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शान बड़ी गणतंत्र दिवस की , दुनियां को दिखलायें क्यों (गीत) //अलका ललित

छंद--तांटक

-.-

शान बड़ी गणतंत्र दिवस की , दुनियां को दिखलायें क्यों

.

ख़ौफ़ ज़दा सड़को पर चलती, डर के साये में जीती

देश की बेटी न बोलेगी , क्या क्या उस पर है बीती

नन्ही नन्ही कलियाँ खिलने, से पहले ही तोडा है

जननी को जो जन्मा तो फिर, नारी के सर कोड़ा है

क्या पहने पोशाक यहाँ हम , मुनिया को समझायें क्यों 

शान बड़ी गणतंत्र दिवस की......

.

वादों का सैलाब लिए वो, पाँच साल में आते है

अपनी जेबें भरते है पर जन सेवक कहलाते…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on January 26, 2017 at 7:00pm — 7 Comments


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तुम्ही बता दो कैसे आऊँ - (गीत) - मिथिलेश वामनकर

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

एक कृषक कल तक थे लेकिन अब शहरी मजदूर बने।

सृजक जगत के कहलाते थे, वो कैसे मजबूर बने?

वे बतलाते जीवन गाथा, पीड़ा से घिर जाता हूँ।

कितने दुख संत्रास सहे हैं, ये लिख दूँ, फिर आता हूँ।

कर्तव्यों के नव बंधन को तोड़ तुम्हारे पास प्रिये,

तुम्ही कहो, कैसे आऊँ,

सब छोड़ तुम्हारे पास प्रिये?

 

कौन दिशा में कितने पग अब कैसे-कैसे है चलना?

अर्थजगत के नए मंच पर, कैसे या कितना…

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Added by मिथिलेश वामनकर on January 26, 2017 at 2:00pm — 23 Comments

ग़ज़ल (26 जनवरी)

ग़ज़ल (जनवरी के मास की)



2122 2122 2122 212



जनवरी के मास की छब्बीस तारिख आज है,

आज दिन भारत बना गणतन्त्र सबको नाज़ है।



ईशवीं उन्नीस सौ पंचास की थी शुभ घड़ी,

तब से गूँजी देश में गणतन्त्र की आवाज़ है।



आज के दिन देश का लागू हुआ था संविधान,

है टिका जनतन्त्र इस पे ये हमारी लाज है।



सब रहें आज़ाद हो रोजी कमाएँ खुल यहाँ,

हक़ बराबर का हमारी एकता का राज है।



राजपथ पर आज दिन जब फ़ौज़ की देखे झलक,

छातियाँ दुश्मन की दहले उसकी… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on January 26, 2017 at 10:00am — 3 Comments

गजल( देखिये सबको रिझातीं टोपियाँ)

    2122   2122   212 

देखिये सबको रिझातीं टोपियाँ

नाच कितनों को नचातीं टोपियाँ।1



आपकी धोती कहाँ महफूज है?

फाड़कर कुर्ते बनातीं टोपियाँ।2



जो नहीं सोचा कभी था आपने

रंग वैसे भी दिखातीं टोपियाँ।3



पीठ पर दे हाथ वे पुचकारतीं

पेट में ख़ंजर चुभातीं टोपियाँ।4



दोस्ती का दे हवाला हर बखत

दुश्मनी फिर-फिर निभातीं…

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Added by Manan Kumar singh on January 26, 2017 at 9:51am — 6 Comments

ग़ज़ल- इसे जुल्म में न शुमार कर

11212 11212 11212 11212

है नई नई ये मेंरी ख़ता इसे जुल्म में न शुमार कर ।

है जो आशिकी का ये दौर अब इसे इस तरह न तू ख्वार कर ।।



उसे जिंदगी से नफ़ा मिला मुझे दर्द का है सिला मिला ।

ये हिसाब अब न दिखा मुझे न तिजारतों में दरार कर ।।



वो हवा चली ही नहीं कभी वो दरख़्त को न नसीब थी ।

मेरे फ़िक्र की है ये आरज़ू तू इसी चमन में बहार कर ।।



यहाँ चाहतों में है दम कहाँ कई चाहतें भी दफ़ा हुईं ।

है मुहब्बतों का सवाल ये कहीं जिंदगी को निसार कर… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 26, 2017 at 12:44am — 4 Comments

गजल /// गीत पहले प्यार के मधु छंद सा

 2122  2122  212

       

गीत पहले प्यार के मधु छंद सा

नीरजा के झर रहे मकरंद सा 

 

नाव पर संगीत मांझी का मुखर

लोक को देता सुनायी मंद सा

 

है वही ब्रज और गोकुल की गली 

नहीं दिखता किन्तु नंदन-नंद सा

 

छुप गया जो बांस के पीछे वहाँ    

बादलों की ओट में है चंद सा  

 

है मृगी बेचैन, व्याकुल भीत भी

बीहड़ों में कुछ दिखा है फंद सा

 

देवता सब हो गए है कैद अब…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 25, 2017 at 8:00pm — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सहम सहम निकल रही कली कली नकाब में (ग़ज़ल 'राज')

1212  1212  1212  1212

फँसा रहे बशर सदा गुनाह ओ सवाब में

हयात झूलती सदा सराब में हुबाब में

 

बची हुई अभी तलक महक किसी गुलाब में

बता रही हैं अस्थियाँ छुपी हुई किताब में

 

जहाँ जुदा हुए कभी रुके  वहीं सवाल हैं

गुजर गई है जिन्दगी लिखूँ मैं क्या जबाब में

 

लिखें जो ताब पर ग़ज़ल सुखनवरों की बात अलग

वगरना लोग देखते हैं आग आफ़ताब में

 

फ़िज़ूल में ही अब्र ये छुपा रहा है चाँद को

जमाल हुस्न का कभी न छुप सका…

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Added by rajesh kumari on January 25, 2017 at 11:00am — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - कह दिये , हर वास्ता जाता रहा ( गिरिराज भंडारी )

2122     2122       212  

दिल से जब नाम-ए ख़ुदा जाता रहा

दरमियानी मो’जिजा जाता रहा

 

ख़ुद पे आयीं मुश्किलें तो, शेख जी

क्यूँ भला हर फल्सफ़ा जाता रहा

 

जो इधर थे हो गये जब से उधर

कह दिये , हर वास्ता जाता रहा

 

अब ख़बर में वाक़िया कुछ और है

था जो कल का हादसा जाता रहा

 

गर हुजूम –ए शहर का है साथ , तो  

जो किया तुमने बुरा जाता रहा

 

आँखों में पट्टी, तराजू हाथ में

जब दिखे, तो…

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Added by गिरिराज भंडारी on January 25, 2017 at 8:18am — 27 Comments

चुनावी बहार - डॉo विजय शंकर

वाह रे तेरे लटके ,
वाह रे तेरे झटके ,
वाह रे तेरे फटके ,
वाह रे तेरा हँसना ,
वाह रे तेरा रोना ,
वाह रे तेरा धोना ,
वाह , एक दूसरे को धोना ,
अंत में सबका खूब
धुला धुला होना ,
वाह रे तेरा बेचैन होना ,
वाह रे तेरा चैन से सोना ,
वाह रे तेरा रूठना ,
वाह रे एक दूजे को मनाना ,
वाह रे तेरे आंसू , कितने
जबरदस्त कितने धांसू ,
जय जय जय हो .......

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 24, 2017 at 6:28pm — 7 Comments

ये अश्क ...

ये अश्क ...

नहीं होता

चेहरा

दुःख का

कोई

नहीं होती उम्र

मौत की

कोई

ज़िन्दगी

खुशियों का

आसमां नहीं

ग़मों की

धूप है

ज़िन्दगी की धूप में

ख़ुशी तो बस

छाया का नाम है

पल भर का सुकून है

फिर गमों की

दास्तान है

यादों के

खंज़र हैं

कुछ आँखों से

बाहर हैं

कुछ आँखों के

अंदर हैं

कह गए

बह के

और

कुछ अभी

दिल में…

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Added by Sushil Sarna on January 24, 2017 at 6:18pm — 6 Comments

ग़ज़ल- दर्द जो नातवां से उठता है

दर्द जो नातवां से उठता है
शोर वो आस्तां से उठता है


गीत भी देख लो छुपे भीतर
दर्द दिल में जहां से उठता है


नाम की भूख ने बदल डाला
क्यूँ धुंआ अब यहाँ से उठता है


प्यार बांटो सदा जमाने में
बोल सच्चा फुगां से उठता है


उम्र बीती समझ नहीं आया
रोज झगड़ा बयां से उठता है


जिंदगी आज बन्दगी 'तन्हा'

नाम उसका ही जां से उठता है....

.
मुनीश 'तन्हा'.
मौलिक व अप्रकाशित

Added by munish tanha on January 24, 2017 at 5:30pm — 5 Comments

गणतंत्र हमारा-26जनवरी विशेष ग़ज़ल

22 22 22 22 22 22
वैविध्य से परिपूर्ण है गणतंत्र हमारा।
हम सब से ही सम्पूर्ण है गणतन्त्र हमारा।।

समता के अनुच्छेद के पालन बिना सुनो।
हर हाल में अपूर्ण है गणतन्त्र हमारा।।

अभिव्यक्ति का अधिकार सभी को है मित्रवर।
पर पहले महत्वपूर्ण है गणतन्त्र हमारा।।

धर्मों का यहाँ संगम अद्भुत है ये धरा।
समरसता से अभिपूर्ण है गणतन्त्र हमारा।।

संसार के क्षितिज पे दमकता नक्षत्र है।
आदित्य सा प्रतूर्ण है गणतन्त्र हमारा।।

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 24, 2017 at 9:52am — 15 Comments

नेताजी (मुक्तक - बहर 2122×4)

नेताजी (मुक्तक - बहर 2122×4)

आज तेइस जनवरी है याद नेताजी की कर लें,
हिन्द की आज़ाद सैना की दिलों में याद भर लें,
खून तुम मुझको अगर दो तो मैं आज़ादी तुम्हें दूँ,
इस अमर ललकार को सब हिन्दवासी उर में धर लें।

मौलिक व अप्रकाशित

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on January 23, 2017 at 1:30pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
“कमीने” (लघु कथा “राज”)

‘रिमझिम के तराने लेके आई बरसात.. याद आये किसी की वो पहली मुलाक़ात’ ---गाना बज रहा था  बिजनेसमैन आनंद सक्सेना साथ साथ गुनगुनाता जा रहा था रोमांटिक  होते हुए बगल में बैठी हुई पत्नी सुरभि के हाथ को धीरे से दबाकर  बोला- “सच में बरसात में लॉन्ग ड्राइव का अपना ही मजा होता है”.

“मिस्टर रोमांटिक, गाड़ी रोको रेड लाईट आ गई”  कहते हुए सुरभि ने मुस्कुराकर हाथ छुड़ा  लिया|

अचानक सड़क के बांयी और से बारिश से  तरबतर  दो बच्चे फटे पुराने कपड़ों में कीचड़ सने हुए नंगे पाँव से गाड़ी के पास आकर बोले…

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Added by rajesh kumari on January 23, 2017 at 10:56am — 31 Comments

जाड़ा

कुहरे की इक चादर ओढ़े, देखो जाड़ा आया है |

लगातार गिरते पारे ने, फिर कुहराम मचाया है||



इसके आगे आज सभी ने, अपना शीश नवाया है |

सूरज का तेज हुआ मद्धिम, चाँद खूब मुस्काया है ||



हर कोई यहाँ दिख रहा है, मख़मली दुशाला ओढ़े |

कपड़े सबके ऊनी फिर भी, साथ न यह जाड़ा छोड़े ||



कही ठिठुरते दादा दादी, कही काँपती नानी है |

कही रात भर गिरता पाला, कही बर्फ सा पानी है ||



सन-सन चलती हवा रात दिन, थर-थर हाड़ कपाती है |

जलता अलाव मिले जहाँ भी,… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 23, 2017 at 9:13am — 10 Comments

नवगीत- आया जाड़ा हाड़ कँपाने

अँगड़ाई ले रही प्रात है,

कुहरे की चादर को ताने।

ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,

आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

तपन धरा की शान्त हो गयी,

धूप न जाने कहाँ खो गयी।

जिन रवि किरणों से डरते थे,

लपट देख आहें भरते थे।

भरी दुपहरी तन जलता था,

बड़ी मिन्नतों दिन ढलता था।

लेकिन देखो बदली ऋतु तो,

आज वही रवि लगा सुहाने।

आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

गमझा भूले मफ़लर लाये,

हाथों में दस्ताने आये।

स्वेटर टोपी जूता मोजा,

हर आँखों ने इनको…

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Added by डॉ पवन मिश्र on January 22, 2017 at 8:30pm — 11 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
परिवर्तन....(नवगीत) // डॉ० प्राची

नियति चक्र में 

परिवर्तन निश्चित अंकित है,

होना है, हो कर रहता है...

समय प्रबल है 

जोड़-तोड़ से कब बंधता है 

बहना है, प्रतिपल बहता है...

आँख मींचते 

आवरणों को क्यों पकड़ा है ?

छोड़ो इनको, हट जाने दो,

धुंध सींचते 

संबंधों के रिसते बादल

गर्जन करके छट जाने दो,

मकड़जाल में 

अपने मन के फँसे रहे तो

फिर क्या होगा? कुछ तो सोचो !

भीतर-बाहर

परिवर्तन तो करना होगा 

जमी सोच की परतें…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on January 22, 2017 at 8:00pm — 10 Comments

ग़ज़ल - झोंका कोई हिज़ाब उठाता ज़रूर है

221 2121 1221 212*

जुर्मो सितम में उसके इज़ाफ़ा ज़रूर है ।

चेहरा जो आईनो से छुपाता ज़रूर है ।।



गोया वो मेरा साथ निभाया ज़रूर है ।

पर हुस्न का गुरूर जताता ज़रूर है ।।



महफ़ूज़ मुद्दतों से यहां दिल पड़ा रहा ।

तुमने मेरा गुनाह संभाला ज़रूर है ।।



बेख़ौफ़ जा रहा है वो बारिश में देखिये ।

शायद किसी से वक्त पे वादा ज़रूर है।।



आबाद हो गया है गुलिस्तां कोई मगर ।

निकला किसी के घर का दिवाला ज़रूर है।।



गुम हो सके न आज तलक भी ख़याल से… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 22, 2017 at 3:05pm — 14 Comments

रेत पर कोई हुनर होने को है (ग़ज़ल)

2122 2122 212

उसका हमला रात भर होने को है
कब तलक जागूँ? सहर होने को है

भीड़ सारी उस तरफ जुटने लगी
मोजिज़ा कोई जिधर होने को है

लौ चिराग़ों की हवा ने तेज़ की
ख़ाक लेकिन मेरा घर होने को है

मिल गया इक ख़ूबसूरत हमसफ़र
अब तो सहरा भी डगर होने को है

आधुनिकता के नशे में डूब कर
हर बशर अब जानवर होने को है

लहलहाने को है फ़स्ल अश्क़ों की "जय"
रेत पर कोई हुनर होने को है

(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by जयनित कुमार मेहता on January 21, 2017 at 7:04pm — 13 Comments

किसका हक़ ? (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"नहीं, अनवर मियाँ, यह तो नहीं होने दूंगी!" जुबेदा ने पोटली अपनी ओर खींचते हुए कहा- "मेरे अब्बू के ख़ून- पसीने की कमाई का ज़ेवर है यह और मेरी जमा पूँजी!"



"लेकिन मुझे मिले दहेज़ पर मेरा हक़ है! मैं जो चाहूं, करूँगा!" अनवर ने उसको आँखें दिखाते हुए पोटली फिर अपनी तरफ़ खींच ली।



"है, तुम्हारा हक़ है, और मेरा भी! लेकिन मेरी मर्ज़ी के बग़ैर तुम इसे अपनी अम्मीजान के इलाज़ में हरग़िज़ नहीं लगा सकते!"



"तो क्या तुम उन्हें अपनी अम्मी की तरह नहीं मानतीं!"



"मानती… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 21, 2017 at 5:00pm — 9 Comments

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