For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,169)


प्रधान संपादक
भारत भाग्य विधाता (लघुकथा)

"अरे ताऊ इलेक्शन आ गए हैं, इस बार वोट किस को दे रहे हो ?"

"अरे हमें तो अभी ये ही नहीं पता कि इस बार ससुरा खड़ा कौन कौन है।"

"एक तो वही कुर्सी पार्टी वाला है।"

"अरे वो चोर ? छोडो, साले पूरा देश लूट कर खा गये।"

"नई पार्टी वाला भी खड़ा है।" 

"कौन ? वो जो आपस में लोगों को लड़ाता फिरता है? दफ़ा करो उसको।"

"एक नीली पार्टी वाली भी है न।"

"उसको वोट दे दिया तो पीछे वाली बस्ती सर पर मूतेगी हमारे।"

"तो फिर कामरेडों को वोट किया जाए?"

"कौन वो ज़िंदाबाद मुर्दाबाद…

Continue

Added by योगराज प्रभाकर on June 2, 2015 at 12:25pm — 20 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
तेज़ है दुनिया की निगाह बहुत-ग़ज़ल

2122 1212 112/22
सर्द है आज मेरी आह बहुत
फिर उठी दिल में तेरी चाह बहुत

खुदनुमाई से बाज़ आ नादाँ
तेज़ है दुनिया की निगाह बहुत

तोड़ना दिल किसी का क्या मुश्किल
हाँ कठिन इश्क़ की है राह बहुत

सोच उनकी है साइलों जैसी
पर बने फिरते हैं वो शाह बहुत

हश्र के रोज़ देख लेना तुम्हें
याद आयेगा हर गुनाह बहुत

मौलिक,अप्रकाशित

Added by शिज्जु "शकूर" on June 2, 2015 at 11:30am — 7 Comments

खुदा है दिल में मेरी बात मान लो आशू

 1212   1212 1212 1212

बशर तमाम भीड़ में मुकाम ढूंढते रहे 

जमी पे हैं मगर फलक पे नाम  ढूंढते रहे 

हुनर तराशने की उम्र मस्ती में ही काटकर 

बिना हुनर मियां कहाँ पे काम ढूंढते रहे 

कभी भी बीज आम के चमन में बोये जब नहीं 

तो फिर चमन में क्यूँ यूं आप आम ढूंढते रहे 

जो रिंद हैं उन्हें तो मयकशी ही रास आयेगी 

वो मयकदे तलाशते हैं जाम ढूंढते रहे 

जतन तमाम ही किये पढ़ाने लाडले को जब 

तभी से मन ही मन वो…

Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on June 2, 2015 at 11:30am — 24 Comments

अधूरी कहानी ...(अगज़ल) ...इंतज़ार

पल्लू लहरा देते हैं वो हवा का रूख़ देख कर

बीमार हो जाते हैं हम भी हसीं दवा देख कर ! 

यूँ तो हम तुम्हारे सिवा किसी और पे मरते नहीं

महफ़िल हसीनाओं की हो तो शिरकत से डरते नहीं ! 

तूने अगर दिल में अपने मुझे घर दिया होता

तन्हाईओं की बारिशों से मैं ना गल गया होता ! 

सुना है मिजाज़ गर्म और नज़र तिरछी है उनकी

'इंतज़ार' हम कहाँ मरते हैं हसीं बद दुआओं से उनकी ! 

तुम बिन ख़त्म हो जायेगी तिलस्मी दुनियाँ मेरी

अधभरे पन्नों में…

Continue

Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on June 2, 2015 at 11:30am — 19 Comments

चुनाव-चर्चा(गजलनुमा कविता, मनन कु॰ सिंह)

अब चुनावों की आती बारात देखिये,

लुटता है कौन अब इस रात देखिये।

जात-पाँत की चर्चा जोरों की होगी,

पहले देखी,फिर से यह बात देखिये।

क्या होगा,न होगा, है सब गाछ पर,

है नमूनों की बनती जमात देखिये।

सहेजने में लगे हैं छितराई छतरी,

बातों की तो इनकी बिसात देखिये।

कन्हुआ-कन्हुआ गिनते सब कुर्सी,

दिखा रहे, इनकी औकात देखिये।…

Continue

Added by Manan Kumar singh on June 2, 2015 at 10:00am — 4 Comments

यातना ( लघुकथा )

"पहले तो हमें नौकरी ही नहीं मिलती। अगर मिल भी जाए तो सालों साल रगड़ते रहो, कोई प्रमोशन नहीं। और एक ये हैं ?"

"और लो जन्म ऊँची जात में।"

पिघले हुए सीसे की तरह ये शब्द उसके कानों में उतर रहे थे । 

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on June 2, 2015 at 1:00am — 17 Comments

मैं नहीं लिखता कोई मुझसे लिखाता है !

मैं नहीं लिखता ;

कोई मुझसे लिखाता है !

कौन है जो भाव बन ;

उर में समाता है !

....................................

कौंध जाती बुद्धि- नभ में

विचार -श्रृंखला दामिनी ,

तब रची जाती है कोई

रम्य-रचना कामिनी ,

प्रेरणा बन कर कोई

ये सब कराता है !

मैं नहीं लिखता ;

कोई मुझसे लिखता है !

.........................................................

जब कलम धागा बनी ;

शब्द-मोती को पिरोती ,

कैसे भाव व्यक्त हो ?

स्वयं ही शब्द…

Continue

Added by shikha kaushik on June 1, 2015 at 11:00pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मुहब्बत का मेरी कोई नशा है क्या नहीं (ग़ज़ल 'राज')

१२२२ १२२२ १२२२ १२

तेरी तहरीर में हर्फ़े वफ़ा है क्या  नहीं

कहीं दिल में मेरी कोई जगा (जगह )है क्या  नहीं

 

पँहुचते ही नहीं मुझ तक कभी तेरे ख़ुतूत

लिखा उन पर मेरे घर…

Continue

Added by rajesh kumari on June 1, 2015 at 9:30pm — 21 Comments

खुदाया करम हो

बहरे मुतकारिब मुसम्मन (8) सालिम

अरकान-122 122 122 122

फऊलुन फऊलुन फऊलुन फऊलुन

----------------------------

नजर में हया हो सभी रुख नरम हो।

खुदाया करम हो,करम हो करम हो।

******

मिले अक्ल सबको दिलों को मुहब्बत,

करें सब दुआ ये न कोई सितम हो।

******

लगे भी ठगी का हमें जो पता तो,

भूलें दुश्मनी सब सुहाना वहम हो।

******

जलें चाँद तारें मुड़े हर सहारे,

मेरे हाथ में हाथ तेरा सनम हो।

******

रवायत न रस्में न बंधन रहे… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 1, 2015 at 6:51pm — 10 Comments

मैं कहां पर रहूँ ?

मैं  यहां  पर  रहूँ  या  वहां  पर  रहूँ

ऐ  खुदा  तू  बता  मैं  कहां  पर रहूँ ?

 

एक  साया   मुझे  आपका   जो  मिले

फ़िक्र क्या फिर कहाँ किस मकां पर रहूँ I

 

जिन्दगी  आज  तो  है  तिजारत हुयी   

फर्क ये है कि  मैं किस  दुकां  पर रहूँ I

 

हो  रहम  मालिकों  की मयस्सर मुझे 

पंचवक्ता  तेरी   मैं   अजां  पर  रहूँ I

 

याद   तेरी  करूं …

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 1, 2015 at 11:00am — 24 Comments

कोई सुने तो बयाँ दिल का दर्द करता हूँ

मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन/फ़इलुन



मैं कैसे कर्ब से तकलीफ़ से गुज़रता हूँ

कोई सुने तो बयाँ दिल का दर्द करता हूँ



तमाम टैक्स चुकाता हूँ ज़िंदा रहने के

प शाईरी का अलग से लगान भरता हूँ



यही सबब है ,मुझे कम ही लोग जानते हैं

मैं इन फ़ुज़ूल की रुसवाईयों से डरता हूँ



अज़ल से आज तलक सिलसिला ये जारी है

मैं रोज़ जीता हूँ दुनिया में रोज़ मरता हूँ



यही तो है,मिरे फ़न का कमाल,देखो तो

जहाँ पे मिटते हैं सब लोग,मैं सँवरता हूँ



वो जिस… Continue

Added by Samar kabeer on June 1, 2015 at 11:00am — 29 Comments

उसके हिस्से का उजाला (लघुकथा)

" अरे छोटका क माई , देख तो तनिख । काम भर का पत्तल बन गया है न की अउर बनायें "। मुसहराने का दुखिया बहुत खुश था , आखिरकार गाँव में शादी थी और पत्तल उसी के यहाँ से जाती थी ।

" काल तनिक अउर पत्तल बना लेना , कहीं कम न पड़ जाये । याद है न पिछले बियाह में घट गया था पत्तल , केतना गाली सुनाये थे हमको अउर पइसो पूरा नहीं मिला था "। दुखिया ने हामी में सर हिलाया , कइसे भुला सकता था उसको ।

अगले दिन भिन्सहरे ही वो लग गया अउर पत्तल बनाने में , इस बार कम न पड़े । छोटका भी लगा हुआ था उसके साथ और…

Continue

Added by विनय कुमार on June 1, 2015 at 10:30am — 18 Comments

ग़ज़ल-नूर -अब ख़लाओं की मेज़बानी दे.

२१२२/१२१२/२२ (११२)
या ख़ुदा ऐसी ला-मकानी दे
अब ख़लाओं की मेज़बानी दे.
.
कितना आवारा हो गया हूँ मैं
ज़िन्दगी को कोई मआनी दे.
.
यूँ न भटका मुझे सराबों में
अपने होने की कुछ निशानी दे.      
.
सच मेरा कोई मानता ही नहीं
सच लगे ऐसी इक कहानी दे.
.
मेरी ग़ज़लों की क्यारी सूख गयी  
मेरी ग़ज़लों को थोडा पानी दे.
.
“नूर” को फ़िक्र दे नई मौला
पर नज़र उस को तू पुरानी दे.
.
निलेश "नूर"
मौलिक / अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 31, 2015 at 9:30pm — 27 Comments

अर्थ --

एकदम उसके ज़बान पर चढ़ गया था ये शब्द " काना ", हंसी मज़ाक में किसी को भी बोल देता था वो ।
आज भी वही हुआ जब बचपन का एक मित्र आया और उसके साथ मज़ाक चल रहा था । अचानक किसी बात पर उसने बोल दिया " क्या यार काने हो क्या , इतना भी नहीं दिखता "।
और फिर वो एकदम से खामोश हो गया , दरअसल उसका बचपन का दोस्त वास्तव में काना था । उसे उस शब्द की पीड़ा का एहसास हो गया था ।
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 31, 2015 at 6:46pm — 10 Comments

दिल से जाती नहीं ........इंतज़ार

बेचारा ...बेबस... लाचार दिल

आँखों से कितनी दूर है

जो बस गए हैं सपने

उन्हें सच समझने को मजबूर है

आँखों की कहानी अपनी है

जो देखा बस वोही खीर पकनी है

छल फ़रेब की चाल रोज़ बदलनी है

क्या करे दिल की दुनियाँ का

वहाँ तो सिर्फ़ दिल की ही दाल गलनी है

हाँ ....बंद आंखें दिल को देखती हैं

मगर आँखों को

बंद आँखों से देखने पर भरोसा ही नहीं

क्यूंकि वो जानती हैं कि दिल मजबूर है

और सच्चाई सपनों से कितनी दूर है

यूँ हर किसी का दिल आँखों से दूर…

Continue

Added by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on May 31, 2015 at 2:36pm — 9 Comments

कविता हे राम

प्रार्थना
अधरों पर रखकर बंशी कब तक खड़े रहोगे
कलियुग पर शुभदृष्टि कब तुम हरि करोगे
संगीत साधना है कहते है जहां बासी
कब तक ये ज्ञान लोगे कब तक स्वर ये पड़ोगे
हम तो पलक बिछाये बैठे है युगों से
कब नजर पड़ेगी कब तक कृपा
करोगे
हमने बहुत सुनी है उद्धारो की कथायें
कलियुग में कोई कहानी कब तक प्रभु
रचोगे
हम पर नजर बिहारी कब तलक तुम करोगे
विश्वास की परीक्षा अब न लो मेरी मोहन
कदम बहक रहे है कब तक न तुम सुनोगे
शक्ति मौलिक व् अप्रकाशित

Added by babita choubey shakti on May 30, 2015 at 11:56am — 8 Comments

मां की आखिरी निशानी : लघुकथा : हरि प्रकाश दुबे

“सुनो, याद है न यह जगह!”

“जी याद है ,यहीं तो माँ जी की उनके इच्छा के अनुसार हमने अस्थि विसर्जन किया था !”

“और वो दुर्घटना ?”  

“कैसे भूल सकती हूँ ,आज भी याद है वो दुर्घटना ,हम दोनों तो कार के नीचे दबे हुए थे ,और उसके बाद दोनों के ही एक –एक पैर काटकर किसी तरह डाक्टरों ने हमारी जान बचाई, और मां जी ने अपना सब रुपया –पैसा  और जेवर हमारे इलाज में लगा दिया और उनकी दी हुई ये अंतिम निशानी ,ये बैसाखी हम दोनों का सहारा बन गयीं !”

“तुम्हें पता है मैं बार –बार यहाँ क्यों आता…

Continue

Added by Hari Prakash Dubey on May 30, 2015 at 1:32am — 3 Comments

बैसाखी (लघुकथा)

"अरी भागवान  ! तुम इस तरह क्यूँ देख रही हो बेटे को ?"

" देख रही हूँ कहीं लडखडाया तो हम झट से सहारा दे देंगे ."

"क्या वाकई तुम्हे लगता है कि उसे तुम्हारे सहारे की जरूरत है ?"

 " शायद नहीं , बड़ा हो गया है  अब जीवन साथी भी  मिल गयी है ."

"हमने  अपना फ़र्ज़ पूरा किया ,अब उसे हमारे सहारे की जरूरत नहीं है .

 ,जीवन पथ पर चलना  सीखा दिया है हमने "

"पर अब हम असक्त हो गएँ हैं ,उसके प्यार की बैसाखी की जरूरत अब हमें है ."

@मौलिक व् अप्रकाशित 

Added by Rita Gupta on May 29, 2015 at 11:00pm — 16 Comments

एक कविता--

आज फिर आँधियाँ उठीं दिल में
आज फिर नज़र , आप आये हैं !

खाक़ हो जाते ,ग़र नहीं मिलते
खत्म अब , गर्दिशों के साये हैं !

सोचते रहते जिनको शामो सहर,
ख्वाबों में भी , कब वो आये हैं !

खिल उठी है ये सारी कायनात,
मन ही मन जब वो मुस्कुराएं हैं!

शायद करेंगे ,आज वादे वफ़ा,
फिर से पहलू में आज आये हैं!

आज फिर आँधियाँ उठीं दिल में
आज फिर नज़र , आप आये हैं !!

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by विनय कुमार on May 29, 2015 at 10:30pm — 16 Comments

अटका मन भटका मन

अटका मन भटका मन  

  आज मैं सुदूर विदेश में अपने कमरे में आँख बंद कर लेटी हूँ पर मन मुझसे निकल उड़ा जा रहा है .थामने की बड़ी कोशिश की इस बेकाबू घोड़े सदृश्य  मन को, पर असफल अशक्त हो निढाल हो गयी .सात समुन्दर पार कर , बिन पंखों का ये बावरा मन जा पहुंचा उस गाँव जहाँ मेरा बचपन बीता था  .ऊँचे पहाड़ी पर जा टिका जहाँ से बचपन का वो जहाँ अपने विस्तारित रूप में दृगों में समाहित होने लगा .बाबूजी  संग इस पहाड़ी पर ,इसी पेड़ के नीचे कितने रविवार मनाये होंगे .मन की आँखों से सारा…

Continue

Added by Rita Gupta on May 29, 2015 at 4:03pm — 15 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
Thumbnail

चल मन अब गोकुल के धाम

चल मन अब गोकुल के धाम अद्भुत मनहर बाल रूप में मिल जाएंगे श्याम कि चल मन अब……………………….कटि करधनी शीश…See More
2 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अशोक भाईजी धन्यवाद ... मेरा प्रयास  सफल हुआ।"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"वाह वाह वाह !!! बहुत दिनों बाद ऐसी लाजवाब प्रतिक्रिया पढने में आई है। कांउटर अटैक ॥ हजारों धन्यवाद…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"  आदरणीय शेख शाहज़ाद उस्मानी जी सादर, सरकारी शालाओं की गलत परम्परा की ओर ध्यान आकृष्ट कराती…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"सार्थक है आपका सुझाव "
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदाब।‌ रचना पटल पर उपस्थिति और समीक्षाओं हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभा पाण्डेय जी। मेरी…"
Tuesday
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"हार्दिक धन्यवाद आदरणीया प्रतिभाजी ।  इसमें कुछ कमी हो सकती है लेकिन इस प्रकार के आयोजन शहरों…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव साहब सादर, बिना सोचे बोलने के परिणाम पर सुन्दर और संतुलित लघुकथा…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"अमराई में उत्सव छाया,कोयल को न्यौता भिजवाया। मौसम बदले कपड़े -लत्ते, लगे झूमने पत्ते-…"
Tuesday
Ashok Kumar Raktale replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"ठण्ड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम  लगे सब हैं बौराने। पंछी गाते सुर में…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा किसी विसंगति से उभरती है और अपने पीछे पाठको के पीछे एक प्रश्न छोड़ जाती है। सबकुछ खुलकर…"
Tuesday
pratibha pande replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"आदरणीय अखिलेश जी स्वयं के प्रचार प्रसार के लिए इस तरह के प्रायोजित कार्यक्रमों का चलन साहित्य और…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service