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शक्ति छ्न्द/सतविन्द्र कुमार

122 122 122 12
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किसी ने कभी यह सही है कही
किया पूर्व ने ही उजाला सही
सकल नूर को दूर पश्चिम करे
सभी क्यों उसी की नकल में मरे।
2
महकते सुमन कुछ इशारा करें
गई चाहतों को दुबारा भरें
खिली जो कली है पिया की गली
लगन प्रेम की यह लगाती भली।
3.
कुहू की सुने हम सुवाणी अगर
चलें काटते हर कठिन सी डगर
सभी ओर मीठा अगर शोर हो
कहीं कष्ट का फिर नहीं जोर हो
4.
घटा से घटा है सकल ताप ये
बना जा रहा था सुजल भाप ये
नहीं नीर बस पंक पोखर पड़ा
उसी में जलज खिल रहा है बड़ा।
5
खिली आज आँगन बहुत धूप है
खिला साथ ही जा रहा रूप है
बजी जा रही है कहीं जो घड़ी
हमें छोड़ने की तुम्हें आ पड़ी।

-----------
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 19, 2016 at 7:16am
आद०सुरेश भाई जी आपके स्नेह के लिए दिल से आभारी हूँ!
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on October 19, 2016 at 6:47am
छ्न्द प्रयास के अनुमोदन एवं स्नेहिल प्रोत्साहन के लिए तहे दिल आभार आदरणीय समर कबीर साहब!सादर नमन
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 18, 2016 at 12:40pm
आदरणीय सतविंदर भाई जी बहुत ही सुन्दर छंद रचना के लिए हार्दिक बधाई ।
Comment by Samar kabeer on October 17, 2016 at 9:12pm
जनाब सतविन्द्र कुमार जी आदाब,बहुत अच्छे लगे आपके छन्द,साहित्य के प्रति आपकी लगन क़ाबिल-ए-तारीफ़ है, बधाई स्वीकार करें इस प्रस्तुति पर ।

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