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गजल( आज तुम यह क्या किये बैठे हुए हो)

 2122  2122  2122 

आज तुम यह क्या किये बैठे हुए हो
बेवजह का गम लिये बैठे हुए हो।1

कौन सुनता है यहाँ कुछ बात ढब की
दिल नसीहत को दिये बैठे हुए हो।2

और होता मौन का मतलब यहाँ पर
क्या पता क्यूँ मुँह सिये बैठे हुए हो।3

बदगुमानों की यहाँ बल्ले हुई बस
आशिकी का भ्रम जिये बैठे हुए हो।4

एक से बढ़ एक नगमे बुन रहे सब
तुम  पुरानी धुन लिये बैठे हुए हो।5

काफिले बढ़ते गये सब साथियों के
तुम यहाँ किसके लिये बैठे हुए हो।6

माँगना पड़ता यहाँ कुछ बोलकर
क्यूँ 'मनन' सब तोलकर बैठे हुए हो।7
मौलिक व अप्रकाशित @मनन


Views: 883

Comment

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Comment by Manan Kumar singh on February 4, 2017 at 8:56am
आभार आदरणीय आरिफ़ भाई
Comment by Mohammed Arif on February 2, 2017 at 10:07pm
आदरणीय मनन कुमार जी, एक अच्छी ग़ज़ल के लिए मुबारक़बाद क़ुबूल करें ।
Comment by Manan Kumar singh on February 2, 2017 at 1:53pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी भाई, आपका बहुत बहुत आभारी हूँ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 11:35am

आद. मनन भाई ,इस सुदर  गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Manan Kumar singh on February 2, 2017 at 9:24am
आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भाई।
Comment by Manan Kumar singh on February 2, 2017 at 9:24am
आपका बहुत बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 2, 2017 at 9:17am

आदरणीय मनन भाई , खूब सूरत गज़ल के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Manan Kumar singh on February 1, 2017 at 9:48pm
आभारी हूँ आदरयोग्य बृज भाई
Comment by Manan Kumar singh on February 1, 2017 at 9:47pm
आदरणीय समर साहिब,मेरी समझ में 'बैठे हुए' और 'हुए बैठे' में फर्क हो जायेगा शायद,सादर।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 1, 2017 at 9:03pm
बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...

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