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ड्रामा और हकीकत(लघुकथा)

गेट के सामने भीड़ इकठ्ठी हो रही है, कुछ लोग क्रोध से भर कार्यालय के अंदर जाने की कोशिश कर रहे हैं । द्वारपाल भीड़ को रोकने की कोशिश में नकाम हो रहा है।

प्रेस अपने वीडियो कैमरे के साथ कार्यालय तक पहुँच गई है, और पत्रकार कई तरह के सवाल पुछ रहे हैं जैसे “वार्ड नं ३ में होने वाली मौत के बारे आप क्या कहना चाहेंगा। आप बताएँ मौत कि लिए जिम्मेदार चिकित्सक पर क्या एकशन लिया गया है।“

"आप कैसे कह सकते हैं कि मौत के लिए चिकित्सक ही जिम्मेदार है ?" बड़े टेबल की दुसरी तरफ़ बैठे साहिब ने कहा। मैने…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on May 15, 2017 at 4:30pm — 6 Comments

ग़ज़ल

*221 1221 1221 122



-------------



सबसे न बताओ के परेशान यही है ।

आशिक़ हूँ यकीनन मेरी पहचान यही है ।।



यूँ ही न् गले मिल तू जरा सोच समझ ले ।

इस शह्र के हालात पे फरमान यही है ।।



कहने लगी है आज से मुझको भी सरेआम ।

ठहरा है जो मुद्दत से वो मेहमान यही है ।।



बर्बाद गुलिस्तां को सितम गर ने किया जब।

लोगो ने कहा प्यार का तूफ़ान यही है ।



अक्सर ही नकाबों में छुपाते हैं ये चेहरा ।

बैठा जो तेरे हुस्न पे दरबान यही है… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on May 15, 2017 at 1:03pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - जाने किस किस से तेरी अनबन हो ( गिरिराज भंडारी )

2122   1212   22 /112

मेरी मदहोशियाँ भी ले जाना

मेरी हुश्यारियाँ भी ले जाना

 

इक ख़ला रूह को अता कर के

आज तन्हाइयाँ भी ले जाना 

 

जाने किस किस से तेरी अनबन हो

थोड़ी खामोशियाँ भी ले जाना

 

दिल को दुश्वारियाँ सुहायें गर

मुझसे तब्दीलियाँ भी ले जाना

 

कामयाबी न सर पे चढ़ जाये

मेरी नाकामामियाँ भी ले जाना

 

राहें यादों की रोक लूँ पहले

फिर तेरी चिठ्ठियाँ भी ले जाना

 

बे…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 15, 2017 at 10:19am — 23 Comments

एक हांडी दो पेट(लघुकथा)

एक हांडी दो पेट(लघुकथा)

हाई स्कूल के बाद, उसके आगे न पढ़ने के ऐलान करने पर माँ ने जोर देते हुए कहा,"बेटा!बिना पढ़ाई के आज कोई इज्जत नहीं है।तुझे यह कितनी बार समझाऊँ?"

पिता ने जोड़ा,"ठीक कह रही है तेरी माँ।"

वह झल्ला कर बोली,"माँ,बापू मेरे बस का नहीं है पढ़ना।ज्यादा धक्का ना करो।क्या कर लूँगी पढ़ के मैं?"

पिता बोले,"पढ़-लिख जावेगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी।किसी की तरफ देखना न पड़ेगा।जिंदगी में तेरे काम आवेगी पढ़ाई।"

"अच्छा!",उसने मुँह बनाया।

"बेटा!मैं ना पढ़… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on May 14, 2017 at 8:00pm — 18 Comments

ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

2122 2122 2122 212

रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

हौसलों का क्या करूँ चीने जबीं का क्या करूँ



रंग लाती ही नहीं अश्कों दफ़न की कोशिशें

आँख में आती नज़र रंजो ग़मी का क्या करूँ



​​रो रही है रात गुमसुम चाँद तारे मौन है

आग अंतस में लगाये चाँदनी का क्या करूँ



ओढ़ चादर कोहरे की कपकपाते होंसले

हर कदम पे थरथराते आदमी का क्या करूँ



हों इरादे आसमां तो जुगनुओं से रोशनी

आप घर खुद ही जलाये रोशनी का क्या करूँ



गुनगुनायें… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 14, 2017 at 11:52am — 18 Comments

गजल(आइये,आज का चलन.....)

212 212 212 212

^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

आइये,आज का जो चलन,देखिये,

सच हुआ झूठ का जो कथन,देखिये।1



मैं सही,वह गलत,घोषणा हो रही,

जिंस बन बिक रहे वे,रटन देखिये।2



देख लें सूट-बूटी वदन आज कल

फट गयी जेब चमके बटन देखिये।3



बेतरह ढूँढ़ते आपकी गलतियाँ

ढूँढ़ते आप, फटता गगन देखिये।4



नेमतें खुद गिनाते , हुए मौन कब?

लग रहा, बढ़ गया है वजन, देखिये।5



चाँद पर थूकना है मुनासिब कहीं?

दाग लगता नहीं क्या? फलन… Continue

Added by Manan Kumar singh on May 14, 2017 at 8:00am — 14 Comments

भगौड़ों की कतार में(लघुकथा) राहिला

एक पन्द्रह, सोलह साल का लड़का, जिसका चेहरा, जुबान और आँखे बाहर निकलने के कारण विकृत हो चुका था

"लीजिये !,एक और भगौड़ा फांसी पर लटक कर चला आया है।"मृत्युलोक का लेखा -जोखा देखने वाले से स्वर्ग के दरोगा ने कहा।

"तो ले जाओ इसे भी और नर्क में डाल दो।जितनी जिंदगी लिखी थी।उतनी उम्र तक फांसी पर बराबर लटकाते रहो।और साथ ही इसके नीचे हड्डी पिघला देने वाली आग भी जला दी जाए ।"

"लेकिन इतनी सख्त दोहरी सज़ा..., क्यों?"दरोगा ,बालक की कम उम्र देख कर उसके लिए विचलित हो उठा।

"हाँ..!दोहरी… Continue

Added by Rahila on May 13, 2017 at 3:47pm — 13 Comments

ग़ज़ल----(कब वो मेरे दिल से निकला था)

ग़ज़ल

---------

(फअल-फऊलन-फेलुन-फेलुन )

सिर्फ़ वो महफ़िल से निकला था |

कब वो मेरे दिल से निकला था |

दिलबर के दीदार का मंज़र

चश्म से मुश्किल से निकला था |

रास्ता मेरी मंज़िल का भी

उनकी ही मंज़िल से निकला था |

जिसने बचाया बद नज़रों से

वो जादू तिल से निकला था |

हरफे निदा जो बना अदावत

ज़ह्ने मुक़ाबिल से निकला था |

आ ही गया वो फिर मक़्तल में

बच के जो क़ातिल से निकला था…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 13, 2017 at 12:44pm — 16 Comments

ग़ज़ल नूर की- नुमायाँ है तू अपनी गुफ़्तार में,

122/122/122/12 

.

नुमायाँ है तू अपनी गुफ़्तार में,

सफ़ाई न दे हम को बेकार में.

.

फ़क़त एक मिसरे में गीता सुनो

है संसार मुझ में, मैं संसार में.

.

ये तामीर-ए-क़ुदरत भी कुछ कम नहीं

हिफ़ाज़त से रक्खा है गुल, ख़ार में.

.

कहानी को अंजाम होने तो दो

सभी लौट आयेंगे किरदार में.

.

ऐ ज़िल्ल-ए-ईलाही!! ये इन्साफ़ हो,

कि चुनवा दो शैख़ू को दीवार में.

.

तू शिद्दत से माथा पटक कर तो देख

कोई दर निकल…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on May 13, 2017 at 9:30am — 22 Comments

दमकते फिर रहे हैं झुग्गियों में (ग़ज़ल) - ज़हीर क़ुरेशी

1222-1222-122

 

वो ये भी कह रही है सिसकियों में,

बहुत जल बह चुका है नद्दियों में !

 

युवा फूलों पे मँडराने को लेकर,

मची है होड़ क्वाँरी तितलियों में.

 

धुँए को चीरकर घुसने लगी है,

चिता की आग गीली लकड़ियों में.

 

नदी के साथ मीठी मछलियाँ भी,

पहुँच जाती हैं खारी मछलियों में !

 

कई महलों में रहने योग्य हीरे,

दमकते फिर रहे हैं झुग्गियों में.

 

ये ‘एस.एम.एस.’ करने वाली…

Continue

Added by जहीर कुरैशी on May 12, 2017 at 7:22pm — 7 Comments

मैंने गलत को गलत कहा

ना कोई सगा रहा,

जिस दिन से होकर बेधड़क

मैंने गलत को गलत कहा!



तोहमतें लगने लगी,

धमकियां मिलने लगी,

हां मेरे किरदार पर भी

ऊंगलियां उठने लगी,

कातिलों के सामने भी

सिर नहीं मेरा झुका!

मैंने गलत को गलत कहा!



चापलूसों से घिरे

झाड़ पर वो चढ़ गये,

इतना गुरूर था उन्हें

कि वो खुदा ही बन गये,

झूठी तारीफें न सुन

हो गये मुझसे ख़फा!

मैंने गलत को गलत कहा!



मेरी सब बेबाकियों की

दी गई ज़ालिम सज़ा,

फांसी… Continue

Added by shikha kaushik on May 12, 2017 at 5:40pm — 15 Comments

तरही ग़ज़ल (कुछ नही है हाथ मे बस फ़लसफ़ा रोशन करें)

बह्र 2122 2122 2122 212



ज़िन्दगी की राह मुश्किल हौसला रोशन करें

हर गली हर रास्ते पर हम दिया रोशन करें ||



ऐ ख़ुदा बर्कत की ख़ातिर भेज दे महमाँ कोई

अपने दस्तर ख़्वान पर हम ये दुआ रोशन करें ||



हुस्न वाले भी निखर जायेंगे मोती की तरह

गर नुमाइश छोड़ कर शर्म-ओ-हया रोशन करें ||



दूसरों से पूछना क्या हर कमी दिख जाएगी

आप अपने दिल का बस ये आइना रोशन करें ||



हैं यहाँ तनहाइयाँ और वक़्त की मजबूरियाँ

कुछ नही है हाथ मे बस फ़लसफ़ा… Continue

Added by नाथ सोनांचली on May 12, 2017 at 12:00pm — 24 Comments

शिक्षा सबके लिए ( लघुकथा)

" तुम मुझे रोज़ लेने आ जाती हो , मेरे बाबा मुझे डाँटते है । उनको लगता है मैं आलसी हूँ , स्कूल नहीं जाना चाहती । " शीला ने अपनी सहेली मीना से कहा ।



" हाहा हाहा , सही तो कहते है तुम्हारे बाबा , पढ़ाई चोर तो तुम हो ही , जब देखो तुम्हारी कॉपियां अधूरी रहती है ...।" मीना ने हंसकर कहा



" धत्त , कोई नहीं झूठी मेरी कॉपियां तो पूरी होती है , वो तो ....... वो तो ........."अपनी माँ की तरफ़ देखकर शीला चुप हो गयी ।



मीना यह बात जानती थी कि शीला की माँ को शीला का स्कूल जाना पसंद… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 12, 2017 at 11:38am — 14 Comments

सार छंद ( 16 ,12 )

छन्न पकैया छन्न पकैया , ऐसे मेरे नाना
रोज़ सवेरे पानी देते , औ देते थे दाना

छन्न पकैया छन्न पकैया , खुश होते थे नाना
उड़ते हुए परिंदे आते , सब चुगने थे दाना

छन्न पकैया छन्न पकैया ,था उनका ये कहना
आपनी तरह परिंदों का भी, खयाल रखना बहना

छन्न पाकैया छन्न पकैया,सबको ये समझाना
पशु पक्षी पेडों पौधों से, प्यार सदा जतलाना

छन्न पकैया छन्न पकैया , जीना चाहें मरना
नाना सदा यही कहते थे ,प्रेम सभी से करना ।।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on May 11, 2017 at 1:30pm — 13 Comments

नूर की हिंदी ग़ज़ल-बन गया वह राष्ट्र का सरदार क्या?

२१२२, २१२२,२१२ 
.
बन गया वह राष्ट्र का सरदार क्या?
हो गए हैं स्वप्न सब साकार क्या?
.

सत्य से बढ़कर तो ईश्वर भी नहीं,
राष्ट्र क्या फिर मित्र क्या परिवार क्या?
.

राष्ट्र की सेवा सभी का धर्म है,
कर रहे हो तुम कोई उपकार क्या?
.

देख कर इक कोमलांगी के अधर,   
कल्पना लेने लगी आकार क्या? 
.

आचरण में धर्मग्रंथो को उतार,
बाद में दे ज्ञान उनका सार क्या.  

.
निलेश "नूर"
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 11, 2017 at 9:24am — 25 Comments

ग्रीष्म के दोहे

सूरज शोले छोड़ता ,पशु भी ढूँढे छाँव ।
दर खिड़की सब बंद है ,सन्नाटे में गाँव ।।

भीषण गरमी पड़ रही,पशु -मानव हैरान ।
भू जल भी घटने लगा, साँसत में है जान ।।

पारा बढ़ता जा रहा, सूख रहे तालाब ।
देखो गाँव महानगर , हालत हुई खराब ।।

पत्ते झुलसे पेड़ पर ,नीम बबूल उदास ।
पशु किसान सबको लगी, पानी की अब आस ।।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on May 11, 2017 at 8:30am — 14 Comments

गजल( बेखुदी में यार मेरे....)

2122   2122  2122  212

बेखुदी में यार मेरे याद आना छोड़ दो

मुस्कुराने की अदा है कातिलाना, छोड़ दो।1

 

सूखती-सी जो नदी उम्मीद की, बहती रही

कान में पुरवाइयों-सी गुनगुनाना छोड़ दो।2

 

ख्वाहिशों के दौर में थमती नहीं है जिंदगी 

उँगलियों पर अब जरा मुझको नचाना छोड़ दो।3

 

चाँद ढलता जा रहा फिर है पड़ी सूनी गली

बेबसी में अब कभी मुझको बुलाना छोड़ दो।4

राह अपनी मैं चलूँ तुमको मुबारक रास्ते

अनकही बातें बता रिश्ते…

Continue

Added by Manan Kumar singh on May 10, 2017 at 9:11pm — 10 Comments

दोहे

जीवन हमको बुद्ध का , देता है सन्देश |

रक्षा करना जीव की , दूर रहेगा क्लेश ||1||

भोग विलास व नारियां, बदल न पाई चाल |

योग बना था संत का, छोड़ दिया जंजाल ||2||

मन वीणा के तार को, कसना तनिक सहेज |

ढीले से हो बेसुरा , अधिक कसे निस्तेज ||3||

बंधन माया मोह का , जकड़े रहता पाँव |

जिस जिसने छोड़ा इसे , बसे ईश के गाँव ||4||

धन्य भूमि है देश की, जन्मे संत महान |

ज्ञान दीप से जगत का,हरे सकल अज्ञान ||5||

.…

Continue

Added by Chhaya Shukla on May 10, 2017 at 2:00pm — 9 Comments

बंद दरवाज़े (लघुकथा )

“आंटी जी, अगर उस दिन आप ने मेरे सर पर हाथ न रखा होता तो पता नहीं मैं कहाँ होती”

“कीमत तो वो मेरी पहले ही लगा चुके थे,उस रोज़ तो बस पैसे देने ही आए थे ”।

“मुझ को तो कुछ पता ही नहीं चलने दिया था”  ऋतू ये कहती जा रही थी।

“ये तो भला हो, मेरे साथ डांस पार्टी में काम करने वाली सुनीता का,

 "उस बता दिया मुझको  कि  मालिक तो मेरे पैसे ले रहा  हैं, कल तुम किसी और डांस पार्टी में काम करोगी "

  "तब मुझे आप के पास तो आना ही था, आंटी जी" 

 “घर से तो अमली ने  पहले ही…

Continue

Added by मोहन बेगोवाल on May 10, 2017 at 12:30pm — 8 Comments

अक्सर मैं फूलों को बचाया करता हूँ,--ग़ज़ल

2212/2212/2212



अक्सर मैं फूलों को बचाया करता हूँ,



काँटो से मैं खुद को सजाया करता हूँ।







इन मन्दिरों में मस्जिदों में जाना क्या,



कुछ भूखे बच्चों को खिलाया करता हूँ।







रोता बहुत हूँ पर तुने जाना नही,



गम को मियाँ हँस कर छुपाया करता हूँ।







मुझसे भी मिलने गाँव तुम आया करो,



मै सब को आईना दिखाया करता हूँ।







मै प्यार मे जीता करूं ! चाहत नही,



मै प्यार मे… Continue

Added by Hemant kumar on May 10, 2017 at 11:47am — 8 Comments

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