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बात सुनकर ही कुछ कहा जाए,
हो न ये, बात का मजा जाए।

बोल चल देते वे ठिकाने तज,
मूल जिनका हवा-हवा जाए।

सत्य कहने का भी सलीका है,
जिसको छोड़ो, न सच सहा जाए।

जिंदगी है, खुशी-ओ-रंज भी हैं,
साथ इनके मियां जिया जाए।

काम ईमान से करे अपना,
तो वो इंसाँ भला कहा जाए।

'बाल' सच को नकारा ही जाता,
ऐसा भी क्यों समझ लिया जाए?

मौलिक अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on July 14, 2024 at 9:34pm

आदरणीय समर कबीर सर, सादर वन्दे। आपके मार्गदर्शनानुसार दुरुस्त करने की कोशिश करूंगा। 

Comment by Samar kabeer on July 12, 2024 at 6:48pm

जनाब सतविंद्र कुमार जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है, बधाई स्वीकार करें ।

'हो न ये, बात का मजा जाए'

इस मिसरे को अगर यूँ कर लें तो वाक्य विन्यास ठीक रहेगा:-

'ये न हो बात का मज़ा जाए'

'बोल चल देते वे ठिकाने तज,
मूल जिनका हवा-हवा जाए'

इस शे'र का भाव स्पष्ट नहीं है,ध्यान दें ।

'सत्य कहने का भी सलीका है,
जिसको छोड़ो, न सच सहा जाए'

इस शे'र का सानी मुझे स्पष्ट नहीं लगा, देखिएगा ।

'जिंदगी है, खुशी-ओ-रंज भी हैं'

इस मिसरे को यूँ कहें तो रवानी ठीक होगी:-

'ज़िंदगी ये ख़ुशी है रंज भी है'

कृपया ध्यान दे...

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