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सुनील प्रसाद(शाहाबादी)
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Gender
Male
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लुधियाना (पंजाब)
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आरा (बिहार)
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नौकरी
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सीखना केवल सीखना

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सुनील प्रसाद(शाहाबादी)'s Blog

ग़ज़ल- खता होते होते

शाब्दिक कलन -१२२ १२२ १२२ १२२

*******************

मुहब्बत हुई जो खता होते होते।

सरे-राह गुजरी खफा होते होते। १

------

हसूं या रोऊँ जिंदगी पर खुदाया,

जहर हो गई है दवा होते होते। २

------

बची उम्र अब तो न जीने की कोई,

हँसी थी मुसीबत फना होते होते। ३

-------

शमां बुझ गई सो गई सारी महफ़िल,

विराना हुआ दिल वफ़ा होते होते। ४

--------

मिला तख़्त बैठें खजाना छुपाकर,

मुक़द्दस हुए अब सजा होते होते। ५

---------

रिवाजे बना… Continue

Posted on May 25, 2017 at 3:24pm — 11 Comments

हकीकत हूँ परेशां हूँ (मुसल्सल ग़ज़ल)

हकीकत हूँ परेशां हूँ कभी हारा कहाँ हूँ मैं।

हवा हूँ तरबतर खुश्बू चमन तेरे रवाँ हूँ मैं। 1

--------

खिले जो भी गुले गुलजार हर इक ओर देखो तो,

हसीं मौसम चटकता रंग सब का बागवां हूँ मैं। 2

----

अजानो में भजन में एक ही अक्स है मेरा,

दुआ हूँ मैं दया हूँ मैं सभी से आशना हूँ मैं। 3

----

गमों की बात ही क्या हाथ जो दो हाथ में मेरे,

चले आओ सितारों में चमकता कहकशां हूँ मैं। 4

----

अदालत से बचोगे तुम जहां भर के निगाहों से,

छुपाकर जो किये हो… Continue

Posted on January 12, 2017 at 10:04pm — 9 Comments

चाँद बेनूर वफ़ा शर्म हया के हद में, (ग़ज़ल)

बहरे रमल मुसम्मन मखबून महजूफ,

2122 1122 1122 22,

इश्क तो पाक था बेदाद हुआ जाता है।

कातिले फ़ौज ही आजाद हुआ जाता है। 1

-------

चाँद बेनूर वफ़ा शर्म हया की हद में,

जुल्म कर अब्र ये आजाद हुआ जाता है। 2

------

लाख ही यत्न करो मर्ज बढ़ा ही जाए,

बात बेबात ही जेहाद हुआ जाता है। 3

------

हो रही खाक लगी आग बसारत देखो,

था बशर मोम का बर्बाद हुआ जाता है। 4

------

ऐ खुदा शाद अता रूह को फ़रमा देना,

अब जुदा जीभ से हर स्वाद हुआ जाता है।… Continue

Posted on December 12, 2016 at 4:00pm — 18 Comments

हाल अपना भी (ग़ज़ल)

2122 2122 212,

आइए कुछ तो सुनाते जाइए।

हाल अपना भी बताते जाइए। 1

-----

लोग तो बातें बनायेगें बहुत,

झूठ पर भी मुस्कुराते जाइए। 2

-----

आप अपनी बात पर कायम रहें,

निर्धनो के घर बसाते जाइए। 3

-----

आप अनदेखा न यूँ हमको करें,

रूठ बैठा दिल मनाते जाइए। 4

-----

डालकर हम पर नजर बस इक जरा,

प्यार का अरमां सजाते जाइए। 5

-----

आपके सपने हमारे नींद में,

होश खोए है जगाते जाइए। 6

------

ये सँवरना आपके ही है… Continue

Posted on December 4, 2016 at 1:30pm — 7 Comments

Comment Wall (3 comments)

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At 11:12am on October 22, 2016, सुनील प्रसाद(शाहाबादी) said…
मै अभारी हूँ पुरे ओ. बी.ओ. परिवार सहित उन सभी नियंता समूह के जिन्होंने मेरी रचना को इतना मान दिया और रचना कर्म में अग्रसरित मेरे पगो की गतिशीलता को बढ़ा दिया है।
सह सादर नमन।
At 11:45pm on October 16, 2016,
मुख्य प्रबंधक
Er. Ganesh Jee "Bagi"
said…

आदरणीय सुनील प्रसाद (शाहाबादी) जी.
सादर अभिवादन !
मुझे यह बताते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी "अब नहीं मेरे गांव में(छंदमुक्त चतुष्पदी कविता)"

 को "महीने की सर्वश्रेष्ठ रचना" सम्मान के रूप मे सम्मानित किया गया है | इस शानदार उपलब्धि पर बधाई स्वीकार करे |
आपको प्रसस्ति पत्र यथा शीघ्र उपलब्ध करा दिया जायेगा, इस निमित कृपया आप अपना पत्राचार का पता व फ़ोन नंबर admin@openbooksonline.com पर उपलब्ध कराना चाहेंगे | मेल उसी आई डी से भेजे जिससे ओ बी ओ सदस्यता प्राप्त की गई हो |
शुभकामनाओं सहित
आपका
गणेश जी "बागी
संस्थापक सह मुख्य प्रबंधक 
ओपन बुक्स ऑनलाइन

At 7:39pm on March 26, 2015, Shyam Mathpal said…

Thanks a lot.

 
 
 

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