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भोजपुरी साहित्य

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Comment by mrs manjari pandey on December 18, 2012 at 7:16pm

भोजपुरी माई के समर्पित एगो गीत -
रहिया मोती बिछाइल बटोर ना .

चलली  धीरे धीरे एक -एक डगरिया
लोगवा से गउवा आइ गइली नगरिया
समुन्दर हम होई गइली आइ के रजधानिया
हिलोर ना
भरल रतन हियरवा हिलोर ना
 रहिया .......

घरवा में रहि के कुछु नाही कईली
देस विदेस जाई के नउवा कमईलीं
बिरह के घाव अब ई कईसों पुरवली
दिदोर ना घाऊ वा बाटे दिदोर ना
 रहिया .........

जेइ सपनवा के ओढ़ी हम सुतलीं
एकरा अलावे कुछु बूझत न रहलीं
सपनवा संजवत जिनगिया बितवली
झिंझोर  ना
अन्हिया से इ सपनवा झिंझोर ना
रहिया ............

मनवा के ताना बाना बीनत रहलीं
कतना त ताना मेहना सहत रहलीं
हार बाकि कबहूँ न रजको हं मनली
बिटोर ना
तनकी मिलल अंजोरिया बिटोर ना
 रहिया ..............


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 15, 2012 at 6:32pm

आदरणीया मंजरी पाण्डेय जी, इ दू लाईन हियरा के ख़ुशी के पूरा बयान कर देत बा, बधाई रउआ के |

Comment by mrs manjari pandey on December 15, 2012 at 6:21pm

             दू गो इ पंक्ति भोजपुरी के सुखद समाचार पर।

             कहवाँ से आइल किरिनिया हो हियरा हुलसाईल
             चनवा क जइसे चननिया हो अँगना अन्जोराइल।

Comment by Sanjay Rajendraprasad Yadav on November 28, 2012 at 10:25am

अपनी माटी के महक जब ह्रदय में एहसास करावेला त ई मन भाव से भर जाला ,भोजपुरी प्यार दुलार त जनम-जनम का नाता बाय जे कभी ना टूट सकी।।।।।।।।।।।।

Comment by मनोज कुमार सिंह 'मयंक' on March 14, 2012 at 9:22am

भोजपुरी में होत बा, हाटे हॉट प्रयोग|

लड़िकाई में लगत हौ, इशक,विशक क रोग|

इशक,विशक क रोग,नीम पर चढल करैला|

बुढवा हौ मदमस्त की बिगडल जात गदेला|

कईसे मरद कहावत बाट, पहिन ल चूड़ी|

कहें मनोज कुमार श्लील अब ना भोजपुरी||

Comment by sujeet kumar yadav on September 3, 2011 at 2:11am

आँख से लोर ढरकावाल जीन करा,

दिल के बात बतावल जीन करा|

लोग मुट्ठी मे नून लेके घूमेलन,

आपन जखम देखावल जीन करा|

Comment by sanjiv verma 'salil' on May 13, 2011 at 6:17pm
भोजपुरी के संग: दोहे के रंग

संजीव 'सलिल'

भइल किनारे जिन्दगी, अब के से का आस?
ढलते सूरज बर 'सलिल', कोउ न आवत पास..
*
अबला जीवन पड़ गइल, केतना फीका आज.
लाज-सरम के बेंच के, मटक रहल बिन काज..
*
पुड़िया मीठी ज़हर की, जाल भीतरै जाल.
मरद नचावत  अउरतें, झूमैं दै-दै ताल..
*
कवि-पाठक के बीच में, कविता बड़का सेतु.
लिखे-पढ़े आनंद बा, सब्भई जोड़े-हेतु..
*
रउआ लिखले सत्य बा, कहले दूनो बात.
मारब आ रोवन न दे, अजब-गजब हालात..
*
पथ ताकत पथरा गइल, आँख- न  दरसन दीन.
मत पाकर मतलब सधत, नेता भयल विलीन..
*
हाथ करेजा पे धइल, खोजे आपन दोष.
जे नर ओकरा सदा ही, मिलल 'सलिल' संतोष..
*
मढ़ि के रउआ कपारे, आपन झूठ-फरेब.
लुच्चा बाबा बन गयल, 'सलिल' न छूटल एब..
*
कवि कहsतानी जवन ऊ, साँच कहाँ तक जाँच?
सार-सार के गह 'सलिल', झूठ-लबार न बाँच..
***********************************

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 17, 2011 at 7:05pm
जय हो देवकांत भाई , एकदम साच बात रौआ कहनी हा आ उहो बिना लाग लपेट के | स्वागत बा राउर |
Comment by देवDevकान्‍तKant पाण्‍डेयPandey on January 17, 2011 at 4:32pm

अपने माटी के महक जहां रही उहवां त हम रहबे करब ।

 
 
 

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