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जेल से रिहा होकर बहुत प्रसन्न था वो , कदम उसके उत्साह का साथ नहीं दे पा रहे थे | बस मन में एक ही इच्छा , कितनी जल्दी पहुंचे अपने घर , अपनों के बीच | भागते हुए अपने मोहल्ले में घुसा , नुक्कड़ की दुकान वाले चाचा ने जैसे अनदेखा कर दिया | उसे थोड़ा अजीब तो लगा लेकिन जल्दी जल्दी कदम बढ़ाते हुए वो घर की ओर लपका | अचानक उसके कान में आवाज़ आई " किसने सोचा था कि ये भी इसमें शामिल हो सकता है , कितना मासूम चेहरा और ऐसी नापाक हरक़त "|
शक के बिना पर उसकी गिरफ्तारी हुई थी , वज़ह थी उसके कुछ दोस्त जो सामाजिक और धार्मिक भेदभाव के विरोध में आवाज़ उठाते थे और कभी कभी देर रात तक उनकी बैठक चलती थी उसके घर | अदालत ने तो बरी कर दिया लेकिन समाज़ की सवालिया नज़रें उसका पीछा नहीं छोड़ रही थीं | जहाँ जाता , लोग पीठ पीछे कुछ न कुछ कह देते |
माँ उसके मन में चल रहे विचारों के झंझावात को समझ गयी | उसने प्यार से उसको समझाया " बाहरी जख्म तो भर जाते हैं लेकिन अंदरुनी जख्मों को भरने में समय लगता है | थोड़ा समय लगेगा और समाज़ भी तुम्हे रिहाई दे देगा "| उसने माँ की गोद में सर रखा और उसके मन की पीड़ा बह निकली |

मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by विनय कुमार on March 26, 2015 at 5:51pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय  लक्ष्मण रामानुज लडीवाला जी | ऐसी स्थिति से निकलने में माता पिता ही सबसे ज्यादा मदद कर सकते हैं ..

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on March 26, 2015 at 3:11pm

शक  के कारण भी अगर जेल हो जाएँ या पुलिस पकड़ कर ले  जाती  है तो मोहल्ले वाले भी  शक  की  नजरों से देखने लगते है | इस बार कोई जख्म हो गया वह भी अंदरूनी जख्म तो  फिर उसे भरने के समय तो लगता है | ऐसे में माँ-बाप और परिवार का प्यार ही सबसे बड़ा संबल  होता है | सुदर लघु  कथा के लिए बधाई श्री  विनय कुमार सिंह जी  

Comment by विनय कुमार on March 26, 2015 at 12:32pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय वीरेन्द्र मेहता जी..

Comment by विनय कुमार on March 26, 2015 at 12:32pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय हरी प्रकाश दुबे जी..

Comment by VIRENDER VEER MEHTA on March 26, 2015 at 10:28am

आदरणीय विनय कुमार जी कथा लाजवाब है,...... किये गए अपराध की अपेक्षा झूठ आरोप मन को अधिक पीड़ा देते है.......सुन्दर कथा के लिए बधाई स्वीकार करे.

Comment by Hari Prakash Dubey on March 26, 2015 at 9:55am

बहुत खूब कहा आपने आदरणीय विनय जी "बाहरी जख्म तो भर जाते हैं लेकिन अंदरुनी जख्मों को भरने में समय लगता है" बधाई आपको ! सादर 

Comment by विनय कुमार on March 26, 2015 at 8:29am

बहुत बहुत आभार आदरणीय कृष्ण मिश्रा जान गोरखपुरी जी ..

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on March 25, 2015 at 10:09pm

उम्दा लघुकथा पर बधाईयां आ० विनय जी!

Comment by विनय कुमार on March 25, 2015 at 9:01pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय  मिथिलेश वामनकर जी..

Comment by विनय कुमार on March 25, 2015 at 9:00pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी..

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