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ग़ज़ल -मेरा ग़रीब खाना है ऊँचे भवन के बाद - ( गिरिराज )

( अज़ीम शायर मुहतरम जनाब कैफ़ी आज़मी साहब की ज़मीन पर एक प्रयास )

221  2121   1221    212

मुझको कहाँ अज़ीज़ है कुछ भी चमन के बाद

क्या मांगता ख़ुदा से मैं हुब्ब-ए-वतन के बाद



तहज़ीब को जो देते हैं गंग-ओ-जमुन का नाम

ये उनसे जाके पूछिये , गंग-ओ-जमन के बाद ?



वो लम्स-ए-गुल हो, या हो कोई और शय मगर

दिल को भला लगे भी क्या तेरी छुवन के बाद



वो चिल्मनों की ओट से देखा किये असर

बातों के तीर छोड़ के हर इक चुभन के…

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Added by गिरिराज भंडारी on February 5, 2017 at 7:46am — 24 Comments

ग़ज़ल( किया है अपनों ने जब किनारा ) --------

ग़ज़ल

--------

(मफ़ाइलातुन--मफ़ाइलातुन)

किया है अपनों ने जब किनारा |

दिया है अग्यार ने सहारा |

करम हुआ दोस्तों का जब से

वफ़ा का गर्दिश में है सितारा |

अगर गिला है तो सिर्फ़ है यह

न दे सके साथ वो हमारा |

हुआ है दीदार जब से उनका

लगे न मंज़र कोई भी प्यारा |

हसीन रुख़ में ज़रूर कुछ है

जो देखे हो जाए वो तुम्हारा |

हो और मज़बूत अपनी यारी

कहाँ ज़माने को है गवारा…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on February 4, 2017 at 9:42pm — 6 Comments

आज के पुजारी बन बैठे भगवान ।

दुनिया में है अपना देश महान

आज के पुजारी बन बैठे भगवान ।

करुणा, दया,और धर्म से वंचित

मानवता को करते ये लज्जित

प्रभु के ऊपर खुद होते सुशोभित

कहते जग में हम सबसे विद्वान  

आज के पुजारी बन बैठे भगवान ॥

शील समाधि प्रज्ञा सबसे वंचित

सभी को पता है इनकी हकीकत

अज्ञानता से चलती है सियासत

वेद ज्ञान से विमुख ये पुरोहित

देश में चहुं दिश फैला अज्ञान

आज के पुजारी बन बैठे भगवान ॥

देव दासी प्रथा खूब थी…

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Added by Ram Ashery on February 4, 2017 at 5:30pm — 5 Comments

सीढ़ियाँ – लघुकथा -

   सीढ़ियाँ – लघुकथा -

 "सर, यह क्या सुन रही हूँ।आप तो डाइरेक्टर बनने वाले थे।मगर आप को जी एम से डिमोट कर के मैनेजर बना दिया"।

"यह सब तुम्हारी वज़ह से हुआ है लीला", वर्मा जी अपनी सैक्रेटरी पर झल्ला पड़े।

"सर, मैंने क्या किया। मैं तो सदैव वही करती रही  हूं, जो आप कहते रहे हो"।

"पर इस बार नहीं किया ना,मैंने तुम्हें शनिवार को सी एम डी के बंगले पर जाने को कहा था"।

"सर, मैंने सुना था कि नया सी एम डी बहुत खड़ूस है।मैं डर गयी थी।पर आपने मेरी जगह दूसरी लड़की भेज दी थी…

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Added by TEJ VEER SINGH on February 4, 2017 at 1:44pm — 15 Comments

देश ये महान है--घनाक्षरी// अलका ललित

घनाक्षरी में आज का प्रयास

***

चेहरा चमक रहा

बटुआ खनक रहा

सबका है मन काला

देश ये महान है

.

योजनाएं बड़ी बड़ी

बनाते है हर दिन

कैसे करना घोटाला

देश ये महान है

.

हर योजना में यहॉ

देश के खजाने पर

हुआ गड़बड़ झाला 

देश ये महान है

.

बेटियां सुबक रही

डर के…

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Added by अलका 'कृष्णांशी' on February 4, 2017 at 11:00am — 9 Comments

गजल(तीर चले चुन चुन के कस कस)

22222222

तीर चले चुन-चुन के कस-कस

मन तो भूला जाता सरबस।1



बूढ़ा बरगद बौराया है

अँगिया- गमछा करते सरकस।2



छौंरा- छौंरी छुछुआये हैं

पुरवा घर-घर करती बतरस।3



बढ़नी लेकर काकी दौड़ी

सच तो सहना पड़ता बरबस।4



फागुन की फुनगी अँखुआयी

चौरा-चौरा होता चौकस।5



आतुर होकर आज हवाएँ

ढूँढ़ रहीं निज मरकज,बेकस।6



मन का मीत कहीं मिल जाये

मनुआ दौड़ चला जस का तस।7



रंग चढ़ा जिसको,वह उछले

बाकी कहते,रहने दो…

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Added by Manan Kumar singh on February 4, 2017 at 8:30am — 22 Comments

भगवान तू है कहां (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

"मैं धर्म, धार्मिक ग्रंथों और प्रवचनों की सीढ़ियों पर चढ़कर सच्चे सुख की तलाश करता हुआ ईश्वर को तलाश रहा था!" अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए एक आदमी ने अपने साथियों से कहा।



दूसरे ने अपने अनुभव सुनाते हुए कहा- "मैं विज्ञान, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीकी यंत्र-तंत्र की सीढ़ियों पर चढ़कर सच्चा सुख तलाशते हुए भगवान को चुनौती देकर विज्ञान को ही भगवान समझने लगा!"



तीसरा अपने दोनों साथियों से बोला- "मुझे जब जैसा मौक़ा मिला उसी अनुसार सीढ़ियों को चुनता रहा धन को ही भगवान समझ कर। कभी… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on February 3, 2017 at 11:30pm — 8 Comments

मौसम-ए-हिज्र ने इक फूल खिलाया है अभी (ग़ज़ल)

2122 1122 1122 22



सिवा उसके कोई मंज़र नहीं दिखता है अभी

गोया आँखों में वही नक़्श ही ठहरा है अभी



मौसम-ए-हिज्र ने इक फूल खिलाया है अभी।

बाद मुद्दत के उसे ख़्वाब में देखा है अभी



शब गुज़र भी चुकी महताब भी घर अपने चला

पर मेरी शम्अ-ए-उम्मीद को जलना है अभी



जानता हूँ कि कोई लहर मिटा ही देगी

आदतन नाम वो फिर रेत पे लिक्खा है अभी



मैं कलंदर हूँ, मुझे भूल से मुफ़लिस न समझ

कि मेरी जेब में ईमान का सिक्का है अभी



चाहते भी हैं… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on February 3, 2017 at 8:56pm — 5 Comments

ग़ज़ल...गम जहाँ के पहलू में दो चार आ कर बैठ गए

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

2122 2122 2122 212

गम जहाँ के पहलु में दो चार आ कर रुक गये

हम उसी दोराहे पे तब सकपका कर रुक गये



रहगुज़र तपती हुई होती बसर भी कब तलक

दर्द था इफरात में वो छटपटा कर रुक गये



ये अदा भी खूब है उस संगदिल महबूब की

बिन बताये दिल में आये मुस्कुरा कर रुक गये



ज़ुस्तज़ू दीदार की होती मुकम्मल किस तरह

वो अदा से ओढ़ कर घूँघट लजा कर रुक गये



है फ़ज़ाओं में खबर गुजरेंगे वो इस राह से

मोड़ पर हम सर झुका आँखें… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on February 3, 2017 at 8:30pm — 26 Comments

स्नेह-लहरी

हर पर्व से पहले आते थे तुम

हँसती-हँसती, मैं रंगोली सजा देती ...

नाउमीदी में भी कोई उमीद हो मानो

मेरी अकुलाती इच्छाएँ तुम्हारी राह तकती थीं

श्रद्धा के द्वार पर अभी भी मेरे प्रिय परिजन

सूर्य की किरणें ठहर जाती हैं

चाँद जहाँ भी हो, पर्व की रातों कोई आस लिए

आकर छत पर रुक जाता है

तन्हा मैं, सोच-सोच में

ढूँढती हूँ बाँह-हाथ तुम्हारे

स्पर्श से पूर्व विलीन हो जाते हैं स्पर्श

उदास साँवले दिन की…

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Added by vijay nikore on February 3, 2017 at 11:50am — 15 Comments

हाइकू (आरिफ मोहम्मद)

1.

सौंधी महक
मिट्टी पड़ी गिरवी
विदेशी चाल ।

2.

बाज़ार भाव
रोज़ की घट-बढ़
है सोची चाल ।
3.

होली दस्तक
अब रंगों में हिंसा
फैला तनाव ।

4.

नंगा बदन
फैशन का कमाल
धन की लूट ।

5.

कहाँ को जाएँ
लूटी हुई है शांति
दिशा बेहाल ।

.
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Mohammed Arif on February 3, 2017 at 8:30am — 10 Comments

आया मधुमास (अति बरवै पर आधारित गीत)

सजनी ने साजन को, खींच लिया पास |

अमराई फूल गई, आया मधुमास ||

  

धूप खिली निखरी-सी, आयी मुस्कान |

बागों में छेड़ दिया, भँवरों ने तान ||

कलियों के मन जागी, खिलने की आस......... 

खिड़की से झाँक रही, जिद्दी है धूप |

रंग बिना लाल हुआ, गोरी का रूप  ||

सखियों की सुधियों में, कौंधा परिहास........... 

 

डाली है अल्हड पर , फिरभी है भान |

बौराए महुए के , खींच रही कान ||

महक रहे वन-कानन, महका…

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Added by Ashok Kumar Raktale on February 2, 2017 at 11:00pm — 21 Comments

जंबूरा (लघुकथा)राहिला

"पकड़ो,पकड़ो घेर लो इसे ,कस कर बांध दो भागने ना पाए"।अचानक हुए इस हमले ने उसकी सिट्टी पिट्टी गुम कर दी ।

"आज यहाँ,कहाँ रास्ता भूल गया यह!"

"हाँ दादा!सालों बाद दिखाई पड़ा ।जरूर कोई गरज पड़ी होगी वरना यह और यहाँ...।"

"अब हाथ आ ही गया है तो निकाल लो कसर ,डालो गले में पट्टा और नचवाओ इसे! इसने भी कोई कसर नहीं छोड़ी ..खूब इशारों पर नचवाया है हमें।आज यह करेगा हमारा मनोरंजन ।"उन्हीं में से एक दांत पीसता हुआ बोला।और फिर शुरू हुआ तमाशा।खबर पाकर दूर ,दूर से लोग इकट्ठा होने लगे,थोड़ी ही देर में… Continue

Added by Rahila on February 2, 2017 at 10:16pm — 10 Comments

गजल/// मगर आप गंगा नहाने लगे

122 122 122 12

     

कि जब आप उनके कहाने लगे

मुझे सारे वादे बहाने लगे

 

किया चाक दिल था हमारा अभी            

महल ख्वाब का क्यूँ ढहाने लगे

 

यकीं था मुझ्र भूल जाओगे अब   

गमे याद तुम तो तहाने लगे

 

कहा था अगम एक सागर हूँ मैं

गजब है कि सागर थहाने लगे

 

चिता ठीक से जल न पाई अभी

मगर आप गंगा नहाने लगे

(मौलिक/अप्रकाशित)

Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on February 2, 2017 at 8:00pm — 8 Comments

ग़ज़ल -- " दिल को क्या हो गया ख़ुदा जाने " ( दिनेश कुमार )

2122--1212--22



संगे मरमर को आइना जाने

ये ज़माना किसी को क्या जाने



अपनी आँखों में ख़्वाब साहिल का

मौजे तूफ़ाँ की नाख़ुदा जाने



मुझ से बस मयकशी की बात करो

पारसाई की पारसा जाने



पल में तोला है पल में माशा है

कौन इस हुस्न की अदा जाने



चुप रहा जो मेरी सदाओं पर

मेरी ख़ामोशियाँ वो क्या जाने



जब हवाओं की सरपरस्ती थी

फिर दिया क्यों बुझा... ख़ुदा जाने



ज़िन्दगी को ग़ज़ल कहेगा वही

रंजो-ग़म को जो… Continue

Added by दिनेश कुमार on February 2, 2017 at 4:13pm — 4 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
मन शायद अपना अस्तित्व टटोल रहा है // डॉ० प्राची

फिर बिसरी यादों के पन्ने खोल रहा है,

मन शायद अपना अस्तित्व टटोल रहा है।



गुमसुम गुपचुप ठिठकी सी खिड़की ने अपनी

छोड़ी सकुचाहट भर ली जी भर अँगड़ाई,

रेशम पर बिखरे फूलों ने सिलवट-सिलवट

आहिस्ता से रीत मोहब्बत की दोहराई,



सुध-बुध बिसराए मुस्कानें ओढ़े तन पर

करवट-करवट क्यों मदमाता डोल रहा है?

मन शायद...



रुकी-रुकी पलकों पर दी सपनों ने दस्तक

रुँधे कण्ठ ने आस गीत गाए फिर गुनगुन,

फिर बाँधे मन्नत के धागे मंदिर-मंदिर

कोमल एहसासों के… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on February 2, 2017 at 1:13pm — 10 Comments

बचा है खोट से जब तक - (ग़ज़ल) - लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

1222    1222    1222    1222



जुबाँ पर वो  नहीं चढ़ता मनन उसका नहीं होता

जो बाँटा खौफ करता हो भजन उसका नहीं होता।1।



जो करता बात जयचंदी  वतन उसका नहीं होता

जिसे हो प्यार पतझड़ से चमन उसका नहीं होता।2।



जिसे लालच हो कुर्सी का जो करता दोगली बातें

वतन हित में कभी लोगों कथन उसका नहीं होता।3।



गगन उसका हुआ करता जो दे परवाज का साहस

जो काटे पंख  औरों  के  गगन उसका नहीं होता।4।



समर्पण  माँगता है प्यार  निश्छल  भाव वाला बस

नजर हो सिर्फ दौलत…

Continue

Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 2, 2017 at 11:21am — 6 Comments

मैं ज़िन्दगी का आशिक़, भावों से पिला साक़ी- पंकज द्वारा गजल

221 1222 221 1222



ये जाम अलग रख दे, आँखों से पिला साक़ी

सदियों से अधूरी है, होठों से पिला साक़ी



अंगूर की मदिरा तो, करती है असर कुछ पल

ता उम्र नशा होए, साँसों से पिला साक़ी



गिर जाते जिसे पीकर, वो जाम नहीं चाहूँ

आऊँ मैं नज़र खुद को आँखों से पिला साक़ी



मैं तोड़ भी लाऊँगा कह दे तो सितारे भी

तू इश्क़ को ग़र अपने ख्वाबों से पिला साक़ी



शीशे के ये पैमाने बेजान नहीं भाते

मैं ज़िन्दगी का आशिक़, भावों से पिला साक़ी



मौलिक… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 2, 2017 at 9:30am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
गज़ल - किसी हाथ में अब तक खंज़र ज़िन्दा है - ( गिरिराज भंडारी )

22   22   22   22   22   2 ( बहरे मीर )

किसी हाथ में अब तक खंज़र ज़िन्दा है

***********************************

सबके अंदर एक सिकंदर ज़िन्दा है

इसीलिये हर ओर बवंडर ज़िन्दा है  

 

सब शर्मिन्दा होंगे, जब ये जानेंगे

अभी जानवर सबके अंदर ज़िन्दा है

 

मरा मरा सा बगुला है बे होशी में

लेकिन अभी दिमाग़ी बन्दर ज़िन्दा है

 

फूलों वाला हाथ दिखा असमंजस में

किसी हाथ में अब तक खंज़र ज़िन्दा है

 

परख नली की बातों…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on February 2, 2017 at 8:30am — 15 Comments

ज़िक्र उनका, दुश्मनों की भीड़ बढ़ती ही रही---- पंकज द्वारा गजल

2122 2122 2122 212
ज़िक्र उनका, दुश्मनों की भीड़ बढ़ती ही रही
और मीरा पर नशे सी प्रीत चढ़ती ही रही

फैसला दुनिया का कुछ औ इश्क़ को मंजूर कुछ
कोई दीवानी मुरत अश्कों से गढ़ती ही रही

रास राधा संग कान्हा का हुआ ब्रज भूमि में
एक पगली मूर्ति की मुस्कान पढ़ती ही रही

तान मुरली पर मचल कर नृत्य करतीं गोपियाँ
इक दिवानी प्रिय को अपने हिय में मढ़ती ही रही


मौलिक अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 1, 2017 at 12:25pm — 6 Comments

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