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दफ्तर को अपने घर मे भी सहचर बना दिया

221 2121 1221 212 पर एक प्रयास

दफ्तर को अपने घर मे भी सहचर बना दिया
वो वक्त अपना और भी बद्तर बना दिया

जब तक रहा वो गांव मे संजीदा हीं रहा
शहरों ने उसको तोड़के पत्थर बना दिया

चैनो अमन की बात हीं करता था जो, उसे
दंगों की फैली आग ने कट्टर बना दिया

जबसे चुनावी रैलियाँ होने लगी यहां
सुंदर सलोना गांव थियेटर बना दिया

बिखरी हुई पड़ी थी जो भी ख्वाहिशें मेरी
फिलहाल उनको जोड़ के गट्ठर बना दिया
मौलिक तथा अप्रकाशित

Views: 775

Comment

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Comment by Abhishek kumar singh on January 15, 2017 at 4:38pm
हार्दिक आभार आद गिरिराज भंडारी जी, स्नेह बनाएं रखें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 15, 2017 at 4:28pm

आ. अभिषेक भाई , अच्छी ग़ज़ल हुई है , हार्दिक बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by Abhishek kumar singh on January 12, 2017 at 9:21pm
हार्दिक आभार आद सुनील प्रसाद जी स्नेह बनाएं रखें
Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on January 12, 2017 at 8:43pm
आदरणीय अभिषेक जी बेहद खूबसूरत ग़ज़ल।
Comment by Abhishek kumar singh on January 12, 2017 at 7:15pm
हार्दिक आभार आद tasdik साहब स्नेह बनाएं रखें
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on January 12, 2017 at 7:05pm

जनाब अभिषेक साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है ,मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by Abhishek kumar singh on January 12, 2017 at 5:18pm
बहुत बहुत शुक्रिया आद मिथिलेश वामनकर जी ,
मार्गदर्शन के लिए शुक्रगुजार हूँ , स्नेह सम्बल बनाएं रखें
Comment by Abhishek kumar singh on January 12, 2017 at 5:16pm
बहुत बहुत आभार आद समर कबीर साहब
स्नेह बनाएं रखें
Comment by Abhishek kumar singh on January 12, 2017 at 5:15pm
हार्दिक आभार आद mohammed आरिफ जी, स्नेह बनाएं रखें

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 12, 2017 at 4:50pm

आदरणीय अभिषेक जी, आपने बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है. शेर-दर-शेर दाद के साथ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. यदि आपको उचित लगे तो आखिरी शेर में तनिक गुंजाइश लग रही है जैसे-

बिखरी हरेक सिम्त थी जो ख्वाहिशें मेरी

उनको समेट यादों का गट्ठर बना दिया 

सादर 

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