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समता दीपक जलना होगा

राजनीति करते वोटों की

कुत्सित चाल चला करते

अपना स्वार्थ सिद्ध करने को

आपस में झगड़ा करते

भीड़ जुटाकर आग उगलते

वाक्-वाण वे चलवाते

धर्म जाति का जहर घोल

भड़काकर नफरत फैलाते

कर दें विफल योजना इनकी

जो जन धन लूटा करते

इन्हें नहीं है प्यार राष्ट्र से

यह अपना ही घर भरते

जाने कितने शकुनि यहाँ पर

अनगिन चालें चलवाते

लड़वाते जन को आपस में

खुद बेदाग निकल जाते

इनके…

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Added by Usha Awasthi on February 22, 2018 at 6:40pm — 4 Comments

कुछ हाइकु

झूमी सरसों

धरती इतरायी

फगुनाहट

 

बसंत आया

ओढ़ पीली चुनर

खेत बौराया

 

बौर आम के

फैल गयी सुगंध

झूमा बसंत

 

टेसू क्या फुले

अंगड़ाया पलाश

फागुन आया

 

.... मौलिक एवं अप्रकाशित

 

Added by Neelam Upadhyaya on February 22, 2018 at 4:47pm — 3 Comments

ख्याल

 ख्याल-1

1 तुम मेरी ज़िन्दगी से निकल जाओ

तुम्हारे रहते दिल सम्भाला ना जाए

रोशनी कोई कैसे कोई जले अंगने में

यादों का जब तक उजाला ना जाए

खुशबुएँ तर हो महके कोना कोना

किताबों से वो फूल निकाला ना जाए

प्यार है उसे रिश्ते का नाम ना दो

सितम हद करे नाम उछाला ना जाए |

_---------------------------------------------

ख्याल-2

यूँ जो चुपके से तुम अब भी बात करती हो

मुझे महसूस होता है अब भी…

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Added by somesh kumar on February 22, 2018 at 11:32am — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
इसी दुनिया में अपनी मुख़्तसर दुनिया बनाता हूँ

1222 1222 1222 1222

ज़मीन-ओ-आसमाँ के दरमियाँ रस्ता बनाता हूँ

इसी दुनिया में अपनी मुख़्तसर दुनिया बनाता हूँ



चढ़ाकर चाक पर मिट्टी कहा कुम्हार ने मुझसे

जहाँ जैसी ज़रूरत है इसे वैसा बनाता हूँ



बना लेता है अपने आप ही ये मुख़्तलिफ़ शक्लें

मेरा फ़न सिर्फ़ इतना है कि आईना बनाता हूँ



गुज़श्ता ज़िंदगी के तज़्रबों से वाकिए चुनकर

अकेला होता हूँ जब भी, कोई किस्सा…

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Added by शिज्जु "शकूर" on February 22, 2018 at 11:24am — 5 Comments

ग़ज़ल (जो अज़मे तर्के उल्फ़त कर रहा है )

(मफाईलुन-मफाईलुन-फऊलन )

जो अज़मे तर्के उल्फ़त कर रहा है|

ये दिल फिर उसकी हसरत कर रहा है |

लगाए ज़ख़्म देने वाला मरहम

ये दिल यूँ ही न हैरत कर रहा है |

वफ़ा मिलती कहाँ है हुस्न में वो

जिसे पाने की जुरअत कर रहा है |

दिले नादां दगा जिसकी है फ़ितरत

उसी से तू महब्बत कर रहा है |

मरीज़े इश्क़ की लौटी हैं साँसें

कोई शायद अयादत कर रहा है |

मिलेंगे हश्र में यह बोल कर वो

मुझे कूचे…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 21, 2018 at 8:30pm — 12 Comments

ग़ज़ल नूर की -खेल सारे, हर तमाशा छोड़ कर

२१२२/२१२२/२१२

.

खेल सारे, हर तमाशा छोड़ कर

सब को जाना है ये मेला छोड़ कर. 

.

एक क़िस्सा-गो अचानक मर गया

अपने कुछ क़िरदार ज़िंदा छोड़ कर.

.

था बहुत जिन को समुन्दर पर यकीं

अब वो पछताते हैं दरिया छोड़ कर.

.

मोड़ कोई इक ग़लत मुडने के बाद

याँ तलक पहुँचे हैं रस्ता छोड कर.

.

उस ख़ुदा का मत दिया कर वास्ता  

जा चुका जो कब से दुनिया छोड़ कर.

.

बात मेरी मान कर तो देखिये

आप अपना ये रवैया छोड़ कर.

.

चाँद…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on February 21, 2018 at 8:02pm — 12 Comments

सरसी छंद-२

कोई चाभे खूब मलाई,कोई रोटी-नून।
सभी बराबर भारत में हैं,फिर क्यों चूसें खून।
कोई ऋण ले चंपत होता,कोई देता जान।
कलम बताने वाली मेरी, कैसा हिंदुस्तान।।

पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'

Added by पीयूष कुमार द्विवेदी on February 21, 2018 at 6:00pm — 5 Comments

अंगुलिमाल(लघुकथा)

शिकार की तलाश में घूमते-घूमते अंगुलिमाल को एक साधु दिखा| उनको देखकर उसने कहा," तैयार हो जाओ तुम्हारी मृत्यु आयी है|"

साधु ने निडर होकर कहा," मेरी मौत! या तुम्हारी...?"

साधु का ऐसा उत्तर सुन कर अंगुलिमाल थोड़ा विचलित हुआ,उसने साधु से पूछा," तुमको मुझसे डर नहीं लगता? मेरे हाथ में हथ्यार देखकर भी नहीं?"

"न .... मैं क्यों डरूँ तुमसे, पर तुम हो कौन और यह माला कैसे पहनी है, इतनी सारी उँगलियाँ .......?"

"हाहाहाहाहा! हाँ यह उँगलियाँ ही हैं और मैं अंगुलिमाल…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on February 21, 2018 at 5:30pm — 5 Comments

ग़ज़ल- बलराम धाकड़ ( मसौदा भी ज़रूरी है...)

1222,1222,1222,1222

ज़रूरी है अगर उपवास, रोज़ा भी ज़रूरी है।

रवाज़ों का ज़रा होना अलहदा भी ज़रूरी है।।

हमें ये फ़ख़्र होता है कि हम हिंदौस्तानी हैं,

हमारे बीच हमदर्दी का सौदा भी ज़रूरी है।

मनाने रूठ जाने के लिखे हों क़ाइदे जिसमें,

मुहब्बत के लिए ऐसा मसौदा भी ज़रूरी है।

किसानों के लिए बिजली ओ पानी ही नहीं काफ़ी,

उन्हें ख़सरा,…

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Added by Balram Dhakar on February 21, 2018 at 12:23pm — 12 Comments

सब सही पर कुछ भी सही नहीं है - डॉo विजय शंकर

आप सही हैं,
वह भी सही है ,
हर एक सही है ,
फिर भी कुछ भी
सही नहीं है।
कुछ गिने चुने
लोग बहुत खुश हैं ,
यह भी सही नहीं है।
सच जो भी है ,
सब जानते हैं ,
बस मानते नहीं ,
यह भी सही नहीं है।
ऊँट सामने है ,
देखते नहीं,
हड़िया में ढूँढ़ते है ,
यह भी सही है।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on February 21, 2018 at 8:40am — 13 Comments

मिज़ाज (लघुकथा)

रंगों से सराबोर गीली साड़ियों से लिपटी कुछ ग्रामीण मज़दूर महिलायें टोली में गली से गुजरीं।


"उधर देखो और बताओ कि उनके अंग-अंग रंगीन हैं या वस्त्र?" एक रंगीन मिज़ाज पुरुष ने अपने साथी से कहा।


"वस्त्र गीले और रंगीन हैं और अंग सूखे और रंगहीन! समझ में नहीं आता तुम्हें?" साथी ने उसकी आंखों के सामने चुटकी बजाते हुए कहा।


(मौलिक व अप्रकाशित)

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 20, 2018 at 11:30pm — 14 Comments

सरसी छंद

कब तक ताकोगी पर मुख को, बनो सिंहनी आज।

श्याम नहीं अब आने वाले, स्वयं बचाओ लाज।

खड़े दुःशासन गली-गली पर, और सभा है मौन।

सहन हमेशा नारी करती,पीर समझता कौन।।

पीयूष कुमार द्विवेदी 'पूतू'

Added by पीयूष कुमार द्विवेदी on February 20, 2018 at 7:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल- समझा हूँ तेरे हुस्न के ज़ेरे ज़बर को में

221 2121 1221 212

ढूढा हूँ मुश्किलों से सलामत गुहर को मैं।

समझा हूँ तेरे हुस्न के जेरो जबर को मैं ।।

यूँ ही नहीं हूं आपके मैं दरमियाँ खड़ा ।

नापा हूँ अपने पाँव से पूरे सफर को मैं ।।

मारा वही गया जो भला रात दिन किया ।।

देखा हूँ तेरे गाँव में कटते शजर को मैं ।।

मत पूछिए कि आप मेरे क्या नहीं हुए ।।

पाला हूँ बड़े नाज़ से अहले जिगर को मैं ।।

शायद…

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Added by Naveen Mani Tripathi on February 20, 2018 at 7:28pm — 2 Comments

तरही ग़ज़ल

मफ़ऊल फ़ाइलातुन मफ़ऊल फ़ाइलातुन

ख़ुशियों का इस जहाँ में फ़ुक़दान हो न जाये

ग़म अपनी ज़िन्दगी का उन्वान हो न जाये

नफ़रत का आज कंकर जो तेरी आँख में है

इक रोज़ बढ़ते बढ़ते चट्टान हो न जाये

मज़लूम की कहानी सुनकर तू हँस रहा है

तेरा भी हाल ऐसा नादान हो न जाये

सारे अदू लगे हैं,यारो इसी जतन में

पूरा हमारे दिल का अरमान हो न जाये

दोनों तरफ़ की फ़ौजें होने लगीं…

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Added by Samar kabeer on February 20, 2018 at 5:55pm — 17 Comments

कुलीन(लघुकथा)

कहा गया है कि,

साईं इतना दीजिए जा मै कुटुम समाय।

मै भी भूखा न रहूं , साधु न भूखा जाय।।

उनका भी यही हाल था न संपन्न थे न विपन्न , मगर कुलीन थे, तो कुल की पगड़ी के बोझ से उनका सर इस अर्थयुग में हमेशा झुका ही रहता था ।

कुलीन लोगों की तरह उनकी नाक भी बहुत सख्त थी । इतनी सख्त की एकदिन उन्होंने नाक मारकर दिनेश ताँती की बेटी का सर फोड़ दिया था । जिसका उनके भाई को आज भी गम है।

फिर एकदिन उनकी नाक पर बेटी आ बैठी । सख्त नाक बेटी के बोझ से झुकने लगी , इतना कि कभी भी टूटकर गिर सकता… Continue

Added by Kumar Gourav on February 20, 2018 at 3:35pm — 8 Comments

हेडलाइन(लघुकथा)

-हेलो सर।

-हाँ, बोलो रवि',समाचार-संपादक ने खबर की बावत तफ्तीश की।

-जोरदार खबर है सर।

-बताओ भी जल्दी।जान मत खाओ।

-सर,शहर-कोतवाल की बीबी भाग गई।पहले बेटी,अब....।

-धत्त ससुरे!ये भी कोई खबर है?

-तहलका मच जायेगा सर,इस खबर से।

-नहीं रे,कुछ नहीं होगा।अभी घोटालों की खबर चाहिए, ....बस घोटालों की।

-वो भी है साहिब।

-तो बोल ना रे....।

-आज कलम वाली कंपनी के यहाँ छापे पड़ रहे हैं।

-कहाँ?

-यू पी में।हजारों करोड़ की बात…

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Added by Manan Kumar singh on February 20, 2018 at 8:30am — 6 Comments

कविता--फागुन

फागुन
अलसाई हुई भोर को
फागुनी दस्तक की
गंध ने महका दिया
मेरे अंदर भी
बीज अंकुरित होने लगे
तुम्हारे अहसासों के
शायद तुम भी
गुनगुना रही होगी
होली का गीत
प्रेम की मादल पर
कुछ पुरानी यादें भी
थाप दे रही होंगी
हृदय के आँगन में
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on February 20, 2018 at 12:30am — 10 Comments

एक और रत्नाकर(लघुकथा)

रत्नाकर जंगलों में भटकता, और आने-जाने वालों को लूटता | यही तो उसका पेशा था| नारद-मुनी भेस बदलकर उसके सामने खड़े थे, बहुत दिनों बाद एक बड़ा आसामी हाथ लगा है: सोचकर रत्नाकर ने धमकाया ,"तुम्हारे पास जो कुछ भी हो ,सब मेरे हवाले कर दो वरना जान से हाथ धोना पड़ेगा|"

"ठीक है, सब तुमको दे दूंगा,पर यह पाप है,तुम जो भी कुछ कर रहे हो पाप है|"

"यह मेरा पेशा है,पाप और पुण्य को मैं नहीं जानता! तुम मुझे अपना सब कुछ देते हो कि नहीं? वरना यह लो....|"

नारद जी ने निडर होकर कहा," मुझे मारने के…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on February 19, 2018 at 10:43pm — 17 Comments

दबे  पाप  ऊपर  जो  आने  लगे  हैं- गजल



१२२ १२२ १२२ १२२

दबे  पाप  ऊपर  जो  आने  लगे  हैं

सियासत में सब तिलमिलाने लगे हैं।१।



घोटाले वो सबके गिनाने लगे हैं

मगर दोष अपना छिपाने लगे हैं।२।



वतन डूबता है तो अब डूब जाये

सभी खाल अपनी बचाने लगे हैं।३।



रहे कोयले की दलाली में खुद जो

गजब  वो भी उँगलीउठाने लगे हैं।४।



दिया था भरोसा कि लुटने न देंगे

वही बेबसी  अब …

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 19, 2018 at 4:00pm — 20 Comments

'मधुर' जी की मधुर स्मृति .......

11-02-2018 "मधुर" जी के स्मृति में भावभीनी श्रद्धाञ्जलि

छन्द विधा : शक्ति छंद

*********************

कहां प्यार ऐसा मिलेगा कहीं,

हमारे सखा सा जहां में नहीं।

दिया प्यार इतना कि कर्जित हुए,

हुई आंख नम जो थे गर्वित हुए।

 

हमारा सभी का बड़ा भाग था,

अकल्पित उन्हीं पे झुका राग था।

"मधुर" जी में किंचित नहीं द्वेष था,

 अकिंचन हुआ आज जो शेष था।

 

कहीं राग बिखरे कहीं…

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Added by SHARAD SINGH "VINOD" on February 19, 2018 at 3:30pm — 5 Comments

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