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कच्चा ये माटी का घर छोड़ता हूँ----Gazal

22 122 122 122

दर पर तुम्हारे बसर छोड़ता हूँ।

लो मैं तुम्हारा नगर छोड़ता हूँ।।

क्या फ़र्क है, ग़र है धड़कन तुम्हीं से।

मैं ज़िन्दगी की बहर छोड़ता हूँ।।

चिंता नहीं कर न आऊँगा मिलने।

कच्चा ये माटी का घर छोड़ता हूँ।।

तुमको नज़र लग न जाये किसी की

काज़ल ये दिल भस्म कर छोड़ता हूँ।।

खुद पे तुम्हारा यकीं कम न होये।

तुमको ग़ज़ल में अमर छोड़ता हूँ।।

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 10, 2016 at 11:30am — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
जेब में सहमा हुआ इतवार है (ग़ज़ल 'राज ')

२१२२ २१२२ २१२

मजहबों के बीच जो दीवार है

डालती उस नींव को सरकार है

हाथ में जिसके किताबें चाहिए

आज उसके हाथ में हथियार है

जिन्दगी इक बार मिलती है यहाँ

मर रहा इंसान सौ सौ बार है

ख्वाहिशें बच्चों की पूरी क्या करें

जेब में सहमा हुआ इतवार है

पढ़ नहीं सकता यहाँ इक हर्फ़ जो

बेचता सड़कों पे वो अखबार है

राम रहिमन बिक रहे बाजार में

फल रहा बस धर्म का व्यापार…

Continue

Added by rajesh kumari on July 10, 2016 at 10:30am — 36 Comments

ग़ज़ल मनोज अहसास(इस्लाह के लिए)

2122 2122 2122 212



मुस्कुराहट ही सदा मिलती खता के सामने

सारी दुनिया छोटी है माँ की अदा के सामने



छत नहीं मिलती है जिनको एक ऊँचाई के बाद

गिर भी जाती हैं वो दीवारें हवा के सामने



सिर्फ वो ही ढक सकेगा अपनी खुद्दारी का सर

दौलतें प्यारी नहीं जिसको अना के सामने



जिनकी दहशत से सितम से जल रहा सारा जहां

वो भला क्या मुँह दिखायेगें खुदा के सामने



आसमां सी सोच हो और बात हो ठहरी हुई

फिर ग़ज़ल मंज़ूर होती है दुआ के सामने



तेरे… Continue

Added by मनोज अहसास on July 10, 2016 at 9:37am — 14 Comments

तम से लड़ी है जिंदगी

2122  2122  2122  212

मौत है निष्ठूर निर्मम तो कड़ी है जिंदगी

जो ख़ुशी ही बाँटती हो तो भली है जिंदगी

 

लोग जीने के लिए हर रोज मरते जा रहे

ये सही है तो कहो क्या फिर यही है जिंदगी

 

दो निवालों के लिए दिनभर तपाया है बदन

या कि मानव व्यर्थ चाहत में तपी है जिंदगी  

 

झूठ माया मोह रिश्ते सब सही लगते यहाँ

जाने कैसे चक्रव्यूहों में फँसी है जिंदगी

 

काठ का पलना कहीं तो खुद कहीं पर काठ है

है हँसी…

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Added by Ashok Kumar Raktale on July 9, 2016 at 7:00pm — 18 Comments

बाँझ निवास (लघुकथा)राहिला

"अरी विभा देख जरा वहां"बस के आगे जा रहे वाहन की ओर इशारा करके सुधा बोली।

"क्या दिखाना चाह रही हो ,वो ट्रॉली?"

"हाँ,क्या ऐसा नहीं लग रहा उसे देख कर, जैसे सैकड़ो नन्हें मुन्ने नर्सरी के बच्चे पहली बार विद्यालय वाहन में सवार हो,झूमते ,गाते ,तालियाँ बजाते चले जा रहे हों।"

"फिर दौड़ाये तूने कल्पना के घोड़े"

"तो तू भी दौड़ाकर देख ,एक बार मेरी तरह।"

सुधा द्वारा चित्रित किये दृश्य को जब उसने ,उसकी नज़र से देखा तो भाव विभोर होकर बोली।

"कसम से सुधी! ये नर्सरी  वाहन…

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Added by Rahila on July 9, 2016 at 1:01pm — 25 Comments

दोस्ती और दग़ाबाजी (लघु कथा। ) जानकी बिष्ट वाही

सुबह से दोपहर होने को आई।बाहर चिलचिलाती धूप और अंदर घुटन। जगदीश ये समझ नहीं पा रहा कि मन की बैचेनी है या कुछ और।

चपरासी के हाथ वह अपने आने की ख़बर अंदर तक पहुंचा चुका है। रतनुवा (रतन) बचपन से जवानी तक,गाँव में दिन भर उसके पीछे -पीछे डोलता था।उसका जिगरी यार है।



" भाई ! एक बार और कह दो कि गाँव से जगदीश आया है।" उसने चपरासी की चिरौरी की।



चपरासी अंदर चला गया और तुरंत लौट कर बोला -

"अंदर मीटिंग चल रही है।"



अनपढ़ रतनुवा का भी राजयोग निकला।विपक्षी पार्टी ने… Continue

Added by Janki wahie on July 9, 2016 at 12:07pm — 15 Comments

विदा काल

कोई कल्पना-स्वप्न ही होगा शायद

हुआ जो हुआ, वह इरादतन नहीं था

नियति की काल-कोठरी को बूझा है कौन

‘ कहाँ- कहाँ था मेरा दोष ’ का गंभीर भान

दोष कहीं कोई तुम्हारा नहीं था

जीवन के आरोह-अवरोह से डरी-डरी

अज्ञात भय से भीगी तुम कह देती थी ...

अनहोनी का होना कोई नया नहीं है

और मैं, गई रात की हिमीभूत टीस छिपाये

हलके-से दबाकर हाथ तुम्हारा

मुस्करा देता था

उस गंभीर पल को छल देता था

अनगिन…

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Added by vijay nikore on July 8, 2016 at 5:43pm — 12 Comments


मुख्य प्रबंधक
दो शब्द चित्र (गणेश जी बागी)

दो शब्द चित्र

1-

दरकिनार हुए...

अनुभव, योग्यता

कार्य-कुशलता,…

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Added by Er. Ganesh Jee "Bagi" on July 8, 2016 at 9:30am — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दोहे - पाँच -- गिरिराज भंडारी

सर पर छत थी वो गयी , भीत भीत चहुँ ओर

रक्ष रक्ष मैं रेंकता , चोर मचाये शोर

 

सबकी चिंता है अलग, सब में थोड़ा फर्क

सब कहते वो पाप है, वो जायेगा नर्क  

 

स्वार्थ सदा रहता छिपा, सब रिश्तों के बीच

लेकिन वह जो बोल दे, कहलाता है नीच

 

सबकी अपनी व्यस्तता, सब के अपने राग

सर्व समाहित सोच से , तू भी थोड़ा भाग

 

सब तक सीढ़ी है बना , पायेगा  अनुराग  

पत्थर को ठोकर मिली , रे मानुष तू…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 8, 2016 at 9:00am — 6 Comments

ग़ज़ल ( ख़िज़ाँ भी शामिल बहार में है )

१२१२२ - १२१२२

हंसी न अश्कों की धार में है ।

वफ़ा फ़क़त एतबार में है ।

लबों पे मुस्कान आँख है नम

ख़िज़ाँ भी शामिल बहार में है ।

लिपटना आता कहाँ है गुल को

ये ख़ास खसलत तो खार में है ।

निकाल दूँ अपने दिल से  उनको

कहाँ मेरे अख्तियार में है ।

जो देख ले खोए होश अपना

कशिश वो  रूए निगार में है ।

जुनूने दीदारे यार  देखो

खड़ा वो कल से कतार में है ।

कहाँ है तस्दीक…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on July 7, 2016 at 4:00pm — 14 Comments

कमाई (लघुकथा)

वह महंगी शॉल ओढ़े, गर्व से चेहरा उठाये, आरामदायक व्हीलचेयर पर बैठा हुआ था, जिसे एक नर्स धकेल रही थी| हस्पताल में एक डॉक्टर के कमरे के बाहर उसने नर्स को रुकने का इशारा किया| नर्स ने कुर्सी रोकी ही थी कि डॉक्टर के कमरे के दरवाज़े पर टंगा सफेद पर्दा हटा कर एक आदमी बाहर निकला| उसने ध्यान से देखा वह उसका पुराना मित्र था, जो वर्षों बाद दिखाई दिया| मित्र ने भी उसे एकदम पहचान लिया, लेकिन उसे व्हीलचेयर पर देखकर मित्र चौंका और उससे पूछा,

"अरे, तुम! कैसे हो? यह क्या हो गया?"

उसने गर्व से…

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Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on July 7, 2016 at 3:00pm — 4 Comments

ज्योतिपुंज जगदीश!

*छप्पय छंद*





ज्योतिपुंज जगदीश!

रहो नित ध्यान हमारे।



कलुष-द्वेष-दुर्भाव,

हृदय-तम हर लो सारे।।



सत्य-स्नेह-सद्भाव,

समर्पण का प्रभु! वर दो।



जला ज्ञान का दीप,

प्रभा-शुचि हिय में भर दो।



दो बल पौरुष-सद्बुद्धि हरि!

फहराएं ध्वज-धर्म हम।



हर जनजीवन के त्रास हर,

करें सदा सद्कर्म हम।।





*किरीट सवैया*





संकटमोचन! राम-सखा! तुम,

बुद्धि-दया-बल-सद्गुण-सागर।



दीन-दुखी… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 7, 2016 at 8:23am — 4 Comments

दर पर किसे रोकना चाहते हो?-ग़ज़ल

22 122 122 122

हँसती निगाहें अधर मुस्कुराते
सच सच बताओ कि क्या चाहते हो?

रेशम सी ज़ुल्फ़ें हैं उड़तीं हवा से
बोलो किसे बांधना चाहते हो?

गालों पे ये जो भवर है तुम्हारे
किसको डुबाना भला चाहते हो?

बाँहों पे खुद की टिका करके सर तुम
दर पर किसे रोकना चाहते हो?

बोलो अदाओं की गिराकर
करना किसे तुम फ़ना चाहते हो?

मौलिक-अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 6, 2016 at 11:25pm — 10 Comments

दिलों मेंं लिपटे साये थे ....

दिलों मेंं लिपटे साये थे ....

दोनों उरों मेंं

हुई थी हलचल

जब दृग से दृग

टकराये थे

दृग स्पर्श से मौन हिया के

स्वप्न सभी मुस्काये थे

अधरों पर था लाज़ पहरा

लब न कुछ कह पाए थे

अवगुण्ठन मेंं वो अलकों के

कुछ सकुचे शरमाये थे

झुकी पलक के देख इशारे

हम मन मेंं मुस्काये थे

मधु पलों को सिंचित करने

स्नेह घन घिर अाये थे

हुअा सामना जब हमसे तो

वो सिमटे घबराये थे

हौले हौले कैद हुए हम

इक दूजे की बाहों मेंं…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 6, 2016 at 10:24pm — 2 Comments

ग़ज़ल .........कैसे कहूं कि तू मुझे चिट्ठी ही भेज दे ...

कैसे कहूँ कि तू मुझे चिट्ठी ही भेज दे,

तू है जहाँ वहां की तू मिट्टी ही भेज दे.

 

याद आ रही है मुझको तेरी आज इस तरह,

तू प्यार से लिख चिट्ठियां कोरी ही भेज दे.

 

करता तलाश नौकरी कैसे बता मिले,

चिठ्ठी नहीं तो तू मेरी अर्जी ही भेज दे.

 

बेज़ार हो चुकी बहुत  तनहाइयों से मैं,

बेशक तू कोई याद पुरानी ही भेज दे.

 

इस  जिंदगी की राह में कांटे बिछाये क्यूँ,

तू ज़िंदगी के नाम की रुबाई ही भेज…

Continue

Added by Abha saxena Doonwi on July 6, 2016 at 5:41pm — 8 Comments

गजल(घिर गयीं कितनी घटाएँ....)

2122 2122 2122 212

घिर गयीं कितनी घटाएँ बेसबब मौसम रहा

डूबते हैं घर कहीं पर आदमी बेदम रहा।1



झेलते ही रह गये वाचाल मौसम की अदा

नम हुई धरती किसीकी तो कहीं पे गम रहा। 2



उठ गया जो सरजमीं से सुन रहा कुछ भी नहीं

बस तिरंगे के तले फहरा मुआ परचम रहा।3



श्वान भी शरमा रहे हैं भौंकने से इस कदर

मुफ्त की रोटी उड़ाकर वह दिखा दमखम रहा।4



देश-सेवा को चला वह लूट का सामान ले

लूटने की ताक में कहते यहाँ हरदम रहा।5



बाँटकर कुछ बोटियाँ… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 6, 2016 at 12:01pm — 9 Comments

पर्पल डार्कनेस (लघुकथा)

"थू... थू... थू..."



सूरज, जो अब तक लगातार गुस्से से चुकन्दर को ऐसे खाये जा रहा था जैसे कि उससे उसकी कोई पुरानी दुश्मनी हो, ने उसे ग़ौर से देखा और फिर थूकते हुए अपने हाथों से दूर फेंक दिया। इसके बाद उसने आलमारी से एक पुरानी शर्ट निकाली, उसे पहना और फिर आईने के सामने खड़ा हो गया। थोड़ी देर बाद उसने शर्ट को उतारा और गुस्से से उसे ज़मीन पे फेंक दिया। फिर मेज से बोतल उठायी और पूरी शराब शर्ट के ऊपर उड़ेल दी। माचिस लगते ही एक अजीब-सा अँधेरा पूरे कमरे में फैलने लगा...



आज से दो साल पहले… Continue

Added by Mahendra Kumar on July 6, 2016 at 11:00am — 10 Comments

दो कोड़ी की औक़ात (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

बहुत तेज़ धूप में राहगीर ज़ल्दबाज़ी में सड़क के विभाजक (डिवाइडर) पर चढ़कर उस पार जा रहा था। तभी उसकी नज़र डिवाइडर पर बैठे एक मरियल से भिखारी पर पड़ी, जो बार-बार अपने खाली कटोरे और चप्पलों को चूमकर माथे से लगा रहा था। उस राहगीर से रहा नहीं गया। उसने उस भिखारी से वह सब करने की वज़ह पूछी।



उसने अपने पेट पर हाथ रखकर कहा, "खाली कटोरा, खाली पेट; आज कुछ नहीं मिला हम दोनों को, देख! भूख का दर्द बांट रहे हैं, भैया!"



"लेकिन तुम चप्पलों को भी चूमकर माथे से क्यों लगा रहे हो?" - राहगीर ने… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on July 6, 2016 at 9:18am — 15 Comments

कुण्डलिया

छाये नभपर घन मगर, सहमी है बरसात |

देख धरा का नग्न तन, उसे लगा आघात ||

उसे लगा आघात, वृक्ष जब कम-कम पाए,

विहगों के वह झूंड, नीड जब नजर न आए,

अब क्या कहे ‘अशोक’, मनुज फिरभी इतराए,

झूठी लेकर आस, देख घन नभ पर छाए ||

 

 

कहीं उडी है धूल तो, कहीं उठा तूफ़ान |

देख रहा है या कहीं, सोया है भगवान ||

सोया है भगवान, अगर तो मानव जागे,

हुई कहाँ है भूल , जोड़कर देखे तागे,

जीवन की यह राह, गलत तो नहीं मुड़ी है

देखे क्यों…

Continue

Added by Ashok Kumar Raktale on July 6, 2016 at 8:59am — 2 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - रोज उल्टियाँ वैचारिक कर देने वालों -- गिरिराज भंडारी

22  22  22   22   22   22 – बहरे मीर

आज उठाये घूम रहे हैं जिनको सर में

वो सब पटके जाने लायक हैं पत्थर में

 

अपनी बीमारी को बीमारी कह सकते

इतनी भी ताक़त देखी क्या, ज़ोरावर में ? (ताक़तवर)

 

फेसबुकी रिश्ते ऐसे भी निभ जाते हैं

वो अपने घर में कायम, हम अपने घर में

 

रोज उल्टियाँ वैचारिक कर देने वालों

चुप्पी साधे क्यों रहते हो कुछ अवसर में ?

      

जब समाचार में गंग-जमन का राग लगे, तुम 

मन्दिर-मस्ज़िद खेल…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 6, 2016 at 8:27am — 8 Comments

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