on December 16, 2017 at 8:00pm — 20 Comments

राजमार्ग का एक हिस्सा(लघुकथा)

राजमार्ग का एक हिस्सा(लघुकथा)



भारी गाड़ियों के आवागमन से कम्पित होता,तो कभी हल्की गाड़ियों के गुजरने से सरर्सराहट महसूस करता हूँ।  घोर कुहरे में  इंसानों की दृष्टि जवाब दे जाती है, मगर मैं दूर से ही दुर्घटना की संभावना  को भांपकर सिहर उठता हूँ।



देखता हूँ नई उम्र को मोटरसाइकिलों पर करतब करते निकलते हुए। बेपरवाही जिसके शौंक में शामिल है।



हाल ही की  तो बात है,ऐसा करते हुए उस किशोर की बाइक गिर कर कचरा हो गई थी। पीछे से आते ट्रक ने दल दिया था उसे। मेरा काला शख्त सीना… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on November 30, 2017 at 11:42pm — 16 Comments

तालिका छंद

तालिका छंद
सगण सगण(112 112)
दो-दो चरण तुकांत
---
दिन रात चलें
हम साथ चलें
सह नाथ रहें
सुख दर्द सहें

बिन बात कभी
झगड़े न सभी
मन प्रेम भरें
हरि कष्ट हरें

शुभ काम करो
तब नाम करो
सब वैर तजो
हरि नाम भजो

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on November 12, 2017 at 7:43am — 14 Comments

उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था-ग़ज़ल

2122 1212 22/112



उनका बस इन्तिज़ार अच्छा था

यार मैं बे क़रार अच्छा था



गम रहा जो क़रीब दिल के बहुत

वो ख़ुशी से हज़ार अच्छा था



कौन कातिल था देख पाया नहीं

तेज़ नजरों का वार अच्छा था



मेरी उम्मीद तो रही कायम

तेरा झूठा ही प्यार अच्छा था



सौदा दिल का किया हमेशा ही

उनका वो रोज़गार अच्छा था



देख कर जीत की खुशी उनकी

हारना उनसे यार अच्छा था



खीझ कर माँ पसीजना तेरा

मार पर वो दुलार अच्छा… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on November 9, 2017 at 10:13pm — 12 Comments

तरही गजल

तरही गजल
2122 1212 22

बिन किसी बात रूठ जाने का
क्या करें उनके इस बहाने का?

चैन मिलता है जिसको गम देकर
छोड़ता मौका कब सताने का।

ज्यों क़दम आपके पड़े तो लगा
*बख़्त जागा ग़रीब खाने का*।

जह्र देकर मिज़ाज पूछ रहे
देखो अंदाज आजमाने का।

यूँ भी दीपक कोई जले यारो
हक मिले सबको मुस्कुराने का।


मैल दिल से नहीं गया तो बोल
फाइदा ही क्या आने जाने का

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on November 5, 2017 at 10:00pm — 10 Comments

एक ग़ज़ल

122 122 122 122



न तकरार समझी न समझा गिला है

बुरी आदतों का यही फाइदा है



गलत ही तलाशा था मय में नशे को

निगाहों में जबके नशा ही नशा है



न अल्फाज कुछ भी बयां कर सकें हों

जो दिल में बसा आँखों से दिख रहा है



ये चेहरे पे रौनक न जाने है कैसे

जिगर जबकि छलनी हमारा हुआ है



किसी तिफ्ल के रूठ जाने से सीखें

भुलाना किसी को अगर सीखना है



बना लो मुहब्बत को औजार यारो!

शज़र नफरतों के अगर काटना है



क़मर पे चढ़ी जा… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on October 16, 2017 at 10:30pm — 11 Comments

तरही गजल

1222 1222 122

कभी जिसमें कहीं अड़चन नहीं है
हो कुछ भी वो मग़र जीवन नहीं है

तराशा जाए तो पत्थर भी चमके
तपाए बिन कोई कुंदन नहीं है

बिना उलझे नहीं आता सुलझना
मज़ा ही क्या अगर उलझन नहीं है

अगर हैं जीतने की ख़्वाहिशें तो
न सोचो हारने का मन नहीं है

बहारें हर तरफ़ आने लगी हैं
खिला इक बस मेरा गुलशन नहीं है

नहीं अनबन, नहीं शिकवा ही कोई
*बस इतना है कि अब वो मन नहीं है*

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on October 11, 2017 at 11:30pm — 10 Comments

बचपन

*बचपन*



न समंदर-सा गहरा,न पर्वत-सा ऊँचा



न ही लताओं-सा उलझा



जटिल तो हो ही नहीं सकता है



बचपन



क्योंकि बड़ा सादा-सा होता है



बचपन



बड़ा सीधा-सा होता है



बचपन



खुली उन्मक्त हवा-सा बहता है



करता है अठखेलियां



विभिन्न पत्तियों से



टहनियों से



कभी-कभी हिला देता है



वृक्ष को भी जड़ तक



क्योंकि बहती हवा-से



बचपन का विवेक इतना ही



होता… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on October 8, 2017 at 10:37pm — 4 Comments

तरही ग़ज़ल

122 122 122 12

उन्हें देखकर ये बदलने लगा
नहीं टिक सका दिल फिसलने लगा

नदी से मिलन की घड़ी आ गयी
*समन्दर खुशी से मचलने लगा*

जमाने से मिलती रही ठोकरें
उन्हीं की बदौलत सँभलने लगा

लगा संग दिल ही था जो अब तलक
वो किलकारियों से पिघलने लगा

पड़ोसी लगाता रहा आग जो
वही आज खुद देखो जलने लगा

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on September 24, 2017 at 6:46am — 8 Comments

तरही गजल

1222 1222 122

.

नही हमको जो भाता क्यों करें हम

कोई झूठा बहाना क्यों करें हम



हमीं से रौशनी है चार सू जब

तो बुझने का इरादा क्यूँ करें हम



खमोशी की सदा अक्सर सुनी है

न सुनने का बहाना क्यूँ करें हम



भरोसा जब नहीं खुद पे हमें ही

*वफ़ादारी का दावा क्यूँ करें हम*



हो झगड़ा आपसी सुलझाएँ खुद ही

ज़माने में तमाशा क्यों करें हम



न होता झूठ का कोई ठिकाना

फिर उसको ही तराशा क्यूँ करें हम



मौलिक…

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Added by सतविन्द्र कुमार on September 19, 2017 at 6:00am — 12 Comments

दूर है वह मग़र जुदा न हुआ

2122 1212 22/(112)

साथी उससे कोई खरा न हुआ

साथ गम ने दिया जुदा न हुआ



रोकती बस रही रज़ा तेरी

हमने चाहा बुरा,बुरा न हुआ



छल कपट से रहा कमाता जिसे

जऱ यूँ ही बह गया तेरा न हुआ



बस बनावट भरा लगा रिश्ता

जिसमें कोई कभी खफ़ा न हुआ



डोर दिल की बँधी रही जिससे

दूर है वह मग़र जुदा न हुआ



जिंदगी को सही समझ न सके

मुश्किलों से जो सामना न हुआ



बंद आँखों ने जो किया दीदार

आँखें खोली वो देखना न… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on September 3, 2017 at 8:00am — 3 Comments

लकीरों में तो कुछ रक्खा नहीं है(गजल) /सतविन्द्र कुमार राणा

गजल

बह्र 1222 1222 122



फरेबी तू जो बन पाया नहीं है

तभी सिक्का तेरा चलता नहीं है



नहीं नीयत में ही जब काम करना

कहे क्यों तू, मिला मौका नहीं है



ज़ुबाँ में सादगी उसकी झलकती

भले देहात में रहता नहीं है



जिया था तू वतन के वास्ते पर

शहादत का तेरी चर्चा नहीं है



सरे बाज़ार देखो झूठ बिकता

जो' बिक जाए वो' फिर सच्चा नहीं है



लिखी तकदीर हाथों से ही जाती

लकीरों में तो कुछ रक्खा नहीं है



मौलिक एवं… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on August 6, 2017 at 12:30pm — 6 Comments

एक ग़ज़ल/सतविन्द्र राणा

बह्र:1222 1222 122

नहीं पहले-सी चेहरे पे चमक है
हँसी में आपकी गम की झलक है

नहीँ आमाल में जिसकी है नीयत
उसी की क़ामयाबी पे भी शक है

कोई तो खेल में पानी बहाता
कहीं पर प्यासा मरने की धमक है

पहुँचना उसका ही होगा फलक तक
नज़र जिसकी बहुत आगे तलक है

रहेगी रात तन्हा, दिन अकेला
हमारा साथ कुछ ही देर तक है

उसे बंदिश भला क्या रोक पाए?
नजर में जिसकी ये सारा फलक है

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on August 6, 2017 at 11:00am — 14 Comments

कुण्डलिया/सतविन्द्र राणा

सारे दादुर मोर खुश ,सावन जो घिर आय।
कारे बादल जलभरे ,नभ में जाते छाय।
नभ में जाते छाय, प्यास धरती की हरते।
नीर सुधा बरसाय,सुहागन इसको करते।
सतविन्दर कविराय, लगाओ पौधे प्यारे
मिट्टी उगले अन्न,सुखी हों प्राणी सारे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by सतविन्द्र कुमार on August 2, 2017 at 8:30pm — 8 Comments

वीर चेतक(आल्हा छ्न्द)/सतविन्द्र कुमार राणा

*वीर चेतक*(वीर छ्न्द)



घोड़े देखे बहुत जगत में,देखा कब चेतक-सा वीर



बिजली-सी चुस्ती थी जिसमें लेकिन रहता रण में धीर



कद था छोटा ही उसका पर,लम्बा उसका बहुत शरीर



मारवाड़ की अश्व-नस्ल में राणा ने पाया वह बीर





हल्दी घाटी समर क्षेत्र में,राणा उसपे रहे सवार



चेतक मुख पर सूंड लगाए,गज पर करता चढ़-चढ़ वार



राणा का भाला चलता था,संग चली टापों की मार



आगे-पीछे हटता चेतक,दिखती रण कौशल में धार





हल्दी घाटी… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार on June 8, 2017 at 8:30pm — 9 Comments

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