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गजल(आइना क्यूँ आज....)

2122 2122 212

आइना क्यूँ आज बेईमान है
चल रहा चेहरे' चढ़ा इंसान है।1

घूमता बेखौफ सीना तानकर
लग रहा यह आदमी नादान है।2

पूछते सब आइने से डाँटकर
कौन मुजरिम की बता पहचान है।3

रात में पड़ताल चेहरों की कहाँ
झुर्रियों में मस्तियों की खान है।4

सूलियाँ भी देख अब शरमा रहीं
चढ़ रहा जिसको मिला फरमान है।5

आइना पहचानता मुल्जिम नहीं
बिक रहा सब कह रहे ईमान है।6

चश्मदीदों का उजड़ता गाँव ही
हो गयी फर्जी गवाही शान है।7

कातिलों का है ठिकाना कुछ नहीं
अब सुबह का ही रहा इमकान है।8

सब मुखौटों को उड़ा देगा अभी
उठ रहा जो अब बड़ा तूफान है।9
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment

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Comment by Manan Kumar singh on July 4, 2016 at 7:48pm
आदरणीय गिरिराज भाई आभार आपका,परिमार्जन करता हूँ।
Comment by Manan Kumar singh on July 4, 2016 at 7:44pm
आभार आदरणीय रवि जी,सलाह के लिए शुक्रिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 4, 2016 at 3:44pm

आदरणीय मनन भाई , अच्छी ग़ज़ल कही है , दिल से बधाइयाँ आपको ।
पूछ रहे सब आज उससे डाँटकर -- ये मिसरा फिर देख लें , बहर से खारिज है

सब मुखौटों को उड़ा देगा अभी
अब बड़ा-सा उठ रहा तूफान है   --- बहुत बढिया !  उठ रहा जो अब बड़ा तूफान है  -- और अच्छा लगे शायद ।

Comment by Ravi Shukla on July 4, 2016 at 1:22pm

आदरणीय मनन जी  गजल के प्रयास के लिये बधाई स्‍वीकार करें 

पूछ रहे सब आज उससे डाँटकर
कौन मुजरिम की बता पहचान है। इस के उला में बह्र बाधित हो रही है । 

अशआर में बात को और साफ कहने के लिये थोड़ा समय और देने की जरूरत है । सादर 

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