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ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ

22 22 22 2


नवजीवन की आशा हूँ।
दीप शिखा सा जलता हूँ।।

रक्त स्वेद सम्मिश्रण से।
लक्ष्य सुहाने गढ़ता हूँ।।

जीवन के दुर्गम पथ पर।
अनथक चलता रहता हूँ।।

प्रभु पर रख विश्वास अटल।
बाधाओं से लड़ता हूँ।।

घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।

भावों का सम्प्रेषण मैं।
शंखनाद हूँ कविता हूँ।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2017 at 9:22pm
आदरणीय पवन मिश्र जी, सुन्दर भावों से सजी इस बेहद खूबसूरत रचना के लिए बहुत बहुत बधाई आपको

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 8, 2017 at 3:55pm

आदरणीय पवन जी, छोटी बह्र में बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने. शेर-दर-शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. सादर 

Comment by डॉ पवन मिश्र on February 7, 2017 at 3:59pm

आद. समर साहब, तहे दिल से शुक्रिया। मूल में सुधार कर् लिया है। पुनः आभार

Comment by डॉ पवन मिश्र on February 7, 2017 at 3:58pm

जनाब मोहम्मद आरिफ साहिब, बहुत बहुत शुक्रिया

Comment by Samar kabeer on February 6, 2017 at 6:11pm
जनाब डॉ.पवन मिश्र साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबफ पेश करता हूँ ।
चौथे शैर के ऊला में ऐब-ए-तनाफ़ुर देखिये,'पर रख' ।
Comment by Mohammed Arif on February 6, 2017 at 5:44pm
आदरणीय पवन मिश्र जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल के लिए दिली मुबारक़बाद क़ुबूल करें ।
Comment by डॉ पवन मिश्र on February 6, 2017 at 7:10am

आद. दिनेश कुमार 'दानिश' जी, पंक्तियां आप तक पँहुची,,,लिखना सार्थक हुआ। आभार आपका

Comment by डॉ पवन मिश्र on February 6, 2017 at 7:08am

आद. सतविंद्र कुमार राणा जी, बहुत बहुत धन्यवाद आपको

Comment by डॉ पवन मिश्र on February 6, 2017 at 7:07am

आद. सौरभ जी, आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये हृदयतल से आभार।

Comment by दिनेश कुमार on February 6, 2017 at 7:02am
घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।
उम्दा ग़ज़ल। वाह वाह। डॉ साहब। बहुत खूब

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