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पत्थरों पे हैं इल्ज़ाम झूठे सभी-गजल

212 212 212 212

अब नए फूल डालों पे आने लगे,
और' भ्रमर फिर ख़ुशी से हैं गाने लगे।

पत्थरों पे हैं इल्जाम झूठे सभी,
राही के ही कदम डगमगाने लगे।

रहबरी तीरगी की जो करते रहे,
अब वो सूरज को दीपक दिखाने लगे।

वादा वो ही किया जो था तुमने कहा,
घोषणा क्यों चुनावी बताने लगे।

जिनकी आँखों पे सबने भरोसा किया,
वक्त  आने पे सारे वो काने लगे।

भैंस बहरी नहीं सुन समझ लेगी सब,
बीन ये सोच कर फिर बजाने लगे।

'बाल' अल्फ़ाज़ सारे ये सच हैं मेरे,
ये ख़ता है तेरी तुझको ताने लगे।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 26, 2019 at 7:15pm

आ. भाई सतविंद्र जी, अच्छा प्रयास हुआ है । हार्दिक बधाई।

Comment by Samar kabeer on March 25, 2019 at 2:24pm

जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'रहबरी तीरगी की रहे कर ते जो'

इस मिसरे का शिल्प कमज़ोर है,यूँ कर लें:-

'रहबरी तीरगी की जो करते रहे'

'जिनको सोचा नजर हैं सही रख रहे
गौर कर देखा सारे ही काने लगे।'

ये शैर भी शिल्प और व्याकरण की दृष्टि से समय चाहता है ।

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