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हैपी चौकलेट डे ....//डॉ० प्राची

Happy Chocolate Day

एक चौकलेटी गीत के साथ



बंद करो इस लुका-छिपी को

दिल का हर इक राज बताओ,

चौकलेट्स लिये तोहफ़े में

आओ पास अभी आ जाओ।



कुछ मुस्काकर कुछ इतराकर

परतें चलो सुनहरी खोलें,

इक दूजे का मीठापन रख

आज जुबाँ में मिसरी घोलें,



छोड़ो मन की भूल-भुलैया

आओ जल्दी हाथ मिलाओ। चौकलेट्स...



जो मैं बोलूँ वो तुम समझो

मैं भी समझूँ जो तुम बोलो,

पास बैठ कर, हँस कर रो कर

दिल की सारी गाँठें खोलो,



कितना… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 9, 2017 at 8:52am — 5 Comments

नामुमकिन है- गजल

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(बह्र ए मीर)



वो आएं मैं चहक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है

उन्हें देख कर चमक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



तन पाटल चन्दन मन सुरभित वाणी ज्यों कचनार झरे

उनसे मिल कर महक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



गेंहुवन रंग लटें नागिन सी हृदय पे सीधे वार करें

फिर भी उनके निकट न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



सुर सरिता अधरों से बहती, इधर राग स्नेहिल पंछी

कोकिल स्वर संग कुहक न जाऊँ, ऐसा तो नामुमकिन है



भाव भंगिमाओं का उत्तर,… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 8, 2017 at 10:48pm — 13 Comments

साझा कौम (लघुकथा)

छोटा सा कस्बाई शहर जो बड़ी सिटी बनने की होड़ में अपनी तरुणाई छोड़ व्यस्क होने लगा था । जिसकी छाती पर स्वहस्ताक्षरित ठप्पा ये झुग्गी बस्ती थी जो अमूमन अब हर बड़े शहर की पहचान बन चुकी है ।

कुल जमा ढ़ाई सौ बीपीएल कार्डधारियों की बसाहट जिनकी हर सुबह भूख को जीतने की अथक कोशिश , शाम को एक उम्मीद के साथ ढल जाया करती थीं । इधर पिछले कुछ दिनों से इस शहर मे भी खूब जलसा - जुलूस होने लगें थे । एक अस्थायी रोजगार का सुनहरा अवसर ....

" हाफिज , रहमान , सलीम, केशव और मुन्ना ! जल्दी करो , समय हो गया । हमे… Continue

Added by Aparajita on February 8, 2017 at 3:00pm — 15 Comments

गीत

ओ मेरे जीवन के सृंगार, मेरे पहले पहले प्यार,

तुम आओ तो हो जाये, मेरा हर सपना साकार

खेतों में सरसों लहराई, चलने लगी बैरन पुरवाई,

तन - मन में है आग लगाये, सुने न मेरी वो हरजाई,

तुम बिन सूना - सूना लागे, मुझको ये संसार।।

तुम आओ तो हो जाये, मेरा हर सपना साकार। ....

फागुन ने है पंख पसारे, रस्ता देखे नैन तिहारे,

चूड़ी, काजल, बिंदिया, पायल,…

Continue

Added by Anita Maurya on February 8, 2017 at 4:48am — 7 Comments

कल भी था और आज भी है (ग़ज़ल)

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इन बन्ज़र आँखों में समंदर कल भी था और आज भी है

प्यास से मरना मेरा मुक़द्दर कल भी था और आज भी है



कोई इलाज-ए-ज़ख्म-ए-दिल वो ढूँढ न पाया आज तलक

बेबस का बेबस चारागर कल भी था और आज भी है



उसी राह से कितने मुसाफ़िर मंज़िल तक जा पहुँचे, मगर

उसी जगह पर राह का पत्थर कल भी था और आज भी है



अजल से लेकर आज तलक जाने कितनों की नींदें ठगीं

बदनामी का दाग़ चाँद पर कल भी था और आज भी है



दैर-ओ-हरम,दश्त-ओ-सहरा में मिलता भी कैसे… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on February 7, 2017 at 11:30pm — 16 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरी तरह से तुम्हारा ये हाल हो के न हो(ग़ज़ल 'राज')

१२१२  ११२२   १२१२  ११२

मेरी वफा का तुम्हें  कुछ ख़याल हो के न हो

इनायतों का खुदा की कमाल हो के न हो

 

मैं हो गई हूँ मुहब्बत में क्या से क्या ए सनम   

मेरी तरह से तुम्हारा ये हाल हो के न हो

 

बिना पढ़े ही निगाहों से दे दिया है जबाब

लिखा जो खत में वो मेरा सवाल हो के न हो

 

गुलाब  से ही मुहब्बत करे ज़माना यहाँ

शबाब उसमे है पूरा जमाल हो के न हो

 

कमाँ से कितने उछाले  हैं तीर भँवरे यहाँ

ये हाथ में है…

Continue

Added by rajesh kumari on February 7, 2017 at 10:00pm — 16 Comments

आइए बस चले आइये

212 212 212

इस तरह रूठ मत जाइए ।

आइये बस चले आइये ।।



आज तो जश्न की रात है ।

घुंघरुओं की सदा लाइए ।।



टूट जाए न दिल ही मेरा ।

जुल्म इतना नहीं ढाइये ।।



बेगुनाही पे चर्चा बहुत ।

कुछ सबूतों से भरमाइये ।।



जो तरन्नुम में था मैं सुना ।

गीत फिर से वही गाइये ।।



हम गिरफ्तार पहले से हैं ।

मत रपट कोई लिखवाइये।।



है ग़ज़ल में मेरे तू ही तू ।

एक मिसरा तो पढ़वाइये ।।



हूँ तेरे हुस्न का आइना… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on February 7, 2017 at 9:00pm — 8 Comments

गजल //// हैसियत सरकार रखते हैं

 1222 1222 1222 1222

           

कहो तो घोल दें मिसरी ये हम अधिकार रखते हैं  

सिराओं में जहर भर दे वो हम फुफकार रखते हैं

 

बहुत से बेशरम आते हैं छुप –छुप कर हमारे घर  

उन्ही के दम से हम भी हैसियत सरकार रखते हैं

 

दिखाते है हमें वे शान-शौकत से झनक अपनी

तो उनसे कम नहीं घुँघरू की हम झनकार रखते हैं  

 

छिपे होते है आस्तीनों में अक्सर सांप जहरीले

इधर हम बज्म में उनसे बड़े फनकार रखते…

Continue

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 7, 2017 at 8:13pm — 12 Comments

गजल(गीत कौवे गा रहे हैं आजकल)

2122 2122 212

*****************

गीत कौवे गा रहे हैं आजकल

कंठ कोयल के भरे हैं आजकल।1



दुश्मनी सारी भुलाकर मसखरे

फिर गले से मिल रहे हैं आजकल।2



गालियाँ देते परस्पर जो रहे

प्रीत के सागर बने हैं आजकल।3



आज दुबके हैं सभी गिरगिट यहाँ

रंग बदलू आ गये हैं आजकल।4



कुर्सियों का ताव इतना बढ़ गया

धुर विरोधी भा गये हैं…

Continue

Added by Manan Kumar singh on February 7, 2017 at 7:00pm — 12 Comments

स्लो मोशन या उल्टी गिनती (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"भगवान समय-समय पर मनुष्य को उसकी औक़ात से वाक़िफ़ करवाता रहता है !" टेलीविजन पर भूकम्प की ख़बरें देखते हुए जोशी जी ने अपने मित्र से कहा।



"सच कहा तुमने ! वक़्त और हालात के साथ इन्सान इतना स्वार्थी हो गया कि प्रकृति, पर्यावरण और भगवान से भी रिश्ते बिगाड़ बैठा !"



मित्र की इस बात पर जोशी जी बोले- "वक्त और हालात सदा बदलते रहते हैं, लेकिन अच्छे रिश्ते और सच्चे दोस्त कभी नहीं बदलते ? बिगड़ते तब हैं, जब सोच बिगड़ जाती है ! सोच ही तो पहले प्रदूषित हुई है, पर्यावरण बाद में!… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 7, 2017 at 6:51pm — 7 Comments

***एक उलझन*** (लघुकथा)राहिला

"किस दुनियाँ में विचर रही हो।सोचती हो अपने बूते पर आसमान छू लोगी।यहाँ स्थापित लोगों की कृपा दृष्टि के बगैर कोई टिका है आज तक।"अंदाज में उपहास था। जिसे उसने खूब समझा।

"पता नहीं सर! सच क्या है ?बड़ी उलझन में हूँ ।एक तरफ आपकी अनुभवी सोच और दूसरी तरफ मेरी आपबीती।"

"मतलब मेरी बात पर शक है ।इतने सालों में हासिल किया है कुछ ?अब एक बार वह करो जो इन्होने किया ।"मेले में सजी नये लेखकों की पुस्तकों की ओर इशारा करते हुए ,उन्होंने अपना हाथ उसकी ओर बढ़ाया।

"कहने का तात्पर्य आपका हाथ मेरे सिर पर… Continue

Added by Rahila on February 6, 2017 at 10:08pm — 21 Comments

कुछ हाइकू

मन की बात
करते, कभी जाना
मन की बात

समझौते हैं
समझ का फेर, जो
समझ सको


रिश्ते नाते तो
ज्यों पतंग की डोर
उलझे जाते

मौलिक एवं अप्रकाशित.

Added by Neelam Upadhyaya on February 6, 2017 at 5:02pm — 3 Comments

तरही गजल-सतविन्द्र राणा

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भले ही' मैं अंजाना हूँ

सारी बात समझता हूँ



कड़वा चाहे लगता हूँ

सच की रो में बहता हूँ।



सुख दुख के हर पहलू को

चुपके-चुपके सहता हूँ।



बोल रहा उनके आगे

जिनको सुनता आया हूँ।



काम बहुत करना मुझको

लेकिन मैं अलसाया हूँ।



जख्म नहीं हूँ दे सकता

जब मरहम के जैसा हूँ



देख भुलाकर रंजो गम

गुल बनकर फिर महका हूँ।



जिससे धारा फ़ूट पड़े

टूटा वही किनारा हूँ।



आँखों में क्या ढूँढ… Continue

Added by सतविन्द्र कुमार राणा on February 5, 2017 at 9:00pm — 9 Comments

ग़ज़ल- नवजीवन की आशा हूँ

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नवजीवन की आशा हूँ।
दीप शिखा सा जलता हूँ।।

रक्त स्वेद सम्मिश्रण से।
लक्ष्य सुहाने गढ़ता हूँ।।

जीवन के दुर्गम पथ पर।
अनथक चलता रहता हूँ।।

प्रभु पर रख विश्वास अटल।
बाधाओं से लड़ता हूँ।।

घोर तिमिर के मस्तक पर।
अरुणोदय की आभा हूँ।।

भावों का सम्प्रेषण मैं।
शंखनाद हूँ कविता हूँ।।

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

Added by डॉ पवन मिश्र on February 5, 2017 at 6:58pm — 12 Comments

दोहे-रामबली गुप्ता

कृपा करो जगदीश हे! करो जगत कल्याण।

प्रेम दया सद्भाव दो, हो शुभ तन-मन-प्राण।।1।।



हो कण-कण में व्याप्त तुम, हे! जग पालनहार।

पद-पावन में तीर्थ सब, है सुरसरि की धार।।2।।



सदा तुम्हारी भक्ति में, रहूँ समर्पित नाथ!

ऐसा दो वरदान अब, रखो शीश पर हाथ।।3।।



प्रभो! सकल ब्रह्माण्ड के, एक तुम्ही हो नाथ।

सदा कामना है यही, रहे कृपा-कर माथ।।4।।



सूर्य-चंद्र-तारक सभी, जीव-जन्तु इत्यादि।

सबका तुम से अंत हरि! है तुमसे ही… Continue

Added by रामबली गुप्ता on February 5, 2017 at 6:00pm — 23 Comments

विवश वेदना

बियाबान-सी रात, मद्धम है चाँदनी

एक अधूरे रिश्ते के आकुलित अनुभव

बिखरे-बिखरे-से... कोने-कोने में

बेचैन इस दर्द भरे अन्धेरे में

चेहरे पर भय की रेखाएँ



माना कि बीच हमारे अब कोई दीवार

बहुत ऊँची बहुत ऊँची

ढरते-भुरते विश्वास के आईने पर

घावों की छायाओं के धब्बेे

भी गहरे अब बहुत गहरे



फिर भी कुछ जीवित है



समय की टूटी सीढ़ी चढते

क्षण-भर को भी भाव-विभोर हो

आ सको तो आओ

पाओ मुझमें…

Continue

Added by vijay nikore on February 5, 2017 at 5:07pm — 15 Comments

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ ही-पंकज मिश्र

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ ही



मासूम बच्चों की किलकारियों में

खोया हुनर अपना हम आज ढूंढें



चलते ठुमक कर के नन्हें पगों सं'ग

हम भी तो चलने का कुछ सीख लें ढं'ग



जीने का अंदाज़ पाने दे यूँ ही

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ ही।।



गिल्लू फुदकती, चहकते परिंदे

हम सीख लें मस्त, रहना तो इनसे



कल कल का संगीत बहती नदी से

कोयल की कू कू, से स्वर सीखने दे



हो के मगन मुस्कुराने दे यूँ ही

ए ज़िन्दगी गुनगुनाने दे यूँ… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 5, 2017 at 4:15pm — 4 Comments

कथा लिखो (लघुकथा)

महाबुद्ध से शिष्य ने पूछा, “भगवन! समाज में असत्य का रोग फैलता ही जा रहा है। अब तो इसने बच्चों को भी अपनी गिरफ्त में लेना शुरू कर दिया है। आप सत्य की दवा से इसे ठीक क्यों नहीं कर देते?”

महाबुद्ध ने शिष्य को एक गोली दी और कहा, “शीघ्र एवं सम्पूर्ण असर के लिये इसे चबा-चबाकर खाओ, महाबुद्धि।”

महाबुद्धि ने गोली अपने मुँह में रखी और चबाने लगा। कुछ ही क्षण बाद उसे जोर की उबकाई आई और वो उल्टी करने लगा। गोली के साथ साथ उसका खाया पिया भी बाहर आ गया। वो बोला, “प्रभो ये गोली…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on February 5, 2017 at 10:30am — 16 Comments


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ग़ज़ल -मेरा ग़रीब खाना है ऊँचे भवन के बाद - ( गिरिराज )

( अज़ीम शायर मुहतरम जनाब कैफ़ी आज़मी साहब की ज़मीन पर एक प्रयास )

221  2121   1221    212

मुझको कहाँ अज़ीज़ है कुछ भी चमन के बाद

क्या मांगता ख़ुदा से मैं हुब्ब-ए-वतन के बाद



तहज़ीब को जो देते हैं गंग-ओ-जमुन का नाम

ये उनसे जाके पूछिये , गंग-ओ-जमन के बाद ?



वो लम्स-ए-गुल हो, या हो कोई और शय मगर

दिल को भला लगे भी क्या तेरी छुवन के बाद



वो चिल्मनों की ओट से देखा किये असर

बातों के तीर छोड़ के हर इक चुभन के…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on February 5, 2017 at 7:46am — 24 Comments

ग़ज़ल( किया है अपनों ने जब किनारा ) --------

ग़ज़ल

--------

(मफ़ाइलातुन--मफ़ाइलातुन)

किया है अपनों ने जब किनारा |

दिया है अग्यार ने सहारा |

करम हुआ दोस्तों का जब से

वफ़ा का गर्दिश में है सितारा |

अगर गिला है तो सिर्फ़ है यह

न दे सके साथ वो हमारा |

हुआ है दीदार जब से उनका

लगे न मंज़र कोई भी प्यारा |

हसीन रुख़ में ज़रूर कुछ है

जो देखे हो जाए वो तुम्हारा |

हो और मज़बूत अपनी यारी

कहाँ ज़माने को है गवारा…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 4, 2017 at 9:42pm — 6 Comments

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