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ग़ज़ल....रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ

2122 2122 2122 212
रूप लम्हों में बदलती ज़िन्दगी का क्या करूँ
हौसलों का क्या करूँ चीने जबीं का क्या करूँ

रंग लाती ही नहीं अश्कों दफ़न की कोशिशें
आँख में आती नज़र रंजो ग़मी का क्या करूँ

​​रो रही है रात गुमसुम चाँद तारे मौन है
आग अंतस में लगाये चाँदनी का क्या करूँ

ओढ़ चादर कोहरे की कपकपाते होंसले
हर कदम पे थरथराते आदमी का क्या करूँ

हों इरादे आसमां तो जुगनुओं से रोशनी
आप घर खुद ही जलाये रोशनी का क्या करूँ

गुनगुनायें गीत कैसे औ कहें कैसे ग़ज़ल
जो समझ आती नहीं तो शायरी का क्या करूँ

चीने जबीं-माथे की सलवट
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
बहुत बहुत आभार आदरणीय सुरेन्द्र जी..सादर
Comment by सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' on Thursday
आद0 ब्रजेश कुमार जी सादर अभिवादन, उम्दा गजल के लिए बधाई स्वीकारें
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Thursday
आदरणीय लक्षमण जी सुन्दर शब्दों में उत्साहवर्धन के लिए ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ...सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Thursday
उचित है आदरणीय अनुराग जी सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Thursday
जरूर आदरणीय महेंद्र जी..रचना पटल पे आपकी उपस्थिति स्वागतयोग्य है..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Thursday
आदरणीय गिरिराज जी आपकी अमूल्य सलाह के लिये ह्रदय से अभिनन्दन वंदन..सादर
Comment by laxman dhami on Thursday

आ. भाई बृजेश जी , सुंदर गजल हुई है हार्दिक बधाई ।

Comment by Anuraag Vashishth on Wednesday

आ. बृजेश जी,

मद्दाह साहब का उर्दू शब्दकोश PDF फाइल की शक्ल मेरी पिछली पोस्ट में दिए गए लिंक पर क्लिक करें आपको मिल जाएगा.

मैं दिल्ली जाता हूँ तो हिंदी किताबों के लिए अक्सर हिंदी बुक सेंटर जाता हूं. यह आसफ अली रोड पर है.अगर आपको हार्ड कॉपी चाहिए तो वहां कोई न कोई उर्दू हिंदी कोश आपको मिल जाएगा.

सादर

Comment by Mahendra Kumar on Wednesday

अच्छी ग़ज़ल है आदरणीय बृजेश जी. हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए. गुणिजनों की बातों पर ध्यान दीजिएगा. सादर.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 16, 2017 at 9:33pm

आदरणीय बृजेश भाई , अच्छी लगी आपकी गज़ल , बधाइयाँ स्वीकार करें । गुणिजनो की सलाहों पर गौर कीजियेगा ।

कृपया ध्यान दे...

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