जेल से रिहा होकर बहुत प्रसन्न था वो , कदम उसके उत्साह का साथ नहीं दे पा रहे थे | बस मन में एक ही इच्छा , कितनी जल्दी पहुंचे अपने घर , अपनों के बीच | भागते हुए अपने मोहल्ले में घुसा , नुक्कड़ की दुकान वाले चाचा ने जैसे अनदेखा कर दिया | उसे थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो घर की ओर लपका | अचानक उसके कान में आवाज़ आई " किसने सोचा था कि ये भी इसमें शामिल हो सकता है , कितना मासूम चेहरा और ऐसी नापाक हरक़त "|
शक के बिना पर उसकी गिरफ्तारी हुई थी , वज़ह थी उसके कुछ दोस्त जो सामाजिक…
Added by विनय कुमार on March 24, 2015 at 10:48pm — 14 Comments
Added by VIRENDER VEER MEHTA on March 24, 2015 at 9:56pm — 25 Comments
अपना मयंक....
ये दर्द था या
स्मृति का संदेश
मैं समझ ही न सका
बस जल भरे नयनों से
उस मयंक में
अपना मयंक ढूंढता रहा
सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित
Added by Sushil Sarna on March 24, 2015 at 9:24pm — 8 Comments
१२२२ १२२२
जिसे हर शय में देखा था
नजर का मेरी धोखा था।
भरम तेरी निगाहों का
कोई जादू अनोखा था।
सदी बीती जहां लम्हों
मेरा जग वो झरोखा था।
बरसतीं खार आखें अब
लबों सागर जो सोखा था।
गया न इश्क खूँ रब्बा
चढ़ाया रंग चोखा था।
नसीबी ‘’जान’’ रोये क्यूँ
ख़ुदा का लेखा जोखा था।
******************************************
मौलिक व् अप्रकाशित (c) ‘जान’…
ContinueAdded by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 24, 2015 at 8:12pm — 12 Comments
Added by दिनेश कुमार on March 24, 2015 at 8:03pm — 9 Comments
मन वीणा के झनके तार ,
पिया मिलन की आई रात |
सकुचाती , इठलाती पहुँची द्वार ,
पिया मिलन की मन में आस ||
उनके रंग में रंग जाऊँगी ,
दूजा रंग न मन भाऊँगी |
अधरों पर अधरों की लाली ,
खिल मन में इठलाऊँगी ||
आज रति ने छेड़ी मधुतान ,
पिया मिलन की मन में आस ||
गलबाहों का हार पहनाकर ,
मंद – मंद मुसकाऊँगी |
श्वासों की मणियों से ,
भावों को खूब सजाऊँगी ||
आज आया जीवन में मधुमास ,
पिया…
ContinueAdded by ANJU MISHRA on March 24, 2015 at 5:33pm — 10 Comments
(यहाँ प्रति दोहे में वृत्यानुप्रास है किन्तु सम्पुर्ण रचना में छेकानुप्रास है अंतर यह है की वृत्यानुप्रास में एक ही वर्ण की पुनरावृत्ति होती है जबकि छेका में अनेक वर्णों की )
गा-गाकर गौरव गिरा गरिमामय गन्धर्व
गीर्वाण गुरु, गीतिमय , गान-ज्ञान गुण गर्व I
भक्त भगवती भारती भूरि भावमय भव्य
भावशवलता, भ्रान्तिता भ्रमित भनिति भवितव्य I
वीणापाणि वरानना वरे विदुष विद्वान
वाणी-वाणी वत्सला वर्ण-वर्ण वरदान I
शुभ्र…
ContinueAdded by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 24, 2015 at 11:00am — 31 Comments
१२२२ १२२२ १२२२ १२२२
इशारों को शरारत ही कहूं या प्यार ही समझूं
कहूं मरहम इसे या खंजरों का वार ही समझूं
कशिश बातों में तेरी अब अजब सी मुझ को लगती है
तेरी बातों को बातें ही या फिर इकरार ही समझूं
वो डर के भेडियों से आज मेरे पास आये हैं
कहूं हालात इसको या कि मैं ऐतवार ही समझूं
तेरी नजरों ने कैसी आग सीने में लगाई है
तुझे कातिल कहूं मैं या इसे उपकार ही समझूं
पड़े ओंठों पे ताले पलकें उठती…
ContinueAdded by Dr Ashutosh Mishra on March 24, 2015 at 10:00am — 22 Comments
Added by Dr. Vijai Shanker on March 24, 2015 at 9:31am — 16 Comments
गुल से है परेशां गुलिस्तां सारा
भंवरे से दिल लगाने की ज़िद उसकी नहीं गवारा
मगर गुल जानता है कि आज काँटों का साथ
फिर माली के हाथों किसी अंजान के साथ
गुलशन से बिदाई का मसला है सारा
बिछुड़ने का फिक्र नहीं उसको
कल का क्या.... आज तो जी लेने दो उसको
काट शाख़ से सब सूंघेंगे एक दिन
फिर अगले दिन मसल डालेंगे ये उसको
भंवरा तो रोज़ आ कर चूमता है
मंडराता है चारो तरफ लुभाता है उसको
अपनी गुंजन के गीत सुनाता है
और सुबह फिर मिलने का वादा दे जाता…
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 24, 2015 at 8:16am — 10 Comments
दो विदाई, अब तो कहीं दूर निकल जाएँगे ,
अब तो ये गीत कहीं और जा के गाएँगे !
आदमी कुछ भी नहीं, एक एहसास तो है,
शुन्य जैसा ही सही, एक आकाश तो है !
टूटा बिखरा हो कहीं, एक विश्वास तो है,
इस हक़ीकत को हम ,अब न भुला पायेंगे !
दो विदाई, अब तो कहीं दूर निकल जाएँगे ,
अब तो ये गीत कहीं और जा के गाएँगे !!
© हरि प्रकाश दुबे
"मौलिक व अप्रकाशित
Added by Hari Prakash Dubey on March 24, 2015 at 2:57am — 14 Comments
२१२ २१२ २१२ २१२
ज़िंदगी किस कदर इक सफ़र बन गयी
अनलिखी ये कहानी खबर बन गयी
बात छोटी सही सबके मुह जो चढ़ी
बात खींची गयी फिर रबर बन गयी
राह चलते हुये बज उठी सीटियाँ
सादगी कामिनी की ज़हर बन गयी
बेवफाई मिली आग दिल में जली
बेअदब आज मेरी नज़र बन गयी
चाह हमने रखी रोशनी की अगर
आरज़ू ही हमारी कबर बन गयी
ईश्क की इक नज़र कैद में जो मिली
हथकड़ी टूटकर इक तबर बन…
ContinueAdded by Nidhi Agrawal on March 23, 2015 at 1:00pm — 14 Comments
हर हीरा किसी हसीना के
गले का हार नहीं बनता !
हर हसीना के गले को
हीरों का हार नहीं मिलता !
कई हीरे ज़मी में दबे रहते हैं
कोयलों की गोद में
सोये पड़े रहते हैं !
उनको तराशने वालों का
औजार नहीं मिलता !
न कमी हसीना के हुस्न में है
न हीरों की गुणवत्ता में !
बस किस्मत के खेल हैं सारे
किसी को वोह मिल जाते हैं
और हमें प्यार नहीं मिलता !!
***************************
मौलिक व अप्रकाशित
Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on March 23, 2015 at 12:42pm — 15 Comments
चलते चलते ……
1.
एक कतरा
देर तक
बहते बहते
कपोल पर ही सो गया
शायद
अभी इंतज़ार बाकी था
2.
ये अलस्सुब्ह
किसकी नमी को छूकर
बादे सबा आई है
खुली पलक का
कोई ख़्वाब
सिसकता रह गया शायद
3.
तेरे हर वादे पे
यकीं करता रहा
पर तुझे यकीं न आया
मैं हर लम्हा तुझपे
सौ सौ बार मरता रहा
मेरी मौत को भी तूने
मेरी नींद समझा
नज़र भर के भी तूने
न देखा मुझको …
Added by Sushil Sarna on March 23, 2015 at 12:30pm — 28 Comments
| १२२२ १२२२ १२२२ १२२२ - हजज मुसम्मन सालिम |
| चमन में फूल खिलते हैं खुशी का राज होता है | |
| ख़ुशी में झूमते भौंरे मजे से काज होता है | |
| खिले जब फूल डाली में नजारा ही बदल जाये… |
Added by Shyam Narain Verma on March 23, 2015 at 12:15pm — 12 Comments
बह्र : २१२ २१२ २१२ २१२
ज़ुल्फ़ का घन घुमड़ता रहा रात भर
बिजलियों से मैं लड़ता रहा रात भर
घाव ठंडी हवाओं से दिनभर मिले
जिस्म तेरा चुपड़ता रहा रात भर
जिस्म पर तेरे हीरे चमकते रहे
मैं भी जुगनू पकड़ता रहा रात भर
पी लबों से, गिरा तेरे आगोश में
मुझ पे संयम बिगड़ता रहा रात भर
जिस भी दिन तुझसे अनबन हुई जान-ए-जाँ
आ के ख़ुद से झगड़ता रहा रात भर
---------
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 23, 2015 at 11:54am — 22 Comments
गौरैया
खुश थी
चोंच मे सतरंगी सपने लिये
आसमान मे उड रही थी
उधर,
गिद्ध भी खुश था
गौरैया को देखकर
उसने अपनी पैनी नजरे गडा दी
मासूम गौरैया पे,
और दबोचना चाहा अपने खूनी पंजे मे
गौरैया, घबरा के भागी पर कितना भाग पाती ??
आखिर,
गिद्ध के पंजे मे आ ही गयी
गौरैया फडफडा रही थी, रो रही थी
गिद्ध खुश था अपना शिकार पा के
कुछ देर बाद
गौरैया अपने नुचे और टूटे पंखों के साथ
लहूलुहान जमीं पे पडी…
ContinueAdded by MUKESH SRIVASTAVA on March 23, 2015 at 11:30am — 9 Comments
221 1222 221 1222
तू आज नहीं आयी तो जान ये जानी है
मैं रोज कहूँ ऐसा ये बात पुरानी है
......
कुछ वादे तेरे झूठे कुछ तोड दिये मैंने
ये कैसी मुहब्बत है ये कैसी कहानी है
...
बस चाँद सितारे हैं जो साथ जगे मेरे
उनके ही सहारे से अब याद भुलानी है
..
जिस रोज उतर जाये उस रोज चले आना
कुछ दिन ही चलेगा बस ये जोश जवानी है
....
सच यार कहूँ दिल से हैं बात ये सब झूठी
तेरा मैं दिवाना हूँ तू मेरी दिवानी है
--------------…
Added by umesh katara on March 23, 2015 at 9:30am — 18 Comments
212---1222---212---1222 |
|
धूप भी नहीं मिलती छाँव भी नहीं मिलती |
ताकतों के साए में ज़िन्दगी नहीं मिलती |
|
ज़िन्दगी मुकम्मल हो ये कभी नहीं… |
Added by मिथिलेश वामनकर on March 23, 2015 at 9:17am — 38 Comments
“अरे!! भाई.. दोनों में से एक बैल तो अभी दांत वाला है, ठीक से कीमत बता. फिर बिना दांत वाला वैसे ही लेजा, उसका क्या करूँगा मैं..? आखिर खली-भूसा भी महंगा पड़ता है..”
“पटेल भैया .. दांत वाले की ही कीमत है, बुढ्ढे बैल को मुझ से भी कौन खरीदेगा..? यहीं खूंटे भी ही मरने दो..”
नजदीक ही पटेल भैया के बीमार पिता, चारपाई पर पड़े सारी बातें सुन रहे थे...
जितेन्द्र पस्टारिया
(मौलिक व् अप्रकाशित)
Added by जितेन्द्र पस्टारिया on March 22, 2015 at 9:21pm — 28 Comments
2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
1999
1970
आवश्यक सूचना:-
1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे
2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |
3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |
4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)
5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |
© 2026 Created by Admin.
Powered by
महत्वपूर्ण लिंक्स :- ग़ज़ल की कक्षा ग़ज़ल की बातें ग़ज़ल से सम्बंधित शब्द और उनके अर्थ रदीफ़ काफ़िया बहर परिचय और मात्रा गणना बहर के भेद व तकतीअ
ओपन बुक्स ऑनलाइन डाट कॉम साहित्यकारों व पाठकों का एक साझा मंच है, इस मंच पर प्रकाशित सभी लेख, रचनाएँ और विचार उनकी निजी सम्पत्ति हैं जिससे सहमत होना ओबीओ प्रबन्धन के लिये आवश्यक नहीं है | लेखक या प्रबन्धन की अनुमति के बिना ओबीओ पर प्रकाशित सामग्रियों का किसी भी रूप में प्रयोग करना वर्जित है |