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नवगीत- आया जाड़ा हाड़ कँपाने

अँगड़ाई ले रही प्रात है,

कुहरे की चादर को ताने।
ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

तपन धरा की शान्त हो गयी,
धूप न जाने कहाँ खो गयी।
जिन रवि किरणों से डरते थे,
लपट देख आहें भरते थे।
भरी दुपहरी तन जलता था,
बड़ी मिन्नतों दिन ढलता था।
लेकिन देखो बदली ऋतु तो,
आज वही रवि लगा सुहाने।
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

गमझा भूले मफ़लर लाये,
हाथों में दस्ताने आये।
स्वेटर टोपी जूता मोजा,
हर आँखों ने इनको खोजा।
सैंडिल रख दी अब बक्से में,
हाफ शर्ट भी सब बक्से में।
अलमारी में टँगे हुए वो,
बाहर निकले कोट पुराने।
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

लइया पट्टी मूँगफली हो,
ताजे गुड़ की एक डली हो।
गजक बताशे तिल के लड्डू,
भूल गए सब लौकी कद्दू।
मटर टमाटर गोभी गाजर,
स्वाद भरें थाली में आकर।
कड़क चाय औ गरम पकौड़ी,
जाड़े के हैं यार सयाने।
ओढ़ रजाई पड़े रहो सब,
आया जाड़ा हाड़ कँपाने।।

✍डॉ पवन मिश्र

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by डॉ पवन मिश्र on January 27, 2017 at 1:42pm

आद गिरिराज जी। आपकी टिप्पणी से नव ऊर्जा का संचार होता है। लिखना सार्थक सा लगने लगता है। हार्दिक आभार

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 27, 2017 at 1:40pm

आद डॉ आशुतोष जी। आपकी टिप्पणियों के लिये हार्दिक आभार। लेखन की कक्षा का मैं भी एक नव शिक्षार्थी हूँ इसलिये आपके प्रश्न का यथोचित उत्तर नहीं है मेरे पास। शायद गीत वह विधा है, जिसमे मुखड़े और अन्तरे के चरण निश्चित होते हैं और नवगीत में पंक्तियों की बाध्यता नही होती है, दो पंक्तियों का मुखड़ा भी हो सकता है और दस का अंतरा भी,,,,शेष सुधीजन के हवाले

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 27, 2017 at 1:36pm

आद मिथिलेश जी, इस उत्साहवर्धन के लिये हृदयतल से आभार


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 26, 2017 at 8:18pm

आदरणीय पवन भाई , बढ़िया गीत रचना हुई है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार कीजिये ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 25, 2017 at 5:19pm

आदरणीय पवन जी ..जाड़े का मंजर आँखों के सामने हू बहू उतारते इस शानदार नव गीत के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें...इस आदरणीय मंच पर सीखने सिखाने के अद्भुत तरीके के बाद भी मैं आज तक गीत और नवगीत के प्रसंग पर थोडा उलझ जाता हूँ ..कृपया इस उलझन का निवारण करने का कष्ट करें .. मेरे निवेदन को अन्यथा मत लीजियेगा ...रचना पर ढेर सारी बधाई के साथ सादर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 25, 2017 at 12:46am

आदरणीय पवन जी, जाड़े पर बढ़िया गीत लिखा है. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 24, 2017 at 9:19pm

आद. समर साहब। आपकी टिप्पणी सदैव ही उत्साह बढ़ाती है। आपका मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन सदैव मिलता रहे, यही कामना है। हार्दिक आभार

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 24, 2017 at 9:17pm

आद सुरेन्द्र नाथ जी। आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी का हृदय से आभार

Comment by डॉ पवन मिश्र on January 24, 2017 at 9:16pm

आद. प्रतिभा पाण्डेय जी। पंक्तियों के भाव आप तक पहुंच गए। लिखना सार्थक हुआ। हार्दिक आभार

Comment by Samar kabeer on January 24, 2017 at 2:40pm
जनाब डॉ.पवन मिश्र जी आदाब,जाड़े के मौसम को लेकर अच्छा नवगीत लिखा आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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