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दो दिल दो रास्ते(कहानी,सोमेश कुमार )

दो दिल दो रास्ते

मोबाईल पर मैसेज आया –“गुड बाय फॉर फॉरएवर |”

कालीबाड़ी मन्दिर पर उस मुलाकात के समय जब तुमने आज तक का एकमात्र गिफ्ट प्यारा सा गणेश दिया था तो उसके रैपर पर बड़े आर्टिस्टिक ढंग से लिखा था-फॉर यू फॉरएवर और अब ये !|

यूँ तो तुम सदा कहते थे -मुझे एक दिन जाना होगा |

पर इसी तिथि को जाओगे जिस रोज़ मेरी ज़िन्दगी में आए थे दो साल पहले |वो भी इस तरह |इसकी कल्पना भी ना की थी |

अगला मैसेज-मुझे याद मत करना |अगर तुम मुझे याद करोगी तो मैं स्थिर नहीं रह…

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Added by somesh kumar on June 11, 2015 at 11:30pm — 1 Comment

कला गीतिका-दौर गम का ये पिघलने दो जरा

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

2122 2122 212

--------------------------

हसरतें बेताब जलने दो ज़रा।

दौर गम का ये पिघलने दो जरा।

*****

मन जला है तन जला है इश्क में,

प्यार की अब साँझ ढलने दो ज़रा।

*****

प्यास होठों को सुखाये जा रहा,

भर नजर से जाम चलने दो ज़रा।

*****

होश में हम रोज रोते ही रहें,

अश्क पीकर आज हँसने दो ज़रा।

*****

आ उजाड़ो शौक से ऐ आँधियों,

बस्तियां दो चार बसने दो ज़रा।

******

आप… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on June 11, 2015 at 9:04pm — 20 Comments

ग़ज़ल (विवेक मिश्र)

(बह्र - 1222-1222-1222-1222)





किसी दिन ख़त्म होगी डोर, धागा टूट जाएगा -

अचानक ज़िन्दगी! तुझसे भी नाता टूट जाएगा -



जो बोलूँ झूठ तो खुद की निगाहों में गिरूँगा मैं

जो सच कह दूँ तो फिर से एक रिश्ता टूट जाएगा -



बस इतनी बात ने ताउम्र हमको बाँधकर रक्खा

किसी के दिल में कायम इक भरोसा टूट जाएगा -



चराग़ों ने ये जो ज़िद की है अबकी आजमाने की

हवा का हौसला भी, देख लेना, टूट जाएगा -



वो हों जज़्बात या फिर कोई नद्दी हो कि दोनों… Continue

Added by विवेक मिश्र on June 11, 2015 at 8:46pm — 10 Comments

ग़ज़ल : पैसा जिसे बनाता है

बह्र : २२ २२ २२ २

 

पैसा जिसे बनाता है

उसको समय मिटाता है

 

यहाँ वही बच पाता है

जिसको समय बचाता है

 

चढ़ना सीख न पाये जो

कच्चे आम गिराता है

 

रोता तो वो कभी नहीं

आँसू बहुत बहाता है

 

बच्चा है वो, छोड़ो भी

जो झुनझुना बजाता है

 

चतुर वही इस जग में, जो

सबको मूर्ख बनाता है

-----------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on June 11, 2015 at 6:54pm — 16 Comments

उंगली में चुनरी लिपटी है दांतों से दबे ओंठ

2212  1212  221  122

दर्पण को देख हुस्न यूं शर्माने लगा है 

लगता खुमारे इश्क उस पे छाने लगा है 

उंगली में चुनरी लिपटी है दांतों से दबे ओंठ 

इक  दिल धड़क धड़क के नगमे गाने लगा है

 

जगते हैं पहरेदार भी आँखों के निशा में 

ख्वावो में उनके जबसे कोई आने लगा है

 

रुक-रुक के सांस चलती है नजरों  में उदासी 

सीने से दिल निकल के जैसे जाने लगा है 

कलियों के साथ देख के भंवरों को वो तन्हा 

कुछ कुछ समझ…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on June 11, 2015 at 2:00pm — 12 Comments

गजल //// बचपन के सिकंदर याद आते

रमल मुसम्मन सालिम

2122  2122  2122  2122   

  

खो गए जो मीत बचपन के सिकंदर याद आते

ध्यान में  आह्लाद के सारे  समंदर याद आते

 

गाँव की भीगी हवा आषाढ़ के वे दृप्त बादल

और पुरवा के  उठे मादक  बवंडर याद आते  

 

आज वे  वातानुकूलित  कक्ष में  बैठे हुए हैं   

किंतु मुझको धूप में रमते कलंदर याद आते

 

नित्य गोरखधाम में है गूँजती ‘आदित्य’ वाणी

देश को…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 11, 2015 at 11:00am — 19 Comments

भेद –भाव

नन्हा यश अंग्रेजी के शब्द जैसे गुड-बैड, स्माल-बिग ,ब्यूटीफुल-अग्ली(ugly) सीख रहा था .एक दिन स्कूल से आते ही उसने अंग्रेजी की पुस्तक निकाली और बोला

“माँ,ये देखो ये फोटो बिलकुल तुम्हारी जैसी है ,मैंने इसे ही ब्यूटीफुल लिखा तो टीचर ने गलत कर दिया .उन्होंने इस फ्रॉक वाली को ब्यूटीफुल बताया और इसे अग्ली,ऐसा क्यों? “

“बेटा,जिसे तुम मेरी जैसी समझ रहे हो वह तो सांवली है जबकि ये गोरी –चिट्टी है,इसलिए सुंदर वही हुई ना “

यश माँ को ध्यान से देखने लगा , रंग भेद की पहली कक्षा में उसकी…

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Added by Rita Gupta on June 11, 2015 at 10:30am — 25 Comments

कबाड़ ( लघुकथा )

"बाऊजी ! बच्चों के इम्तहान शुरू हो रहे हैं ।आपकी बहू चाहती थी , बेहतर होता अगर आप कुछ रोज़ भाईसाहब के यहाँ हो आते ।"
" पर बेटा ! अभी तो समय पूर्ण होने में दो माह बाकी हैं ।"
" वो तो ठीक है , पर आप तो जानते हैं , घर में एक ही अतिरिक्त कमरा है , वो भी ......।"
" कबाड़ी वाला ....कबाड़ी ....। बाऊजी ! कुछ कबाड़ है क्या ? "
"हाँ है तो.... शायद तुम्हारे बाजार में भी इसका कोई मोल न होगा...।"
मौलिक व अप्रकाशित ।

Added by shashi bansal goyal on June 11, 2015 at 8:30am — 26 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - फिल बदीह --- फिर उसी रह गुज़र गया कोई ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212   22  / 112

  

"क्या ज़माने से डर गया कोई

एह्द क्यूँ तोड़ कर गया कोई"

ख़्वाब मेरे कुतर गया कोई…

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Added by गिरिराज भंडारी on June 11, 2015 at 6:30am — 23 Comments

पिघलता ग्लेसियर ( लघुकथा )

" क्यों नहीं हो सकता ये , मैं रह सकती हूँ तुम्हारे घर तो तुम क्यों नहीं रह सकते मेरे घर शादी के बाद "|

" लेकिन लोग क्या कहेंगे , घर जमाई बन गया | मेरे घरवाले भी तो तैयार नहीं होंगे "|

" जब मुझसे शादी का फैसला किया था , तब क्या लोगों की परवाह की थी तुमने | और तुम्हारे घर तो भैया का परिवार है ही , मैं तो एकलौती लड़की हूँ अपने पेरेंट्स की , उनको कैसे अकेला छोड़ दूँ "|

" ठीक है , मैं घर में बात करता हूँ | क्या हम लोग आते जाते नहीं रह सकते "|

" आते जाते तो हम लोग यहाँ से भी रह सकते…

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Added by विनय कुमार on June 11, 2015 at 2:29am — 20 Comments

उमठी दाल

उमठी दाल

पायलगी करके मैं शिवनाथन बाबा की सामने वाली खटिया पर बैठ गया और वो रोटी के कौर को दाल में डुबाने लगे |

“इ साली मटर दाल भी बहुत तंग करती है |कभी भगोनी तले आंच धर के ज्ठाइन लगती है तो कभी पानी में घुलती ही नहीं |पकना तो जैसे इसके स्वभाव में है ही नहीं |”

“दादा जी दाल ,क्या भदेली में पकाते हैं ?” मैंने पूछ लिया

वो कुछ देर खाने में तल्लीन रहे और फिर झटके से बोले

“और नहीं तो क्या हमारे पास क्या कुकड़ धरा है |एलुमिनियम हाड़ी-मटिया के चूल्हे की आग पर ही हमारे यहाँ खाना… Continue

Added by somesh kumar on June 10, 2015 at 9:02pm — 4 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पहिये (हास्य व्यंग )

 “जज साहब, पहले ही मैं उस पहिये के नटबोल्ट टाईट करके रखता तो आज तलाक तक नौबत नहीं आती और गाड़ी सही चलती.. गलती मेरी ही है” “तुम पेशे से मकेनिक हो क्या”?जजसाहब ने चुटकी ली| “जी साहब,मेरा गैरेज है”|  

अगला केस ...

“आपको ये तो पता ही होगा मैडम कि पति पत्नी गाड़ी के दो पहियों के समान”...”जी जी अच्छे से पता है पर जंग लगे स्क्रू फिट हों पहिये में तो धोखा तो देंगे ही न!! पहले ही उसके  स्क्रू  टेस्ट कर लेती तो आज नौबत तलाक तक न पँहुचती और जब पहिया कंडम हो जाता है तो बदलना भी पड़ता…

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Added by rajesh kumari on June 10, 2015 at 12:30pm — 8 Comments

ग़ज़ल -- दुश्मनों से भी मुहब्बत करना .

2122-1122-22.

अपनी मंज़िल की जो हसरत करना

घर से चलने की भी हिम्मत करना

.

कोई तुझको जो अमानत सौंपे

जान देकर भी हिफ़ाजत करना

.

कहना आसान है करना मुश्किल

दुश्मनों से भी मुहब्बत करना

.

आज बचपन में है वो बात कहाँ

वक़्त बे-वक़्त शरारत करना

.

तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे

इतनी शिद्दत से इबादत करना

.

सिर्फ कहने को ही तेरा न हो वो

उसके दुख दर्द में शिरक़त करना

.

फ़र्ज़ औलाद का यह होता 'दिनेश'

अपने माँ बाप की…

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Added by दिनेश कुमार on June 10, 2015 at 10:46am — 16 Comments

जगह पर हूँ(गजल,मनन कु.सिंह)

सही जगह पर हूँ,
नहीं कि शह पर हूँ।
कहूँ वजह-ए-कहन,
कहूँ कि तह पर हूँ।
रहे गुजरती वह,
वहीं सतह पर हूँ।
रचो गजल अपनी,
कहूँ कि बह पर हूँ।
बँधें बँधे पुख्ता,
कहूँ कि दह पर हूँ।
@मनन
बह=बाँस की जड़ जहाँ से बाँस निकलती है।
दह=जल मग्न होने की स्थिति।
बँधे=बाँध

Added by Manan Kumar singh on June 9, 2015 at 10:52pm — 3 Comments

क्षणिकाएँ --6 -डॉo विजय शकर

इतने कांटे
कि उनसे बचते-बचते
गुलाब क्या
हर फूल से हम
दूर हो गए .......... 1.

पेड़ कहीं जाते नहीं
फल पक जाएँ
तो रुक पाते नहीं....... 2 .

तुम क्या गये
मेरी तन्हाई
भी ले गये .......…… 3.

और यह भी , यूँ ही,

उनका लिखा शेर खूब चला, खूब चला, खूब चला,
चलना ही था , ट्रक के पीछे जो लिखा था ॥

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on June 9, 2015 at 9:30pm — 23 Comments

मेरा मन माली सा हो गया

टूट टूट के अपना दिल कुछ जाली सा हो गया

अंतरमन का वो कोना कुछ खाली सा हो गया

 

वस्ल की निगाहें हो गयी, दोस्ती की आड़ में

नारी होकर जीना अब कुछ गाली सा हो गया

 

नजरों में घुली शराब, चाचा मामा भाई की

आँखों में हर रिश्ता, अब कुछ साली सा हो गया

 

गर्दिश में लिपटी कनीज़, सहारे की तलाश में

मन अकबर शज़र का भी, कुछ डाली सा हो गया

 

शोर में दब के रह गयी आबरू की आवाज

चीखती ललना का स्वर, बस ताली सा हो…

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Added by Nidhi Agrawal on June 9, 2015 at 3:30pm — 13 Comments

धड़कन भी खो जायेगी....

आओ न !

मेरे शब्दों को सांसें दे दो

हर क्षण तुम्हारी स्मृतियों में

मेरे स्नेहिल शब्द

तुम्हें सम्बोधित करने को

आकुल रहते हैं

गयी हो जबसे

मयंक भी उदासी का

पीला लिबास पहन

रजनी के आँगन में बैठ

तुम्हारे आने का इंतज़ार करता है

न जाने अपने प्यार के बिना

तुम कैसे जी लेती हो

यहाँ तो हर क्षण तुम्हारी आस है

तुम बिन हर सांस अंतिम सांस है

तुम नहीं जानती

तुम्हारी न आने की ज़िद क्या कहर ढायेगी

जिस्म रहेंगे मगर

जिस्मों से…

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Added by Sushil Sarna on June 9, 2015 at 2:44pm — 16 Comments

तरही ग़ज़ल -- " बहुत सलीक़े से रूठा हुआ है यार मेरा " .

१२१२-११२२-१२१२-२२

निग़ाहे नाज़ से देखो, करो शिकार मेरा

तुम आजमाओ सनम दिल ये एक बार मेरा

.

तू आरज़ू है मेरी और तू है प्यार मेरा

तेरी वफ़ा पे है अब जीने का मदार मेरा

.

तेरे शबाब को नज़रों से क्यूँ पिया मैंने

तमाम उम्र न उतरेगा अब ख़ुमार मेरा

.

मुआमलात-ए-जवानी कहे नहीं जाते

न पूछ कौन है हमदम, कहाँ क़रार मेरा

.

वो मुझसे बात तो करता है, पर वो बात नहीं

" बहुत सलीक़े से रूठा हुआ है यार मेरा "

.

वो बदगुमाँ है जो, कमज़र्फ़ मुझको…

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Added by दिनेश कुमार on June 9, 2015 at 2:21pm — 20 Comments

रुकी हुई सी इक ज़िन्दगी-सिक्वेल 2

रुकी-रुकी सी इक ज़िन्दगी –सिक्वेल 2

 25 साल का सोनू मुझसे चार साल बाद मिल रहा था |इससे पहले जब मिला था तो उसकी शादी नहीं हुई थी |यूँ तो उसका मेरे घर पर बराबर आना-जाना है |पर दिल्ली में रहने और एकाध दिन के लिए ही गाँव में ठहरने के कारण उससे चार सालों से नही मिला था |जाति से लुहार और पेशे से ट्रक-ड्राईवर |पर मेरे पिताजी से उसके पिताजी और उसके आत्मीय सम्बन्ध थे |बस पिताजी की एक छोटी सी मदद के बदले पूरा परिवार मेरे पिता के लिए हमेशा खड़ा रहता था |जब उसकी शादी तय हुई तो पिताजी दिल्ली…

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Added by somesh kumar on June 9, 2015 at 1:12pm — 3 Comments

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