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*बचपन*

न समंदर-सा गहरा,न पर्वत-सा ऊँचा

न ही लताओं-सा उलझा

जटिल तो हो ही नहीं सकता है

बचपन

क्योंकि बड़ा सादा-सा होता है

बचपन

बड़ा सीधा-सा होता है

बचपन

खुली उन्मक्त हवा-सा बहता है

करता है अठखेलियां

विभिन्न पत्तियों से

टहनियों से

कभी-कभी हिला देता है

वृक्ष को भी जड़ तक

क्योंकि बहती हवा-से

बचपन का विवेक इतना ही

होता है

टोलियों में झूमता, खेलता

कागज़ के जहाज़ पर उड़ान भरता

कागज़ की ही कश्तियों पर तैरता

मिट्टी,गारे,कंकड़,रेत से सपनों की

दुनिया को बुनता

बारिश में अधनंग भीगता

सर्दी से पुरजोर छींकता

दवा की शीशियों में डूबता

कभी भाता ,कभी सताता है

बचपन

बचपन जो उन्मुक्त पंछी-सा

उड़ान भरता है

नदी-सा बलखाता बढ़ता है

तरह-तरह के खेलों से पुष्ट होता है

दबा जा रहा है,महत्वकांक्षाओं के भार के नीचे

जो बड़ी आंखों के सपने हैं और इसकी पीठ पर

आठो याम लदे हैं

यह बचपन अब बचपन नहीं लगता

क्योंकि इसमें संवेदना,गम्भीरता

बेबसी झलकने लगी है

अब तो एक नियंत्रित धारा-सा

बह रहा है बचपन

सुनों! कुछ

कह रहा है बचपन।

मौलिक अप्रकाशित

Views: 563

Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 20, 2017 at 11:43am
आदरणीय कल्पना दी सादर नमन,उत्साहवर्धन के लिए तहेदिल शुक्रिया
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 12, 2017 at 6:19am
आदरणीय समर कबीर जी,सादर नमन!हौंसलाफ़ज़ाई के लिए बहुत बहुत आभार
Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 11, 2017 at 5:13pm

बचपन को लेकर बढ़िया कविता लिखी है आपने आदरणीय सतविन्द्र भाईया , हार्दिक बधाई |

Comment by Samar kabeer on October 10, 2017 at 3:01pm
जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,बचपन को केंद्र बिंदू बनाकर बहुत अच्छी रचना हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

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