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जागे हिंदुस्तान/ गीत

जीवन डगर बहुत पथरीली

संभलो मनुज सुजान,

जागे हिंदुस्तान हमारा जागे हिंदुस्तान।



हिन्दू मुस्लिम भाई भाई प्रेम का धागा टूट गया।

न जाने कितनी माँगो का फिर से ईंगुर रूठ गया।

मानवता जब दानवता की चरण पादुका धोती है,

तभी मालदा वाली घटना तभी पूर्णिया रोती है।



धर्म के पहरेदारों बोलो,

कब लोगे संज्ञान।।

जागे--------



संस्कार की नींव हिल गयी बिका हुस्न बाजरों में।

कर्णधार जो बनकर आये लिप्त हुए व्यभिचारों में।

जाति पांति के भेदभाव…

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Added by CA (Dr.)SHAILENDRA SINGH 'MRIDU' on October 10, 2017 at 9:30pm — 8 Comments


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अम्बर के विस्तार सरीखे मेरे पापा // डॉ० प्राची

शुचित यज्ञ सी

मन प्राणों में घोल सुगन्धि,

आँगन में त्यौहार सरीखे मेरे पापा...



थाम अँगुलियाँ जिनकी

हर उलझी पगडण्डी लगी सरल सी,

ज़मी किरचियाँ व्यवहारों की

पिघल हृदय से बहीं तरल सी,



सबकी ख़ातिर बोए पग-पग

गुलमोहर और छाँटे कीकर,

सौंपी सबको ख़ुशियों की प्याली

ख़ुद पी हर व्यथा गरल सी,



फिर भी…

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Added by Dr.Prachi Singh on October 10, 2017 at 9:30pm — 7 Comments

गजल(इक गजल की शाम हो तुम...)

2122 2122
--------------------
इक गजल की शाम हो तुम
धड़कनें गुमनाम हो तुम।1

ख्वाहिशों की संगिनी हो
नींद हो ,आराम हो तुम।2

ढूँढ़ता तब से रहा मैं
ख्वाहिशे-आवाम हो तुम।3

घोल दे जो कान में रस
वह सहज-सा नाम हो तुम।4

राधिका हो तुम किशन की
बीन मेरी,'साम' हो तुम।5

टूटता है जब मनोरथ
उस घड़ी में काम हो तुम।6

भागता फिरता बटोही
बस सुफल इक धाम हो तुम।7
"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on October 10, 2017 at 7:30pm — 6 Comments

सिसकते बल्ब (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"कमली, तू तो करवा चौथ के दूसरे दिन भी काफी सुंदर लग रही है, सजी-धजी सी!"

मेम साहब की यह टिप्पणी सुनकर कमली उनके कमरे में और अच्छी तरह से झाड़ू लगाने लगी।

"छोड़ ये झाड़ू-पोंछा.. आ बैठ यहां!" कमली का हाथ खींच कर उसे सोफे पर बैठा कर मेम साहब ने पूछा - "सच, बहुत सुंदर और ख़ुश दिख रही है तू!"

"पर आपके सामने हम कहां!"

"चुप्प! छोड़ ऐसी बातें! अच्छा ये बता, तू कितने वाट की है?"

"वाट!"

"हां, कितना वोल्टेज है तुझ में?" इतना कहकर मेम साहब फफक-फफक कर रोने लगी।

उनके ही… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 10, 2017 at 6:38pm — 4 Comments

राज़ नवादवी: एक अपरिचित कवि की कृतियाँ- ४६ (सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है)

स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता "You Start Dying Slowly" के हिन्दी अनुवाद से प्रेरित

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

-----------------------------------------

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

आप चाहे तुच्छ हों या हों आप महान

आप चाहे पत्थर हों, पेड़ हों

पशु हों, आदमी हों, या कोई साहिबे जहान

आप चाहे बुलंद हों या जोशे नातवान

 

सब को धीरे धीरे मरना पड़ता है

आप चाहे विनीत हों या कोई दहकता…

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Added by राज़ नवादवी on October 10, 2017 at 3:00pm — 10 Comments

अपने-पराये(लघुकथा)राहिला

"तुम्हारी सारे फैसलों से मैं हमेशा सहमत रहा हूँ । लेकिन आज इस फैसले से मैं कतई सहमत नहीं।आख़िर मेरी गैरहाजिरी में ऐसा क्या हुआ कि अचानक तुमने वहां वापसी की ज़िद पकड़ ली?बड़ी भाभी या सुषमा ,किसी ने कुछ कहा क्या?"



"...."



" कुछ तो बोल बिट्टो! क्या तू भूल गयी उन लोगों ने तेरे साथ कितना गलत किया था?"

" नहीं ..,कुछ नहीं भूली, लेकिन ये भी याद है कि इन सब के बाद वह अपने व्यवहार पर शर्मिंदा भी हुए थे!"उसने सपाट भाव से उत्तर दिया।

"तू !पागल हो गयी है? कुत्ते की पूंछ कभी सीधी… Continue

Added by Rahila on October 10, 2017 at 2:29pm — 8 Comments

परंपरा और गुलामी--

"कल की फोटो देखी मैंने, बहुत सुंदर दिख रही थीं आप", उसने ऑफिस में अपनी कलीग से कहा|

"अरे कल वो व्रत था ना, उसमें तो सजना बनता था", मुस्कुराते हुए वह बोली|

"अच्छा, तो आप भी यह सब मानती हैं, मुझे लगा कि आप आजाद ख्याल की हैं", उसके लहजे में व्यंग्य था या सहानुभूति, वह समझ नहीं पायी|

"ऐसी बात नहीं है, मैं तो बस परंपरा निभाने के लिए ऐसा कर लेती हूँ| वैसे इसी बहाने थोड़ी शॉपिंग भी हो जाती है, पति से गिफ्ट भी मिल जाता है", थोड़ी सफाई सी देती हुए वह बोली|

"मतलब परंपरा की आड़ में सब कुछ…

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Added by विनय कुमार on October 10, 2017 at 11:46am — 6 Comments

ग़ज़ल --- ख़ुदकुशी बार बार कौन करे // दिनेश कुमार

2122---1212---112/22
.
ख़ुदकुशी बार बार कौन करे
आप का इन्तिज़ार कौन करे
.
आइना टूटने से डरता है
झूट को शर्मसार कौन करे
.
अपना मतलब निकालते हैं सब
बे-ग़रज़ हमसे प्यार कौन करे
.
नाव टूटी है हौसला ग़ायब
ग़म के दरिया को पार कौन करे
.
हम हक़ीक़त से मुँह चुराते हैं
ख़्वाब को तार तार कौन करे
.
उस्तरा बन्दरों के हाथ में है
इन को सर पर सवार कौन करे
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

Added by दिनेश कुमार on October 10, 2017 at 5:33am — 8 Comments

राज़ नवादवी: एक अंजान शायर का कलाम- ५७

ग़ज़ल २२१ २१२१ १२२१ २१२ 

------------------------------------



लूटा जो तूने है मेरा, अरमान ही तो है

उजड़ा नहीं है घर मेरा, वीरान ही तो है



वादा खिलाफ़ी शोखी ए खूबाँ की है अदा

आएगा कल वो क़स्द ये इम्कान ही तो है



सीखेगा दिल के क़ायदे अपने हिसाब से

वो शोख़ संगदिल ज़रा नादान ही तो है



नज़रे करम कि हुब्ब के कुछ वलवले…

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Added by राज़ नवादवी on October 9, 2017 at 11:31pm — 14 Comments

अपने अपने जज़्बात- लघुकथा

"हाय मम्मी, कैसी है, तबियत ठीक है ना तुम्हारी और दवा रोज ले रही हो ना", रोज के यही सवाल होते थे सिम्मी के और उसका रोज का जवाब।

"अब वीडियो काल किया है तो देख ही रही है मुझे, मैं एकदम ठीक हूँ। अच्छा अभी कितना बज रहा है वहाँ पर", उसने अपनी दीवाल घड़ी को देखते हुए पूछा।

"रोज तो बताती हूँ, बस साढ़े तीन घंटे आगे चलती है घड़ी यहाँ, अभी शाम के सिर्फ सात ही बजे हैं"।

"मुझे याद नहीं रहता, हमेशा उलझ जाती हूँ कि हमारी घड़ी आगे है या तुम्हारी। और मेहमान आए कि नहीं अभी, छोटू कैसा है", उसने भी…

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Added by विनय कुमार on October 9, 2017 at 5:54pm — 12 Comments

शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है : सलीम रज़ा रीवा ग़ज़ल

2122 2122 212

..

शाम-ए-रंगीं  गुलबदन गुलफा़म है

मिल गए तुम जाम का क्या काम है

.. 

ये वज़ीफा़ मेरा सुब्ह-ओ-शाम है

मेरे लब पे सिर्फ तेरा नाम है

..

तू मिला मुझको सभी कुछ मिल गया

ये मुक़द्दर का बड़ा इनआम है



तुम हो सांसों में तुम्ही धड़कन में हो

ज़िन्दगी मेरी  तुम्हारे  नाम  है

..

हम किसी से दुश्मनी करते नहीं

दोस्ती तो प्यार  का  पैग़ाम है 

..

मेरा घर खुशिओं से है फूला फला 

मेरे रब का ये  बड़ा  इनआम… Continue

Added by SALIM RAZA REWA on October 9, 2017 at 3:30pm — 13 Comments

कुछ यादें बचपन की

बीत गया जो बचपन अपना, वह भी एक जमाना था

पल में हँसना पल में रोना, पल पल इक अफसाना था



बारिश में कागज की नैया, भैया रोज बनाते थे

बागों में तितली के पीछे, हमको वह दौड़ाते थे

रोने की थी वजह न कोई, हँसने के न बहाने थे

कमी नहीं थी किसी चीज की, सारे पास खजाने थे



चिन्ता फिक्र न कोई कल की, हर मौसम मस्ताना था

पल में हँसना पल में रोना, पल पल इक अफसाना था



जिधर निकलते थे हम यारों उधर दोस्त मिल जाते थे

गिल्ली डंडा और कबड्डी, फिर हम वहीं जमाते… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 9, 2017 at 1:00pm — 11 Comments

ग़ज़ल -ये’ बातचीत में’ खरसान बैर बू क्या है?(संशोधित)

१२१२  ११२२  १२१२  २२

सटीक बात की’, आक्षेप बाँधनू क्या है

ये’ बातचीत में’ खरसान बैर बू क्या है?

नया ज़माना’ नया है तमाम पैराहन

अगर पहन लिया’ वो वस्त्र, फ़ालतू क्या है |

हसीन मानता’ हूँ मैं उसे, नहीं शोले

नजाकतें जहाँ’ है इश्क, तुन्दखू क्या है |

किया करार बहुत आम से चुनावों में

वजीर बनके’ कही रहबरी, कि तू क्या है ?

हो’ वुध्दिमान मिला राज, अब करो कुछ भी  

उलट पलट करो’ खुद आप, गुफ्तगू क्या…

Continue

Added by Kalipad Prasad Mandal on October 9, 2017 at 8:30am — 8 Comments

ग़ज़ल -- ग़लती कर पछताए कौन // दिनेश कुमार

22__22__22__2
.
ग़लती कर पछताए कौन
ख़ुद से नज़र मिलाए कौन
.
अपनी अना मिटाए कौन
सच्ची अलख जगाए कौन
.
पिछले लेखे-जोखे हैं
अपने कौन पराए कौन
.
राम भी कब से भूखे हैं
झूठे बेर खिलाए कौन
.
कस्तूरी मिल जाएगी
ख़ुद में गहरे जाए कौन
.
तूफ़ां नाम का तूफ़ां है
लहरों से टकराए कौन
.
माज़ी माज़ी करें सभी
मुस्तक़बिल चमकाए कौन
.
( मौलिक व अप्रकाशित )

Added by दिनेश कुमार on October 9, 2017 at 6:18am — 20 Comments

विकल्प ( लघुकथा )

कुछ क्षण ही बीते होंगे उस कोहराम को मचे।इला की दृष्टि घड़ी पर गई।ऑफिस का समय हो रहा था।रोज की ही कहानी है सोच उसने अपने आँसू पौंछे और तुरन्त रसोई में पहुँच लंच' तैयार कर दफ़्तर को निकल गई।दिनभर मन उचाट ही रहा।शाम को लौटते हुए उसके कदम मायके की ओर मुड़ गये।

" अरे इला बेटी ! कैसी है ? आ भीतर आ ..."

" ठीक हूँ माँ।"इला ने एक ओर पर्स पटका और धम्म से सोफ़े पर बैठ गई।

" आज फिर हाथ उठाया कमल ने ?" इला अक़्सर तभी आती,जब उसका कमल से झगड़ा होता।ये बात इला की माँ बहुत अच्छे से जानती थी… Continue

Added by shashi bansal goyal on October 8, 2017 at 10:39pm — 4 Comments

बचपन

*बचपन*



न समंदर-सा गहरा,न पर्वत-सा ऊँचा



न ही लताओं-सा उलझा



जटिल तो हो ही नहीं सकता है



बचपन



क्योंकि बड़ा सादा-सा होता है



बचपन



बड़ा सीधा-सा होता है



बचपन



खुली उन्मक्त हवा-सा बहता है



करता है अठखेलियां



विभिन्न पत्तियों से



टहनियों से



कभी-कभी हिला देता है



वृक्ष को भी जड़ तक



क्योंकि बहती हवा-से



बचपन का विवेक इतना ही



होता… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on October 8, 2017 at 10:37pm — 4 Comments

ग़ज़ल...ज़िन्दगी मुस्कुराने लगी शाम से-बृजेश कुमार 'ब्रज'

मुतदारिक सालिम मुसम्मन बहर

212 212 212 212

आपकी याद आने लगी शाम से

ज़िन्दगी मुस्कुराने लगी शाम से



गुनगुनाती हुई चल रही है हवा

शाम भी गीत गाने लगी शाम से



चाँदनी रात से क्यों करें हम गिला

हर ख़ुशी झिलमिलाने लगी शाम से



बड़ रही प्यार की तिश्नगी हर घड़ी

हसरतें सिर उठाने लगी शाम से



ताल बेताल थे सुर बड़े बेसुरे

रागनी वो सुनाने लगी शाम से



आस दिल में लिये चल पड़ी बावरी

रात सपने सजाने लगी शाम से

(मौलिक एवं… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 8, 2017 at 7:00pm — 18 Comments


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ग़ज़ल - चाहे आँखों लगी, आग तो आग है.. // --सौरभ

२१२ २१२ २१२ २१२

 

फिर जगी आस तो चाह भी खिल उठी

मन पुलकने लगा नगमगी खिल उठी

 

दीप-लड़ियाँ चमकने लगीं, सुर सधे..

ये धरा क्या सजी, ज़िन्दग़ी खिल उठी

 

लौट आया शरद जान कर रात को

गुदगुदी-सी हुई, झुरझुरी खिल उठी

 

उनकी यादों पगी आँखें झुकती गयीं

किन्तु आँखो में उमगी नमी खिल उठी

 

है मुआ ढीठ भी.. बेतकल्लुफ़ पवन..

सोचती-सोचती ओढ़नी खिल उठी

 

चाहे आँखों लगी.. आग तो आग है..

है मगर प्यार की, हर घड़ी खिल…

Continue

Added by Saurabh Pandey on October 8, 2017 at 1:00pm — 56 Comments

लघुकथा - मंत्री जी का कुत्ता

लघुकथा - मंत्री जी का कुत्ता –

कलुआ ने जब से होश संभाला था वह मंत्री जी के ही साथ था।सुबह से रात तक, हर काम का भागीदार होता था।

आज मंत्री जी का दौरा उसी के गाँव में था।बड़ी दुविधा के साथ बरसों बाद गाँव आया था।लगभग सभी लोग उसे भूल चुके थे।मगर उसके बचपन के सखा हरिया ने उसे पहचान लिया।

"अरे कालीचरण भैया आप"?

"हरीराम, तुम पहचान लिये हमका"।

"क्या बात करते हो भैया, हम आपको भूल सकते हैं।आज हम आपकी वजह से जिंदा हैं।बचपन में भेड़िया से भिड़ गये थे, हमको बचाने के लिये"।

हरिया… Continue

Added by TEJ VEER SINGH on October 8, 2017 at 12:02pm — 10 Comments

देखो कैसे-कैसे गीत...

बिन पायल के,

साज बिना ये,

बाज रहा संगीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



राग बसंती, तान-तराने

सुमधुर गायन सकल घराने।

ये सोच रहा अनजाने,

मेरे ही मनमीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



सांझ-सबेरे प्रियतम मेरे

तरसाओ न चित-चोर चितेरे।

नयना बरसे अश्रु मेरे,

बिन प्रियतम ये प्रीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।



मधुबन की ये संगत सारी

बिन पायल सब बाजी हारी।

अब कौन कहे मतवारी,

हारकर ये जीत।

देखो कैसे-कैसे गीत।।

"मौलिक व…

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Added by BS Gauniya on October 8, 2017 at 8:15am — 6 Comments

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