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ग़ज़ल.. जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में

1222 1222 1222 1222
उठा लो हाथ में खंज़र लगा दो आग सीने में
धरा है क्या नजाकत में नफासत में करीने में

बड़े खूंरेज कातिल हो जलाया खूब इन्सां को
जला दो दीप उल्फत के कभी काशी मदीने में

उठी लहरें हजारों नागिनें फुफकारती जैसे
न कोई बच सका जिन्दा समंदर में सफीने में

न सर पे आशियाँ जिनके न खाने को निवाले हैं
उन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने में

हुये मशहूर किस्से जब अदाए कातिलाना के
सहेजूँ किस तरह तुमको अँगूठी के नगीने में

घटायें उनकी यादों की ले आईं आँख में पानी
बचा 'ब्रज' कौन फ़ुरक़त से यहाँ सावन महीने में
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Saturday
आदरणीय अनुराग जी सादर अभिवादन स्वीकार करें..आपने एक नया नजरिया प्रदान किया है ग़ज़ल को..इस दिशा में मैं सोच ही नहीं पाया..सादर आभार
Comment by Anuraag Vashishth on Saturday

आ. बृजेश जी,

बहुत खूब! पिछली ग़ज़ल और इसमें ज़मीन-आसमान का फर्क है. 

'बड़े खूंरेज कातिल हो जलाया खूब इन्सां को'

इस मिसरे में 'खूब' के प्रयोग से एक व्यंग का भाव पैदा होता है.यह हिंसा का खूबी के तौर पर स्वीकार नहीं है. इसलिए मुझे खूब के प्रयोग में कुछ आपत्तिजनक नहीं दिखता.

'उन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने में'

गरीबी की अतिशयता जीने और मरने का फर्क मिटा देती है, बदती आत्महत्या और हिंसा की घटनाओं की वजह बहुत हद तक जीने और मरने का फर्क मिटा देने वाली ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं. इसलिए मुझे इस मिसरे में भी कुछ आपत्तिजनक नहीं लग रहा.

हार्दिक शुभकामनाएं 

सादर 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
आदरणीय नीलेश जी सादर अभिवादन स्वीकार करें..आपकी सलाह सर्वथा उचित है..बुंदेलखंड में अधिक या बहुत जयादा के लिए खूब का प्रयोग करते हैं..मैंने वही अर्थ ले लिया लेकिन ये मेरी गलती है..खूब का मतलब गुणवत्ता से है..चौथे शे'र में भी कुछ सुधार करता हूँ..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
आदरणीय गिरिराज जी सादर अभिवादन..आदरणीय आपका इशारा तीसरे शे'र की तरफ है..चौथा शे'र 'निवाले हैं..जीने में'..सादर
Comment by Nilesh Shevgaonkar on Friday

आ. बृजेश जी,
अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई ...
 जलाया खूब इन्सां को.. में ख़ूब का प्रयोग ठीक नहीं है ... क्यूँ की हिंसा ख़ूबी के तौर पर कवि ह्रदय स्वीकार नहीं कर पाता ..
न सर पे आशियाँ जिनके न खाने को निवाले हैं
उन्हें क्या फर्क पड़ता है यूँ मरने और जीने में... यहाँ भी.. किसी और को फर्क पड़े न पड़े... लेकिन जिस पर बीत रही है उसे तो फ़र्क पड़ता है... उन्हें की जगह किसी को क्या फर्क पड़ता है जैसा भाव होना चाहिए ..
सोचियेगा 
सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on Friday

आदरणीय बृजेश भाई ... अच्छी ग़ज़ल कही है , हार्दिक बधाइयाँ , चौथे शेर में

जैसे  और  में   ,      में दोष नही आ रहा है ...  में , अनुस्वार के साथ है  और से  बिना अनुस्वार के । मेरे ख्याल से बदलने की ज़रूरत नही है ।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
चौथे शे'र में रादिफेन दोष है कुछ अच्छा कर सकूँ कोशिश कर रहा हूँ..
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
आदरणीय विजय जी बहुत बहुत आभार..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
आदरणीय गुरप्रीत जी हौसलाफजाई के लिए हार्दिक धन्यवाद..सादर
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on Friday
आदरणीय समर सर आपके रचना पे आने से सृजन सार्थक हुआ..सादर अभिवादन स्वीकार करें..

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