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गजल( देखिये सबको रिझातीं टोपियाँ)

    2122   2122   212 

देखिये सबको रिझातीं टोपियाँ
नाच कितनों को नचातीं टोपियाँ।1

आपकी धोती कहाँ महफूज है?
फाड़कर कुर्ते बनातीं टोपियाँ।2

जो नहीं सोचा कभी था आपने
रंग वैसे भी दिखातीं टोपियाँ।3

पीठ पर दे हाथ वे पुचकारतीं
पेट में ख़ंजर चुभातीं टोपियाँ।4

दोस्ती का दे हवाला हर बखत
दुश्मनी फिर-फिर निभातीं टोपियाँ।5

रोशनी भी क्या टिकेगी सामने
ताप हरतीं, चमचमातीं टोपियाँ।6

भेद बढ़ते जा रहे सब अनवरत
राज कितने ही खपातीं टोपियाँ।7
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on January 29, 2017 at 9:59pm
आदरणीय पंकज मिश्र जी, दिली आभार व्यक्त करता हूँ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on January 29, 2017 at 8:50pm
आदरणीय मनन सर इस सुंदर ग़ज़ल को नमन
Comment by Manan Kumar singh on January 26, 2017 at 10:52pm
आदरणीय मिथिलेश जी,आभार व्यक्त करता हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 26, 2017 at 9:55pm

आदरणीय मनन जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Manan Kumar singh on January 26, 2017 at 9:03pm
आदरणीय समर जी नमस्ते। आपकी सहमति के लिए आभारी हूँ।
Comment by Samar kabeer on January 26, 2017 at 3:35pm
जनाब मनन जी आदाब,बढ़िया,बधाई आपको ।

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