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ग़ज़ल नूर की-रोज़ जो मुझ को नया चाहती है

२१२२/११२२/२२ (११२)

रोज़ जो मुझ को नया चाहती है
ज़िन्दगी मुझ से तू क्या चाहती है?
.
मौत की शक्ल पहन कर शायद
ज़िन्दगी बदली क़बा चाहती है.
.
मशवरे यूँ मुझे देती है अना
जैसे सचमुच में भला चाहती है.
.
इक  सितमगर जो  मसीहा भी न हो,
नई दुनिया वो  ख़ुदा चाहती है.
.
“नूर’ बुझ जाये चिराग़ों की तरह
क्या ही नादान हवा चाहती है. 
.
निलेश"नूर"

मौलिक/ अप्रकाशित 

Added by Nilesh Shevgaonkar on May 2, 2017 at 2:00pm — 34 Comments

हो गया वह बे मुरव्वत देखते ही देखते

ग़ज़ल

फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन-फाइलुन



मिल गई उल्फ़त की जन्नत देखते ही देखते।

हो गई उन से मुहब्बत देखते ही देखते।



आ गया है कौन आख़िर हुस्न के बाज़ार में

हो गई बरपा कियामत देखते ही देखते ।



हो गया शायद वफाओं का सितमगर पर असर

ख़त्म करदी उसने नफ़रत देखते ही देखते।



कारवां वालों को हासिल ही न था जिसको यक़ी

उसने पा ली है क़यादत देखते ही देखते।



ये है खारों की हिमायत का नतीजा बागबां

हो गई हर सू बग़ावत देखते ही… Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on May 1, 2017 at 8:34pm — 18 Comments

नज़र में कोई सूरत है? नहीं तो (ग़ज़ल)

1222 1222 122



मुहब्बत की ज़रुरत है? नहीं तो

ये ग़म क्या रस्म-ए-उल्फ़त है? नहीं तो



तेरी इसपर हुक़ूमत है? नहीं तो

ये दिल तेरी रियासत है? नहीं तो



ये दुनिया ख़ूबसूरत है? नहीं तो

किसी में आदमीयत है? नहीं तो



कोई मंज़र नहीं जँचता है गोया

नज़र में कोई सूरत है? नहीं तो



किसी दिन चाँद उतरे मेरे छत पर

उसे क्या इतनी फुरसत है? नहीं तो



मुहब्बत से ही इतना कुछ मिला है

कुछ और पाने की चाहत है? नहीं तो



कि मर-मर के… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on May 1, 2017 at 3:48pm — 16 Comments

कुण्डलिया छंद -- (अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष)

1-

उत्पादन को चाहिए, पाँच प्रमुख जो तत्व।

उनमें श्रम का मानिए, सबसे अधिक महत्व।।

सबसे अधिक महत्व, भूमि श्रम साहस पूँजी।

और संगठन खास, बात मैं खरी कहूँ जी।।

श्रमिक दिवस पर आज, करें उनका अभिनंदन।

करता देश विकास, तभी जब हो उत्पादन।।

2-

रोटी की खातिर खटे, श्रम साधक मजदूर।

सुख सुविधाओं से परे, रहता जो मजबूर।।

रहता जो मजबूर, और भूखा सो जाता।

उसके श्रम का मोल,नहीं उसको मिल पाता।।

श्रम के भी कानून, मगर नीयत है खोटी।

इस कारण भरपेट, न उसको… Continue

Added by Hariom Shrivastava on May 1, 2017 at 1:28pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - मिरा गिरना किसी की है मसर्रत - ( गिरिराज )

1222    1222    122

है तर्कों की कहाँ.. हद जानता हूँ

मुबाहिस का मैं मक़्सद जानता हूँ

 

करें आकाश छूने के जो दावे

मैं उनका भी सही क़द जानता हूँ

 

बबूलों की कहानी क्या कहूँ मैं

पला बरगद में, बरगद जानता हूँ

 

बदलता है जहाँ, पल पल यहाँ क्यूँ

मै उस कारण को शायद जानता हूँ

 

पसीने पर जहाँ चर्चा हुआ कल

वो कमरा, ए सी, मसनद जानता हूँ

 

यक़ीनन कोशिशें नाकाम होंगीं

मै उनके तीरों की जद,…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on May 1, 2017 at 11:00am — 22 Comments

तरही गज़ल-माह अप्रैल 2017 के अनुरूप

1222 1222 122

भुला दूँ अपनी आदत है? नहीं तो
यहाँ मन खुश निहायत है? नहीं तो

सुकूँ है चीज़ क्या एहसास तो दे
सिवा तेरे भी आयत है? नहीं तो

नज़र में है नमीं सब स्वप्न भींगे
किसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो

महज़ है नाम का भ्रम औ नहीं कुछ
तिलक टोपी इबादत है? नहीं तो

मिलो तो मन से वर्ना तुम न मिलना
छिपाने की इजाज़त है? नहीं तो



मौलिक अप्रकाशित
तरही ग़ज़ल माह अप्रैल के अनुरूप, देर से पेश

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on May 1, 2017 at 12:00am — 8 Comments

ग़ज़ल: उसको ये समझाना है

(बह्र--22/22/22/2)
उसको ये समझाना है ,
इक दिन सबको जाना है ।

.
हँस के रोकर कैसे भी ,
जीवन क़र्ज़ चुकाना है ।

.

देखो, भटका फिरता वो ,
वापस घर तो आना है ।

.

अच्छी सच्ची राहें हैं
सबको ये बतलाना है ।

.

उसके संगी-साथी को ,
मिलकर हाथ बढ़ाना है ।

.

आशा की किरणों वाला ,
फिर से दीप जलाना है ।

.
मौलिक एवं आप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on April 30, 2017 at 4:00pm — 13 Comments

शराफ़त (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"तुम्हारे अब्बू तो बस क़िताबी बातें करते रहेंगे! तू तो छोड़-छाड़ अपने शौहर को!" मायके में आई अपनी लाड़ली बिटिया सलमा को समझाते हुए उसकी अम्मी ने कहा- "तुझे इतना पढ़ा-लिखा कर नौकरी इसलिए नहीं करवाई है कि तू शौहर से यूं दब कर रहे। आख़िर उसकी औक़ात क्या है, तू उससे तिगुना कमाती है!"



"तुम सही कहती हो अम्मी! ऐसे आदमी के साथ ज़िंदगी जीना तो मेरे लिए बहुत मुश्किल है, यहां अब्बू से परेशान रही और वहां शौहर और ससुर के उसूलों से!"



"अपनी सहेली नग़मा को देखो, शौहर को छोड़ अपने बेटे के… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on April 30, 2017 at 8:39am — 12 Comments

ग़ज़ल।--हो गई बात कुछ इशारों से ।

2122 1212 22

फूल ढूढे गए किताबों से ।

हो गयी बात कुछ इशारों से ।।



कुछ गलत फहमियां हुई होंगी ।।

उस से मिलता कहाँ मै वर्षों से ।।



फेसबुक से उसे भी नफरत है ।

डर उसे है अनाम रिश्तों से ।।



कुछ तो है वो खफा ख़फ़ा शायद ।

लग गया बेलगाम बातों से ।।



आशिकी का नशा हुआ महंगा ।

रिन्द घटने लगे हैं खर्चों से ।।



बाद मुद्दत के जब मिले उस से ।

दर्द छलका तमाम आंखों से ।।



हो यकीनन जफ़ा के काबिल तुम ।।

शर्म तुमको… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 30, 2017 at 8:03am — 3 Comments

ग़ज़ल

2212-1212-2212-12

थोड़ी तसल्लियों में मेरा इंतजार हो ।

माना कि आज तुम जियादा बेकरार हो ।



वह मैकदों के पास से गुजरा नहीं कभी ।

गर चाहते हो रिन्द को तो इश्तिहार हो ।।



निकला है आज चाँद शायद मुद्दतों के बाद ।

अब वस्ल पर वो फैसला भी आरपार हो ।।



आया शिकार पर न् वो खुद ही शिकार हो ।

इतना खुदा करे उसे बेगम से प्यार हो ।।



लिख्खा दरख़्त पर किसी पगली ने कोई नाम ।

शायद गरीब दिल की कोई यादगार हो।।



हालात हैं खराब क्यों…

Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on April 30, 2017 at 7:30am — 4 Comments

विश्वास की जीत

" मम्मा , मै अपनी आगे की पढाई पूरी कर पाउन्गी ना ?" माधुरी ने निराशा और अविश्वास भरे स्वर मे माँ से कहा जो उसका सर अपनी गोद मे रख अपनी आंखो से बहती नदी को रोकने का प्रयास कर रही थी l

" हाँ ...मेरी बेटी तो बहुत बहादुर है वो सब कर पायेगी , भगवान का लाख लाख शुक्र है तुम अब पहले से बहुत ठीक हो नही तो...."कहते कहते माँ का गला रुन्ध गया और कुछ दिन पहले हुआ वो भयानक एक्सिडेंट याद आ गया l

भय के कारण उनके रोन्ग्टे खडे हो गये और उन्होने माधुरी के हाथ को कस कर पकड़ लिया l

माँ के इस तरह के… Continue

Added by Renuka chitkara on April 30, 2017 at 1:03am — 3 Comments

ग़ज़ल नूर की - ज़रा सी देर में सूरज निकलने वाला

१२१२/ ११२२/ १२१२/ २२



अँधेरों!! “नूर” ने जुगनू अभी उछाला है,

ज़रा सी देर में सूरज निकलने वाला है.

.

बिदा करेंगे तो हम ज़ार ज़ार रोयेंगे,

तुम्हारे दर्द को अपना बना के पाला है. 

.

नज़र भी हाय उन्हीं से लड़ी है महफ़िल में,

कि जिन के नाम का मेरे लबों पे ताला है.  

.

शजर घनेरे हैं तख़लीक़ में मुसव्विर की

सफ़र की धूप ने उस पर असर ये डाला है.  

.

निकल के कूचा-ए-जनां से आबरू न गयी,

लुटे हैं सुन के…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on April 29, 2017 at 7:27pm — 20 Comments

भूल गया जो मै खुद (कविता)"मल्हार"

भूल गया जो मै खुद को तुझको पाकर

ये क्या कर बैठा दिल मेरा तुझपे आकर,

बस गये जो तुम मेरे इस दिल में आकर

मर न जाऊँ कहीँ मै इतनी ख़ुशी पाकर,

तूने ये क्या कर दिया दिल में मेरे आकर

अब  तोड़ो ना दिल इस तरह से जाकर,

ख़ुदा मिल गया था जैसे तुझको पाकर

बता अब क्या कहूँ में ख़ुदा के घर जाकर,

पूछे जो क्यों भूल गया था किसी को पाकर

तू ही कुछ राह सूझा जा वापिस आकर,

कैसे बताऊँ मिल गया था क्या तुझको पाकर

ख़ुदा ही रूठ गया मेरा तो जैसे…

Continue

Added by रोहित डोबरियाल "मल्हार" on April 29, 2017 at 6:26am — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दिल ए नाकाम पर हँसी आई

2122/1122 1212 22/112

दिल ए नाकाम पर हँसी आई

तेरे इलज़ाम पर हँसी आई



जिस मुहब्बत की आरज़ू थी बहुत

उसकेे अंजाम पर हँसी आई



दास्ताँ अपनी लिखने बैठा था

अपने इस काम पर हँसी आई



जिसमें तुमने कभी रखा था मुझे

आज उस दाम पर हँसी आई



मेरे क़ातिल का तज़किरा जो हुआ

तो हर इक नाम पर हँसी आई।



दफ्अतन मेरी जाँ से लिपटे हुए

सभी आलाम पर हँसी आई



सारे असरार जब खुले मुझपर

अपने औहाम पर हँसी… Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on April 28, 2017 at 5:26pm — 22 Comments

गर्व ....

गर्व ....

रोक सको तो

रोक लो

अपने हाथों से

बहते लहू को

मुझे तुम

कोमल पौधा समझ

जड़ से उखाड़

फेंक देना चाहते थे

मेरे जिस्म के

काँटों में उलझ

तुमने स्वयं ही

अपने हाथ

लहू से रंग डाले

बदलते समय को

तुम नहीं पहचान पाए

शर्म आती है

तुम्हारे पुरुषत्व पर

वो अबला तो

कब की सबला

बन चुकी ही

जिसे कल का पुरुष

अपनी दासी

भोग्या का नाम देता था

देखो

तुम्हारे…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 5:00pm — 6 Comments

यकीं के बाम पे ...



यकीं के बाम पे ...

हो जाता है

सब कुछ फ़ना

जब जिस्म

ख़ाक नशीं

हो जाता है

गलत है

मेरे नदीम

न मैं वहम हूँ

न तुम वहम हो

बावज़ूद

ज़िस्मानी हस्ती के

खाकनशीं होने पर भी

वज़ूद रूह का

क़ायनात के

ज़र्रे ज़र्रे में

ज़िंदा रहता है

ज़िंदगी तो

उन्स का नाम है

बे-जिस्म होने के बाद भी

रूहों में

इश्क का अलाव

फ़िज़ाओं की धड़कनों में

ज़िंदा रहता है

लम्हे मुहब्बत…

Continue

Added by Sushil Sarna on April 28, 2017 at 2:05pm — 7 Comments

चला गया ये बचपन बनके यादों का बराती

शीर्षक : चला गया ये बचपन बनके यादों का बराती



" बचपन. .. के दिन हमने भी.. थे देखे

जवानी की रातें हमने भी.. हैं काटी ..

बलखा के गिरती .. वो लाखों पतंगे ,

डगमगा के चलती हुयी.. ये जवानी... |

फुदकता-उछलता .. मन वो हमारा ..

थिरकती दिलों पे.. ये अब की रवानी ,

कि पापा के कांधे पे गुजरा..वो ऑगन..

तकिये भिगोता अब के रातों का सावन |

माँ के आँचल.. तले बीते हुये वो लम्हें ..

कि कॉलेज.. मे होते वो नयन.. ईशारे ,

कि रंगों से दिवारों पे.. चित्रकारी… Continue

Added by Vivek Kumar on April 28, 2017 at 1:23pm — 3 Comments

मत भूल तुझमें रक्त का दौड़ता उबाल है

माना तेरा परिचय रूप है श्रंगार है.. पर,

मत भूल तुझमें रक्त का दौड़ता उबाल है |

सब पीर हैं तुझसे तृषित संसार की..

पर कैद सीने मे तेरे भी सहन का भण्डार है |

तू मूर्त है अभिमान की और गर्व भी अपार है,

तोड़ पैरों की बेड़ियाँ ये तेरा भी संसार है |

प्रेम की ओढ़े चुनरिया तू त्याग का गुबार है,

मत भूल तुझमें रक्त का दौड़ता उबाल है ||

गर जमीर तेरा साफ है तो जरूरत नही प्रमाण की,

कि दर्द तेरा हार और परिस्थिति श्रंगार है |

दुनिया ने देखी है तेरी सौंदर्य की…

Continue

Added by Vivek Kumar on April 27, 2017 at 10:30pm — 2 Comments

बाल ग ज ल

22 22 22 22 2
ढ़ेरों रंगों के गोल टमाटर
होते हैं कितने लोल टमाटर!1

पककर वे लाल हुए जाते हैं
गिरते,कहते ले तोल, टमाटर।2

अपने अंदर हैं लौह-विटामिन
कहते,खा दिल खोल टमाटर।3

वे खूब चहकते हैं डालों पर
झूलते हैं झूला डोल टमाटर।4

झोंके लगते हैं जोर हवा के
गिरते हैं ढ़म -ढ़म ढ़ोल टमाटर।5
'मौलिक व अप्रकाशित'

Added by Manan Kumar singh on April 26, 2017 at 7:31pm — 3 Comments

ग़ज़ल--खुदा की कसम शायरी हो न पाई

ग़ज़ल

फ ऊलन -फ ऊलन- फ ऊलन- फ ऊलन 

.

ये हसरत मुकम्मल कभी हो न पाई।

मिले वह मगर दोस्ती हो न  पाई ।

मुलाक़ात का सिलसिला तो है जारी

मगर इब्तदा प्यार की हो न पाई ।

त अज्जुब है बदले हैं महबूब कितने

मगर काम रां आशिक़ी हो न पाई।

गए वह तसव्वुर से जब से निकल कर 

खुदा की क़सम शायरी हो न पाई ।

करें नफ़रतें भूल कर सब मुहब्बत

अभी तक ये जादूगरी हो न पाई ।

मुसलसल वो करते रहे बे…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on April 26, 2017 at 7:30pm — 8 Comments

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