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ग़ज़ल - रोज उल्टियाँ वैचारिक कर देने वालों -- गिरिराज भंडारी

22  22  22   22   22   22 – बहरे मीर

आज उठाये घूम रहे हैं जिनको सर में

वो सब पटके जाने लायक हैं पत्थर में

 

अपनी बीमारी को बीमारी कह सकते

इतनी भी ताक़त देखी क्या, ज़ोरावर में ? (ताक़तवर)

 

फेसबुकी रिश्ते ऐसे भी निभ जाते हैं

वो अपने घर में कायम, हम अपने घर में

 

रोज उल्टियाँ वैचारिक कर देने वालों

चुप्पी साधे क्यों रहते हो कुछ अवसर में ?

      

जब समाचार में गंग-जमन का राग लगे, तुम 

मन्दिर-मस्ज़िद खेल…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 6, 2016 at 8:27am — 8 Comments

बंटवारा--

जैसे ही वो भिखारी उनके दरवाज़े पर पहुंचा और आवाज़ लगायी "भगवान के नाम पर कुछ दे दो बाबा", पंडितजी ने डपट कर कहा "यहाँ क्यों आये माँगने, वहीँ से ले लिया करो"|

भिखारी ऐसी झिड़कियों का आदी था, कुछ देर सोच में पड़ा रहा फिर बोल "हम तो मांग के खाने वाले हैं, जहाँ मिल जाए, ले लेते हैं"|

"फिर भी, सोचते नहीं हो कि कहाँ माँगना है और कहाँ नहीं", कहते हुए पंडितजी की नज़र किनारे वाले घर की ओर चली गयी|

भिखारी ने भी गर्दन उस तरफ किया, किनारे वाला घर अहमद भाई का था जिनके यहाँ से उसने अभी कुछ खाने…

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Added by विनय कुमार on July 5, 2016 at 10:30pm — 8 Comments

"सुराख वाले छप्पर"

ऑफ़िस से आकर सब काम निपटाते -निपटाते थक कर चूर हो गई थी वह. बस! बर्तन जमा कर दूध मे जामन लगाना शेष था.   उसके हाथ तेजी से  प्लेटफार्म साफ़ कर रहे थे.पसीने से …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on July 5, 2016 at 7:00pm — 8 Comments

ग़म पे अब कहकहे लगाता हूँ (ग़ज़ल)

2122 1212 22(112)



ग़म पे अब कहकहे लगाता हूँ।

खुद ही अपना मज़ाक उड़ाता हूँ।



अश्क़ आँखों में छलछलाएँ लाख़,

गीत लेकिन ख़ुशी के गाता हूँ।



अब तो बे-नूर इक सितारे सा,

वक़्त बेवक़्त टिमटिमाता हूँ।



वक़्त क्या तोल पाएगा मुझको,

वक़्त का वज़्न मैं बताता हूँ।



बाद मुद्दत के चुक नहीं पाया,

जाने कैसा उधार-खाता हूँ।



मैं हूँ दीनारों की खनक, प्यारे

मैं ही इस दौर का विधाता हूँ।



ठोकरों से करूँ गिला कैसे,

तज्रिबे तो… Continue

Added by जयनित कुमार मेहता on July 5, 2016 at 7:00pm — 5 Comments

चलो बंजारा बनें-ग़ज़ल

2122 2122 1222 212



कैद हो रहने से बेहतर, चलो बंजारा बनें।

घुट के यूँ जीने से बेहतर, चलो आवारा बनें।।



देख पैसे की हवस हमको है ले आई कहाँ।

चल के जंगल में रहें आदमी दोबारा बनें।।



अपनी दुनिया में ही मशरूफ हैं लायक तो सभी।

चल मुहल्ले की उदासी हरें नाकारा बनें।।



पूछता कोई नहीं प्यासे हैं कुछ बूढ़े शज़र।

स्नेह बरसाए जो उन पर वही फव्वारा बनें।।



डोर रिश्तों की नहीं दिखती है अँधेरा घना।

हम ही दीपक से जलें रात में उजियारा… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on July 5, 2016 at 5:25pm — 8 Comments

मंज़र ( नज़्म )

अम्बर के दरीचों से फ़रिश्ते अब नहीं आते

न परियाँ आबशारों में नहाने को उतरती हैं

न बच्चों की हथेली पर कोई तितली ठहरती है

न बारिश की फुआरों में वो खुशियाँ अब बरसती हैं

सभी लम्हे सभी मंज़र बड़े बेनूर से हैं सब

मगर हाँ एक मंज़र है

जहां फूलों के हंसने की अदा महफूज़ है अब भी

जहाँ कलियों ने खिलने का सलीक़ा याद रखा है

जहां मासूमियत के रंग अभी मौजूद हैं सारे

वो मंज़र है मेरे हमदम

तुम्हारे मुस्कुराने का

- शेख…

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Added by saalim sheikh on July 5, 2016 at 4:21pm — 4 Comments

भावजड़ता

165

भावजड़ता

========

अहंमन्यता की तलैया में

मूर्खता की कीचड़ से जन्म ले

ए भावजड़ता !

तू कमल की तरह खिलती है।



अपने आकर्षण के भ्रमजाल में

उलझाती है ऐसे,

कि सारी जनता

लहरों पर सवार हो बस तेरे गले मिलती है।



झूठ सच के विश्लेषण की क्षमता हरण कर

आडम्बर ओढ़े, गढ़ती है नए रूप।

धनी हों या मानी, गुणी हों या ज्ञानी

तेरे कटाक्ष से सब होते हैं घायल

क्या साधू क्या फक्कड़ , बड़े बड़े भूप।



भू , समाज और भूसमाज भावना…

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Added by Dr T R Sukul on July 5, 2016 at 11:23am — 10 Comments

मुझे पूर्ण कर जाएगा.....

मुझे पूर्ण कर जाएगा.....

न जाने कितनी बार

मैं स्वयं को

दर्पण मेंं निहारती हूँ

बार बार

इस अास पर

खुद को संवारती हूँ

कि शायद

अाज कोई मुझे

अपना कह के पुकरेगा !

मेरी इस सोच से

मेरा विश्वास

डगमगाता क्यूँ है ?

क्या मैं दैहिक सोन्दर्य से

अपूर्ण हूँ ?

क्या मेरा वर्ण बोध

मे्रे भाव बोध के अागे बौना है ?

फिर स्वयं के प्रश्न का उत्तर

अपने प्रतिबिंब से पूछ लेती हूँ …

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Added by Sushil Sarna on July 4, 2016 at 9:30pm — 8 Comments

तज़मींन

तज़मींन बर ग़ज़ल फ़िराक़ गोरखपुरी

2122 2122 2122 212



उसके लब औ' जाँफ़िजा़ आवाज़ की बातें करो

फिर उसी दमसाज़ के ऐजाज़ की बातें करो

सोगे इश्क़ आबाद है अब साज़ की बातें करो

"शामे ग़म कुछ उस निगाहें नाज़ की बातें करो

बेख़ुदी बढ़ती चली है राज़ की बातें करो."



ज़िंदगी में जाविदाँ हैं अाहो दर्दो रंजो ग़म

जिक्र से उस शोख़ के देखे गए होते ये कम

उसके ढब,उसकी हँसी,हर शौक़ उसका हर सितम

"नक्हते ज़ुल्फ़े परीशां दास्ताने शामे ग़म

सुब्ह़ होने तक… Continue

Added by shree suneel on July 4, 2016 at 8:36pm — 4 Comments

नहीं आती मुझे अब नींद जीभर के पिला साकी

१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

नहीं आती मुझे अब नींद जीभर के पिला साकी

निशा गहरी डगर सूनी कहाँ जाएँ बता साकी

मुहब्बत मेरी पथराई जमाने भर की ठोकर खा 

अहिल्‍या की तरह मेरी कभी जड़ता मिटा साकी

मैं भंवरों सा  भटकता ही रहा ताउम्र बागों में

कमल से अपने इस दिल में तू ले मुझको छुपा साकी

 ये मंजिल आखिरी मेरी ये पथ भी आखिरी मेरा

मेरी नजरों से तू नजरें घड़ी भर तो मिला साकी

जो सीना चीर पाहन का निकलता मैं…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on July 4, 2016 at 2:00pm — 13 Comments

अक़लदाढ़(लघुकथा)राहिला

"यार रमेश!याद है परसों एक पंडित जी अपनी जमीन के किसी मसले को लेकर अपने कलेक्टर साहब से मिलने आये थे।"

"हाँ यार,क्या ओज था उस व्यक्ति के चेहरे पर।कोई भी प्रभावित हुए बगैर नही रह सकता था।मैंने तो खुद अपने बालक के बारे में पूछा था उनसे । ज्योतिष का खूब ज्ञाता था।"

"हाँ ,यही तो मैं बता रहा हूँ, अपने कलेक्टर साहब ! भी नहीं बच पाये।"

"मतलब अपनी तरह उन्होंने भी कुछ पूछा क्या? लेकिन आपको कैसे पता चला?"

"अपना रघु जिंदाबाद ,चाय पानी देने गया था अंदर, बस... ।"

"ऐसा क्या पूंछ… Continue

Added by Rahila on July 4, 2016 at 1:53pm — 20 Comments

ग़ज़ल -- डगर जीवन की जो समतल नहीं है। ( दिनेश कुमार )

1222--1222--122





डगर जीवन की जो समतल नहीं है

मेरी पेशानी पर भी बल नहीं है



समस्या आपकी सुलझाऊँगा मैं

मगर चिंता का कोई हल नहीं है



गवाही दे रही गलियों की रौनक

अभी उस गाँव में गूगल नहीं है



कोई तूफ़ान आएगा यक़ीनन

समन्दर में कहीं हलचल नहीं है



बनारस हो, गया, के हर की पौड़ी

कि अब गंगा कहीं निर्मल नहीं है



उसे हालात की भट्ठी ने ढाला

खरा सोना है वो पीतल नहीं है



मरेगा प्यास से फिर कोई… Continue

Added by दिनेश कुमार on July 4, 2016 at 12:55pm — 6 Comments

गीत-ऐ! राही आगे बढ़ता जा

ऐ! राही! आगे बढ़ता जा।



पथिक सत्य के पथ का तूँ है

उच्च-शिखर पर चढ़ता जा।

ऐ! राही! पथ पर.......



संघर्षों से तूँ ना डरना।

पथ पर पग पीछे ना धरना।।

बहुत मिलेंगे क्षणिक बवंडर।

रोकेंगे तुझको पग-पग पर।।

तोड़ आँधियों का मद प्यारे!

बाधाओं से लड़ता जा।

ऐ! राही! पथ पर.......



यूँ प्रतिमान रचे ना कोई।

कठिनाई से बचे न कोई।।

करके फिर अवलोकन देखो।

युग-पुरुषों का जीवन देखो।।

पाठ सत्य-संघर्ष-विजय का,

तव-जीवन के पढ़ता… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 4, 2016 at 12:18pm — 9 Comments

बहती बयार को यार यूँ ही बहने दो/सुरेश कुमार ' कल्याण '

तमाशबीन नयनों को झुका रहने दो,

इन फड़कते लबों को भी कुछ कहने दो।



अगर हमसे खता कुछ हो गई,

खुद को तो तुम बेखता रहने दो।



इतने अधीर क्यों हो मिलने की खातिर,

हमें भी कुछ गम-ए-जुदाई सहने दो।



जल बिन मीन सा तड़प रहा मन,

बहती बयार को यार यूँ ही बहने दो।



चाँदनी भी है मौसम भी खुशगवार है,

मगर मन उदास है इसे उदास ही रहने दो।



जग हँस रहा है मेरी इन तन्हाइयों पर,

वहम करते हैं लोग इन्हें वहमी ही रहने दो।



मेरे खाक… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on July 4, 2016 at 10:21am — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
एक वैचारिक रचना --'' भीड़ '' ( गिरिराज भंडारी )

एक वैचारिक रचना --'' भीड़ ''

********************************

व्यक्तियों के समूह को भीड़ कह लें  

अलग अलग मान्यताओं के व्यक्तियों का एक समूह

जो स्वाभाविक भी है

क्योंकि मान्यता व्यक्तिगत है

 

पर भीड़ विवेक हीन होती है

क्योंकि विवेक सामोहिक नही होता

ये व्यक्तिगत होता है

हाँ , समूह का उद्देश्य एक हो सकता है , पर

प्रश्न ये है कि क्या है वह उद्देश्य  ?

 

भीड़ हाँकी जाती है

भेड़ों की तरह

गरड़िये के…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 4, 2016 at 9:23am — 6 Comments


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गज़ल - दाग़ सभी के कुर्ते में -- ( गिरिराज भंडारी )

22  22  22  22  22  22  22  2

.

मेरा ओछा पन भी उनको झूम झूम के गाता है

जिन शेरों में कुत्ता –बिल्ली, हरामजादा आता है

 

वफा और समझ का मानी एक कहाँ दिखलाता है

रख के टेढ़ी पूँछ भी कुत्ता इसीलिये इतराता है

 

खोटे दिल वालों की नज़रें, सुनता हूँ झुक जातीं हैं

और कोई बातिल सच्चों में आता है, हकलाता है  

 

वो क्या हमको शर्म- हया के पाठ पढ़ायेंगे यारो

जिनको आईना भी देखे तो वो शर्मा जाता है

 

सबकी चड्डी फटी…

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Added by गिरिराज भंडारी on July 4, 2016 at 7:30am — 18 Comments

गजल(आइना क्यूँ आज....)

2122 2122 212



आइना क्यूँ आज बेईमान है

चल रहा चेहरे' चढ़ा इंसान है।1



घूमता बेखौफ सीना तानकर

लग रहा यह आदमी नादान है।2



पूछते सब आइने से डाँटकर

कौन मुजरिम की बता पहचान है।3



रात में पड़ताल चेहरों की कहाँ

झुर्रियों में मस्तियों की खान है।4



सूलियाँ भी देख अब शरमा रहीं

चढ़ रहा जिसको मिला फरमान है।5



आइना पहचानता मुल्जिम नहीं

बिक रहा सब कह रहे ईमान है।6



चश्मदीदों का उजड़ता गाँव ही

हो गयी फर्जी… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 3, 2016 at 11:00pm — 4 Comments


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काश हर दिन ही मुक़द्दस ईद हो (ग़ज़ल 'राज ')

2122 2122 212

बह्र –रमल मुसद्दस महजूफ़

काश हर दिन ही मुक़द्दस ईद हो 

और उनकी इस बहाने दीद हो

दिल ही दिल में प्यार हम करते उन्हें 

हो न हो उनको भी ये उम्मीद हो

चाँद मेरा सामने आये जहाँ 

शर्म से छुपता हुआ खुर्शीद हो

एक पल भी रह न पाए बिन मेरे 

ख़्वाब में मेरी उन्हें ताकीद हो

चाँद तारे दे गवाही साथ में 

यूँ हमारे इश्क़ की तज्दीद…

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Added by rajesh kumari on July 3, 2016 at 10:33pm — 12 Comments

चेहरे को देख कर, मुझे समझाता रहा वो प्यार

  1. चेहरे को देख कर, मुझे
    समझाता रहा वो प्यार
    भीतर में झांक कर, मेरा
    सहरा नहीं देखा

    दुनिया के ठहाकों में
    कुछ इस तरह खोया
    झील में दर्द मेरा
    ठहरा नहीं देखा

    मौन से, निश्शब्द
    चेहरों से डरे हुक्काम
    सत्य पर इस क़दर
    पहरा नहीं देखा

    राम-लक्ष्मणों के तीर
    क्या भ्रष्ट हो गए
    हर साल बिना रावण
    दशहरा नहीं देखा

मौलिक एवं अप्रकाशित

सुधेन्दु ओझा

Added by SudhenduOjha on July 3, 2016 at 9:30pm — No Comments

गिरा हुआ हूँ मुझको उठाओ कभी-कभी

गिरा हुआ हूँ मुझको उठाओ कभी-कभी

गिरा हुआ हूँ मुझको

उठाओ कभी-कभी

आँखों में यूंही लौट के,

आओ कभी-कभी



हसरत थी कि झूम के,

होंठों को चूम लूं

हौसले को मेरे,

बढ़ाओ कभी-कभी

जो भी मिला वही मुझे, 

कुछ दाग़ दे गया

दागों की दास्ताँ भी,

सुनाओ कभी-कभी



राहों में रोक कर मुझे,

दहला रहे सवाल

इनके जवाब लेके भी,

आओ कभी-कभी



तुझे साथ लेके चलने पे,

ज़माने को…

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Added by SudhenduOjha on July 3, 2016 at 9:30pm — 6 Comments

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