For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts

यथार्थ या सत्यार्थ (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी

" अच्छा लगता है कि तुम मेरी ज़िन्दगी के इस मुकाम पर भी हमेशा की तरह अपनों की तरह समझाईश देती हो! " उसने सिगरेट का धुआँ मुंह से छोड़ते हुए अपनी इकलौती ख़ास सहेली से कहा।



"समझाईश! कभी असर हुआ मेरी समझाईश का तुम पर? अरे, माँ-बाप के अरमानों का नहीं,तो अपने असली वजूद का अब तो कुछ ख़्याल करो!"



सहेली की बात पर मुस्कराते हुए उसने कहा- "तूने कौन से तीर मार लिए? मैंने तो ऐसी कई सच्चाइयों को नज़दीक़ से जान लिया है, जो तुम्हारी जैसी कई बयान तक नहीं कर पातीं! खुश हूँ मैं अपनी इस… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on January 14, 2017 at 4:31pm — 8 Comments

समय की नजाकत

 कल हमारे समाज का सबसे श्रेष्ठ तबका ,

जो साक्षर कहलाते, आज निरक्षर हो गए ।

कूप मंडूप को ही जीवन का लक्ष्य समझा

आविष्कार कर न सके, वे गुलाम हो गए ।

समय की नजाकत को जिसने नहीं समझा,

ज्ञान का डंका बजाते, वे आज पीछे रह गए ।

इस बदलते जमाने में अपने को अलग रखा

विज्ञान के इस युग में वे अज्ञानी हो गए ।

खुद को सर्वश्रेष्ठ और दूसरों को मूर्ख समझा

वे दुनिया की इस दौड़ में सब पीछे रह गए ।

साथियों समय बदल रहा, नजाकत को समझो,

तुम…

Continue

Added by Ram Ashery on January 14, 2017 at 12:00pm — 4 Comments

गजल(तिरछी हो जातीं नजरें हैं)

22 22 22 22
तिरछी हो जाती नजरें हैं
अश्कों की कटती फसलें हैं।1

धड़कन माफिक साँसें चलतीं
प्यास बनी ये दो पलकें हैं।2

लहराती बदली-बाला तू,
उड़ जाती, फिर सपने टें हैं।3

खूब जमाये रंग सभी ने
अल्फाजी उनकी फजलें हैं।4

लोग लिये हैं संग विधाएँ
अपने पास महज गजलें हैं।5
.

मौलिक व अप्रकाशित@

Added by Manan Kumar singh on January 14, 2017 at 10:30am — 13 Comments

प्रभात बेला

अरुणोदय के अभिनन्दन में

खगकुल गाते गीत सुहाने |

शैल शिखर हो रहे सुशोभित

चुनरी ओढ़ी लाल, धरा ने ||



हुआ तेज जब अरुणोदय का

निशा सशंकित लगी भागने

हँसता पूरब देख चंद्र को

पल्लव सभी लगे मुस्काने ||



पंकज आतुर खिलने को अब

देख कुमुदिनी तब मुरझाई |

अलिदल दौड़ पड़े फूलो पर

कीट पंख में हलचल आई ||



मलय समीर की मन्द बयार

मदहोश कर रही अधरों को |

रवि की नव किरणों को पाकर,

शीतलता मिलती नजरो को ||



स्वागत करती… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 14, 2017 at 7:42am — 21 Comments

गीत,,,,,,

२१२२  २१२२  २१२२  २१२२

**************************



गुनगुनाकर देखिएगा आप भी यह गीत मेरा ।।

दोपहर की धूप में आभास होगा नव सवेरा ।।

गुनगुनाकर देखिएगा,,,,,,,



तप्त सूरज शीश पर जब अग्नि वर्षा कर रहा हो,

ऊष्णता के हृदविदारक तीर तरकस भर रहा हो,

तब प्रभाती गीत की तुम छाँव में करना बसेरा ।।(1)

दोपहर की धूप में,,,,,,,,,,,,,

गुनगुनाकर देखिएगा,,,,,,,



कोकिला के कण्ठ से माँ भारती का गान सुनना,

व्योम में प्रतिध्वनित होती सप्त सरगम…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 13, 2017 at 7:30pm — 7 Comments

कुछ हाइकू

शामिल हुआ

मौसम की दौड़ में  

नव वर्ष भी।

 

चंचल नदी

उछली कहीं गिरी 

बहती चली।

 

जीवन सांझ

यादों में डूबा मन

खुला झरोखा।

मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Neelam Upadhyaya on January 13, 2017 at 1:00pm — 11 Comments

हकीकत हूँ परेशां हूँ (मुसल्सल ग़ज़ल)

हकीकत हूँ परेशां हूँ कभी हारा कहाँ हूँ मैं।

हवा हूँ तरबतर खुश्बू चमन तेरे रवाँ हूँ मैं। 1

--------

खिले जो भी गुले गुलजार हर इक ओर देखो तो,

हसीं मौसम चटकता रंग सब का बागवां हूँ मैं। 2

----

अजानो में भजन में एक ही अक्स है मेरा,

दुआ हूँ मैं दया हूँ मैं सभी से आशना हूँ मैं। 3

----

गमों की बात ही क्या हाथ जो दो हाथ में मेरे,

चले आओ सितारों में चमकता कहकशां हूँ मैं। 4

----

अदालत से बचोगे तुम जहां भर के निगाहों से,

छुपाकर जो किये हो… Continue

Added by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on January 12, 2017 at 10:04pm — 9 Comments

स्मृति के आँगन में ...

स्मृति के आँगन में ...

तुम सवालों को

सवाल क्योँ नहीं रहने देती

अपनी मौनता से

तुम नैन व्योम में बसी

अतृप्त तृष्णा से

अपने कपोलों पर

क्योँ गीले काजल से श्रृंगार

कर अनुत्तरित प्रश्नों का

उत्तर चाहती हो

क्योँ सुरभित मधु पलों को

अपने गीले आँचल में लपेट कर

स्मृति अंकुरों को

प्रस्फुटित होने का अवसर

देना चाहती हो

क्योँ मृदु चांदनी में

उदास निशा से

टूटे तारे से माँगी इच्छा के…

Continue

Added by Sushil Sarna on January 12, 2017 at 1:00pm — 10 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -कि सरकार भी मोतबर आपकी है-- ( गिरिराज भंडारी )

122  122    12 2    122

जिधर भी मैं जाऊँ डगर आपकी है

हवा मे फज़ा में ख़बर आपकी है



महज़ रात थी आपके हक़ में लेकिन

सुना है कि अब हर पहर आपकी है

 

हरिक पुत्र को मुफ़्त मिलती है ममता

तो, ममता भी अब उम्र भर आपकी है

 

रपट कौन लिक्खे सभी आपके हैं

कि सरकार भी मोतबर आपकी है

 

ज़ियारत करें ना करें आप लेकिन

सियासत पे टेढ़ी नज़र आपकी है

 

नज़ीर आपकी अब मैं दूँ भी तो कैसे

हरी-सावनी सी नज़र आपकी…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 12, 2017 at 10:30am — 13 Comments

ग़ज़ल,,

वज़्न : 1222 1222 1222 1222

मिलेंगी कुर्सियाँ लेकिन सियासी फ़न ज़रूरी है ।।

जुटाना है अगर बहुमत लचीलापन ज़रूरी है ।।(1)



कई पतझड़ यहाँ आके गये अफ़सोस मत करिये,

बहारों के लिए हर साल में सावन ज़रूरी है ।।(2)



हवाओं नें कसम खा ली जले दीपक बुझाने की,

उजाला ग़र बचाना है खुला दामन ज़रूरी है ।।(3)



वफ़ा की बात करते हो मियाँ इस दौर में तुम भी,

जहाँ शतरंज की बाज़ी बिछी हो धन ज़रूरी है ।।(4)



अगर कोई कहे तुमसे बताओ प्यार के मानी,…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 11, 2017 at 11:30pm — 12 Comments

दफ्तर को अपने घर मे भी सहचर बना दिया

221 2121 1221 212 पर एक प्रयास

दफ्तर को अपने घर मे भी सहचर बना दिया
वो वक्त अपना और भी बद्तर बना दिया

जब तक रहा वो गांव मे संजीदा हीं रहा
शहरों ने उसको तोड़के पत्थर बना दिया

चैनो अमन की बात हीं करता था जो, उसे
दंगों की फैली आग ने कट्टर बना दिया

जबसे चुनावी रैलियाँ होने लगी यहां
सुंदर सलोना गांव थियेटर बना दिया

बिखरी हुई पड़ी थी जो भी ख्वाहिशें मेरी
फिलहाल उनको जोड़ के गट्ठर बना दिया
मौलिक तथा अप्रकाशित

Added by Abhishek kumar singh on January 11, 2017 at 10:12pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शांत है सोया हुआ जल --(गीत)-- मिथिलेश वामनकर

उफ़! करो कोई न हलचल,

शांत सोया है यहाँ जल ।

 

नींद गहरी, स्वप्न बिखरे आ रहे जिसमें निरंतर।

लुप्त सी है चेतना,  दोनों दृगों पर है पलस्तर।

वेदना, संत्रास क्या हैं? कब रही परिचित प्रजा यह?

क्या विधानों में, न चिंता, बस समझते हैं ध्वजा यह।

कौन, क्या, कैसे करे?  जब,

हो स्वयं निरुपाय-कौशल।

 

पीर सहना आदतन, आनंद लेते हैं उसी में।

विष भरा जिस पात्र में मकरंद लेते हैं उसी में।

सूर्य के उगने का रूपक, क्या तनिक भी ज्ञात…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on January 11, 2017 at 3:00pm — 27 Comments

जूते की जुबानी (हास्य व्यंग्य)

मैं बेबस लाचार पड़ा, अपनी बात बताता हूँ |

मैं जूता सुन यार तुझे, किस्से आज सुनाता हूँ ||



शोभा नही हमारे बिन, राजा या रँक फकीर की |

हम चरणों के दास हुए, माया यहीं तकदीर की।



हमें पहन इंसान यहाँ, काँटों पर भी चलते हैं |

राह भले हो पथरीली, कदम नहीं ये रुकते हैं ||



इंसाँ तुच्छ समझता है, गिनता हमको रद्दी भर |

भूल गया इतिहास सभी, हम बैठे थे गद्दी पर ||



चौदह वर्षों तक हम भी, अवध देश की शान रहे |

शीश झुकाते श्रद्धा से, देते सब सम्मान… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 11, 2017 at 2:30pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सारे जहाँ को आप तो नादाँ समझते हैं

221 2121 1221 212

सारे जहाँ को आप तो नादाँ समझते हैं

हद ये है अपने आप को इंसाँ समझते हैं

 

अह्ल ए अदब जो चमके है औरों के ताब से

खुद को मगर वो लाल ए बदख़्शाँ समझते हैं

 

आमाल में हमारे ही कमियाँ न हों जनाब

शैतान को भी लोग मुसलमाँ समझते हैं

 

बातों से जब न बात बनी, सर झुका लिया

धोखे में हैं जो उसको पशेमाँ समझते हैं

 

फिरती है वो हलक में लिए जान, और आप

कुत्तों के बीच जीने को आसाँ समझते…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 11, 2017 at 11:40am — 12 Comments

ये दुनिया है भूलभुलैया (नवगीत)

ये दुनिया है भूलभुलैया

रची भेड़ियों ने

भेड़ों की खातिर

 

पढ़े लिखे चालाक भेड़िये

गाइड बने हुए हैं इसके

ओढ़ भेड़ की खाल

जिन भेड़ों की स्मृति अच्छी है

उन सबको बागी घोषित कर

रंग दिया है लाल

 

फिर भी कोई राह न पाये

इस डर के मारे

छोड़ रखे मुखबिर

 

भेड़ समझती अपने तन पर

खून पसीने से खेती कर

उगा रही जो ऊन

जब तक राह नहीं मिल जाती

उसे बेचकर अपना चारा

लायेगी दो…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 10, 2017 at 8:13pm — 6 Comments

जजमेंट- लघुकथा

"सर, मिश्राजी का फोन आया था, थोड़ी देर में किसी के साथ आ रहे हैं", जैसे ही वह ऑफिस में आया, सेक्रेटरी ने आकर बताया|

"ठीक है, अंदर भेजने से पहले एक बार मुझसे पूछ लेना", उसने कहा लेकिन उसके चेहरे पर थोड़ी तिक्तता फ़ैल गयी| मिश्राजी उसके अध्यापक थे, जब वह हाई स्कूल में था और पिछले महीने ही वह उनसे मिला था| इस नए स्थान पर पोस्टिंग के समय तो उसे उम्मीद भी नहीं थी कि इस तरह से कोई पुराना परिचित मिल जायेगा, लेकिन मिश्राजी को उसने देखते ही पहचान लिया था| दो बार पहले भी वह आ चुके थे यहाँ लेकिन कभी…

Continue

Added by विनय कुमार on January 10, 2017 at 7:58pm — 16 Comments

ग़ज़ल (हिन्दी हमारी जान है)

बहर 2212 2212 की रचना।



हिन्दी हमारी जान है,

ये देश की पहचान है।



है मात जिसकी संस्कृत,

मा शारदा का दान है।



साखी कबीरा की यही,

केशव की न्यारी शान है।



तुलसी की रग रग में बसी,

रसखान की ये तान है।



ये सूर के वात्सल्य में,

मीरा का इसमें गान है।



सब छंद, उपमा और रस

की ये हमारी खान है।



उपयोग में लायें इसे,

अमृत का ये तो पान है।



ये मातृभाषा विश्व में,

सच्चा हमारा मान… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on January 10, 2017 at 6:24pm — 7 Comments

अधूरी प्रीत से ....

अधूरी प्रीत से ....

लब
खामोश थे
पलकें भी
बन्द थीं
कहा
मैंने भी
कुछ न था
कहा
तुमने भी
कुछ न था
फिर भी
इक
अनकहा
नन्हा सा लम्हा
आँखों की हदें तोड़
देर तक
मेरी हथेली पे बैठा
मुझे
मिलाता रहा
मेरे अतीत से
अधूरी तृषा में लिपटी
अधूरी प्रीत से

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 10, 2017 at 2:22pm — 4 Comments

" कैसे कहूँ ...."- कविता /अर्पणा शर्मा

कैसे कहूँ मन की व्यथा,

सारे दुख-सुख का,

सब लेखा-जोखा,

किसने कितनी दी पीड़ा,

किस-किसने कब,

दिया मुझे धोखा,

वो गठरी पीछे छोड़ ,

बस बढ़ जाती हूँ,

निरंतर आगे की ओर,

समयधारा में धुल जाते हैं,

बहुत गहन घाव भी,

सप्रयास बिसरा देती हूँ ,

पीड़ा की सघन छाँव भी,

मुँह कर खड़ी होती हूँ,

झिर्री से आती धूप की ओर,

लेती हूँ उसका ताप भी,

भरती हूँ उसकी आब भी,

अपनी देह और अंतस में,

आशा की दरारों से,

वहाँ बिखर जाने देती हूँ… Continue

Added by Arpana Sharma on January 10, 2017 at 2:03pm — 9 Comments

क्षणिकाएं (171 ) - डॉo विजय शंकर

प्यार भी कितना
अजीब होता है ,
वहां भी होता है
जहां नहीं होता है ,
तब भी होता है ,
जब नहीं होता है।......1.

नाराज़गी की
सौ वजहें होतीं हैं ,
एक प्यार है
जो बिला वजह होता है।.....2.

इस बेवफ़ाई की
कोई तो वजह होगी ,
हमारी ही वफ़ा में
कुछ कमी रह गई होगी। ......3.

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 10, 2017 at 6:16am — 12 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
yesterday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
yesterday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
yesterday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Friday
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Friday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service