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ग़ज़ल - जाती तेरे मिज़ाज से क्यूँ बेरुख़ी नहीं

221 2121 1221 212

बुझते रहे चिराग गई तीरगी नही ।

फिर भी हवा के रुख से मेरी दुश्मनी नही ।।





आ जाइए हुज़ूर मुहब्बत के वास्ते ।

दैरो हरम में आज कहीं बेबसी नहीं ।।





बहकी अदा के साथ बहुत आशिकी हुई ।

गुजरी तमाम रात मिटी तिश्नगी नहीं ।।





कब से नज़र को फेर के बैठी है वो सनम ।

शायद मेरे नसीब में वो बात ही नहीं ।।





माना कि गैर से है ये वादा भी वस्ल का ।

उल्फ़त की बेखुदी में कहीं रौशनी नही ।।





तेरा… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 24, 2016 at 1:00am — 6 Comments

है काँटों भरी प्रीत की ये डगर मन----ग़ज़ल

122 122 122 122



मना तो किया था न जाना उधर मन

चला इश्क़ की राह पर तू मगर मन



सुहाना सफ़र तो महज़ कल्पना है

है काँटों भरी प्रीत की ये डगर मन



निगाहों का तटबंध तो टूटना था

ये बादल तो बरसेंगे अब उम्र भर मन



मिलेंगे वफ़ा हुस्न इक साथ दोनों

ये ख्वाहिश भरम है कभी भी न कर मन



सितम खुद पे कर के किसे कोसता है

पिया तूने खुद चाहतों का ज़हर मन



सिखाया तो था त्याग में बस ख़ुशी है

हुआ ही नहीं बात का कुछ असर… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 24, 2016 at 12:00am — 10 Comments

गीतिका //अलका ललित

2 2 2 2 2 2 2

-.-
पन्नो में घुल जाती हूँ
स्याही सी बह जाती हूँ

.

नाता बस मन से मेरा
भावो को कह जाती हूँ

.

जानूँ न* मैं छंद पिरोना
मन की तह बताती हूँ

.

न सुर है न लय सलीका
पाबन्दी तज जाती हूँ

.

खिलती भी हूँ सावन सी
पतझड़ सी झड़ जाती हूँ

.

सजा कर खुद को फिर से
पन्नो पर सज जाती हूँ

-.-
 "मौलिक व अप्रकाशित"

Added by अलका 'कृष्णांशी' on October 23, 2016 at 9:02pm — 13 Comments

दो इस्लाम (लघुकथा )राहिला

वह एक दहशतगर्द इलाका था ।जहाँ खण्डरनुमा मकानों में रहने को विवश थी सहमी हुयी इंसानियत ।ऐसे ही एक मकान में-

"माँ! क्या अब मैं कभी स्कूल  नहीं जा सकूंगी?"माँ की गोद में सिर रखे माहिरा ने  पूछा।

"पता नहीं मेरी बच्ची।"जबाब ,उम्मीद और ना उम्मीदी के बीच झूलता सा था।

"क्या लड़कियों का पढ़ना-लिखना गुनाह हैं?"

"नहीं मेरी जान!ये किसने कह दिया ?लड़कियों को पढ़ने-लिखने की इज़ाजत तो खुद ख़ुदा ने दी है।"

"अच्छा!तो फिर उन लोगों ने उस लड़की को स्कूल जाने पर क्यों गोली मार दी?क्या…

Continue

Added by Rahila on October 23, 2016 at 3:00pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
देखिये साहिब मेरा तो घर शिवाला हो गया (ग़ज़ल 'राज ')

२१२२ २१२२ २१२२ २१२

मेरी बगिया खिल उठी मौसम निराला हो गया

आ गई  बेटी मेरे घर में उजाला हो गया

 

दीप खुशियों के जले शुभ शंख मानो बज उठे

देखिये साहिब मेरा तो घर शिवाला हो गया

 

लहलहाई यूँ फसल खेतों की मेरी देखिये

सोने चाँदी से मढ़ा इक इक निवाला हो गया 

 

बिन सुरा सागर के जैसे खाली था मेरा वजूद   

आते ही उसके लबालब ये पियाला  हो गया

 

पढ़ते पढ़ते रात दिन आँखें मेरी थकती नहीं

उसका चेह्रा खूबसूरत इक…

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Added by rajesh kumari on October 23, 2016 at 12:55pm — 20 Comments

पंख /सुरेश कुमार ' कल्याण '

पंख

---



पंख

जो

समय की मार से

हो चुके थे

जीर्ण-शीर्ण

मैंने

खूब फैलाने का प्रयास किया,

ताकि

विश्राम कर सकें

इनकी छत्रछाया में

मेरे अपने

मेरे अजीज

मेरे संबंधी।



मगर

जब वो जीर्णावस्था से

उबरे

जब पूर्ण छाया

देने ही वाले थे

चढ़ गए

मेरे

सुन्दर पंखों पर

काटने के लिए

मेरे अपने

मेरे अजीज

मेरे संबंधी।



बहुत दर्द

बहुत पीड़ा

सहने की कोशिश

बहुत… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 23, 2016 at 12:48pm — 10 Comments

नाम (लघुकथा)

 नेहा सुबह से उदास थी। शादी के पाँच साल होने को आए थे, पर उसकी गोद अब तक सूनी थी। उसकी और उसके पति की मेडीकल जाँच हो चुकी थी। सब ठीक था। फिर भी बात बन नहीं रही थी। बस सास इसी बात को लेकर अपने बेटे पर लगातार दबाव डाल रही थी कि वह उसे तलाक क्यों नहीं दे देता।

माँ की बातों में आकर आज सुबह ही अभिषेक तलाक के कागजात बनवाने वकील के पास चला गया था। भविष्य की चिंता को लेकर नेहा की आँखों में आँसू छलक आए थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसे लग रहा था कि हो सकता है अभिषेक का गुस्सा ठंडा…

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Added by विनोद खनगवाल on October 23, 2016 at 10:37am — 7 Comments

पहरे

पहरे

बढ़ा लो पहरे और
फर्क क्या पड़ना है?
आतंक के माहौल में
आगे फिर भी बढ़ना है |
ठानी है जो तुमने करो
मैं अपना कर्तव्य निभाऊंगी
वक़्त आया तो
निडर होकर
देश पर जान वारूँगी।
दर्द इतना झेला है
अब न तुम मुझको डराओ
गोली बारूद की बिसात पर
मौत बुलाने से बाज आओ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on October 23, 2016 at 10:30am — 5 Comments

गीतिका/हिंदी गजल

दीप-पर्व पर(भुजंगप्रयात छंद)

122 122 122 122

*****************************

चलो रोशनी को जगाने चलें हम

अँधेरे यहाँ से हटाने चलें हम।1



रहे माँगते इक किरण का सहारा

लिये दीप कर में जलाने चलें हम।2



बँटे खेत कितनी तरह से अभी हैं

दिलों की लकीरें मिटाने चलें हम।3



बहुत बार देखी नजाकत जहाँ की

जरा नाज अपना दिखाने चलें हम।4



कहानी हुआ भेद बढ़ना यहाँ का

चलो आज पर्दा उठाने चलें हम।5



इशारों पे' अबतक उझकते फिरे… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 23, 2016 at 7:30am — 13 Comments

ग़ज़ल....ऐ मुहब्बत मैं तेरा सजदा करूँ

बहरे रमल मुसद्दस् महज़ूफ़
फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन
2122 2122 212
ऐ मुहब्बत मैं तेरा सजदा करूँ
रुख बदलती ज़िन्दगी है क्या करूँ

मोड़ पे रुकना पलट कर देखना
हाय उनकी सादगी का क्या करूँ

कुछ घड़ी बैठो हमारे रूबरू
भूल कर जग को तुम्हें देखा करूँ

थरथराती धड़कनों को थाम लो
दर्द को रख ताक पर जलसा करूँ

दूरियाँ हों लाख पर मुमकिन नहीं
नाम लूँ उनका उन्हें रुसवा करूँ

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 23, 2016 at 12:14am — 8 Comments

दीवानगी में हम वफ़ा लिखते गए

‌2212 2212 2212

.

दीवानगी में हम वफ़ा लिखते गए ।

तुम बेखुदी में बस जफ़ा पढ़ते गए ।।



पूछा किया वो आईने से रात भर ।

आवारगी में हुस्न क्यूँ ढलते गए ।।



आयी तबस्सुम जब मेरी दहलीज पर ।

देखा चिराग़े अश्क भी जलते गए ।।



नादानियों में फासलो से बेखबर ।

बस जिंदगी भर हाथ को मलते गए ।।



तालीम ले बैठा था जब इन्साफ की ।

क्यूँ मुज़रिमो के फैसले बदले गए ।।



जिसकी बेबाकी के चर्चे थे बहुत ।

तहज़ीब को अक्सर वही छलते गए…

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Added by Naveen Mani Tripathi on October 22, 2016 at 7:00pm — 3 Comments

मूल्य -(लघुकथा)

छुट्टी की बड़ी समस्या है दीदी, पापा अस्पताल में नर्सो के सहारे हैं! भाई से फोनवार्ता होते ही सुमी तुरन्त अटैची तैयार कर बनारस से दिल्ली चल दी|

अस्पताल पहुँचते ही देखा कि पापा बेहोशी के हालत में बड़बड़ा रहें थे| उसने झट से उनका हाथ अपने हाथों में लेकर, अहसास दिला दिया कि कोई है, उनका अपना |

हाथ का स्पर्श पाकर जैसे उनके मृतप्राय शरीर में जान सी आ गयी हो |

वार्तालाप घर-परिवार से शुरू हो न जाने कब जीवन बिताने के मुद्दे पर आकर अटक गयी |

एक अनुभवी स्वर प्रश्न बन उभरा, तो दूसरा…

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Added by savitamishra on October 22, 2016 at 9:30am — 14 Comments

ग़ज़ल(शबाब पहने हुए )

फाइलातुन-मफाइलुन-फइलुन

कमसिनी में शबाब पहने हुए |

हुस्न निकला निक़ाब पहने हुए |

तुहमते बेवफ़ाई का कब से

हम हैं बैठे खिताब पहने हुए |

कौन आया है चीखी तारीकी

बज़्म में माहताब पहने हुए |

आँख में इंतज़ार दिल में तड़प

मैं हूँ यह इंक़लाब पहने हुए|

मत यक़ीं करना उसपे आया है

जो वफ़ा का हिजाब पहने हुए |

सामना अस्ल का ज़रूरी है

क्यूँ हैं आँखों में ख्वाब पहने हुए…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on October 20, 2016 at 8:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल नूर की ..

ग़ज़ल 

मात्रिक (22)



संघर्षों के जीवन रण में अपना हिस्सा हार गया,

मान के मिथ्या इस आँगन को, कोई इस के पार गया. 

.

विद्वत्ता से श्रेष्ठ कहाई सत्कर्मों की पुण्याई,

अहँकार के फेर में रावण! तेरा जीवन सार गया. 

.

प्रश्न हमारे सच्चे थे पर उत्तर झूठे थे उनके,

जब से सच का बोध हुआ है, धर्मों का आधार गया. 

.

ईश्वर पूजा, अल्लाह पूजा, ख़ुद के तन को कष्ट दिए,

उस जीवन की आस में मानव, ये जीवन बेकार गया. 

.

ईश्वर तेरे साथ चलेगा बस…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on October 20, 2016 at 8:15pm — 13 Comments

सर्जिकल अटैक--

चिरौंजीलाल बड़े पेशोपेश में थे, एक बार तो उनको लगा कि उनकी लुगाई ने बात बस यूँ ही कह दी, शायद बिना ज्यादा कुछ सोचे ही| लेकिन जब उन्होंने गौर से सोचा तो चेहरे पर चिंता की लकीरें दौड़ गईं कि भला मजाक में भी कोई ऐसा कहता है|

हफ़्तों क्या महीनों से ही घर में चर्चा चल रही थी और उनको बार बार याद दिलाया जा रहा था| वह एक कान से सुनते और दूसरे से निकाल देते, आखिर शादी के १५ वर्षों में इतना तो उन्होंने सीख ही लिया था| जब उनको लगता कि लुगाई समझ रही है कि वह अनसुना कर रहे हैं तो हाँ हूँ भी कह देते|…

Continue

Added by विनय कुमार on October 20, 2016 at 6:23pm — 4 Comments

ग़ज़ल-लिए दर्द दिल में पुराने चला हूँ-रामबली गुप्ता

वह्र-122 122 122 122



लिए दर्द दिल में पुराने चला हूँ

गमे इश्क के गीत गाने चला हूँ



जहाँ पल खुशी के बिताये थे तुम सँग

वहीं आज आँसू बहाने चला हूँ



बयाँ हाले' दिल भी करूँ क्या किसी से

मैं' सब खुद से' ही अब छिपाने चला हूँ



थी ये जिंदगी आप ही की ऐ' साहिब

उसे आप ही पे लुटाने चला हूँ



मुबारक तुम्हें चाँद सूरज सितारे

अँधेरों को' मैं आजमाने चला हूँ



खुली आँख का ख्वाब था प्यार तेरा

यकीं आज दिल को दिलाने चला… Continue

Added by रामबली गुप्ता on October 20, 2016 at 11:00am — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी ( गिरिराज भंडारी )

2122    1122    1122    22

बात सरहद पे अगर अब भी पुरानी होगी

तब दिलों मे हमें दीवार उठानी होगी

 

हर कहानी में हक़ीकत भी ज़रा होती है

ये हक़ीकत भी किसी रोज़ कहानी होगी

 

हाथ जिनके भी बग़ावत पे उतर आये हों

पैर में उनके भला कैसे रवानी होगी

 

सभ्य लोगों में असभ्यों की तरह बात तो कर

ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी

 

अपने अजदाद कभी राम-किसन-गौतम थे 

देखना घर मे बची कुछ तो निशानी होगी

 

रंग…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on October 20, 2016 at 8:10am — 19 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - तभी बन्दर यहाँ के चिढ़ गये हैं // --सौरभ

१२२२  १२२२ १२२

इन आँखों में जो सपने रह गये हैं

बहुत ज़िद्दी, मगर ग़मख़ोर-से हैं



अमावस को कहेंगे आप भी क्या

अगर सम्मान में दीपक जले हैं



अँधेरों से भरी धारावियों में

कहें किससे ये मौसम दीप के हैं



प्रजातंत्री-गणित के सूत्र सारे

अमीरों के बनाये क़ायदे हैं



उन्हें शुभ-शुभ कहा चिडिया ने फिर से

तभी बन्दर यहाँ के चिढ़ गये हैं



उमस बेसाख़्ता हो, बंद कमरे-

कई लोगों को फिर भी जँच रहे हैं …



Continue

Added by Saurabh Pandey on October 20, 2016 at 4:00am — 26 Comments

मकबरा

भीतर पुराने धूल-सने मकबरे में

धुआँते, भूलभुलियों-से कमरे

अनुभूत भीषण एकान्त

विद्रोही भाव

जब सूझ नहीं कुछ पड़ता है

कुछ है जो घूमघाम कर बार-बार

नव-आविष्कृत बहाने लिए

अमुक स्थिति को ठेल…

Continue

Added by vijay nikore on October 19, 2016 at 11:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल - ये जिंदगी है यहाँ इम्तहान और भी हैं

1212 1122 1212 112



हमारे जख़्म के गहरे निशान और भी हैं ।

ये जिंदगी है यहाँ इम्तहान और भी हैं ।।



न रोक आज परिंदों की आजमाइश को ।

फ़ना के बाद कई आसमान और भी हैं ।।



समझ सको तो मेरी बात मान लो वरना ।

मेरी किताब में लिक्खी जुबान और भी हैं ।।



जरा सँभल के चलो ये मुकाम ठीक नही ।

यहां तो लोग भी रखते इमान और भी हैं ।।



न जाइयेगा कभी इश्क के समन्दर में ।

वहाँ तो दर्द के बढ़ते उफान और भी हैं ।।



जो हुक्मरां है उसे… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 19, 2016 at 2:00pm — 4 Comments

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