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  • सुरेश कुमार 'कल्याण'
 

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दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया कहती है, मैं वैसा हूँ॥

दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया कहती है, मैं वैसा हूँ॥जेठ की दोपहरी पसीने का एहसास, ताम्र वर्ण की- अतृप्त प्यास॥ तेरी काँख के गंध जैसा हूँ॥ दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया कहती है, मैं वैसा हूँ॥सही वक़्त, सही लोग मिल नहीं पाए। शब्द बिखरे रहे, अर्थ मिल नहीं पाए॥ उनींदी रातों की, सिलवटों जैसा हूँ॥ दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया कहती है, मैं वैसा हूँ॥गीत होंठों को छू कर चले जाते हैं। दिवस, अमावस हुए जाते हैं॥ शब्द-हीन गीतों के, गायक जैसा हूँ॥ दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया…See More
May 21
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on SudhenduOjha's blog post फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)
"वाह आदरणीय बहुत ही सुन्दर"
Mar 19
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on SudhenduOjha's blog post फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)
"वाह वाह आदरणीय बहुत ही स"
Mar 19
TEJ VEER SINGH commented on SudhenduOjha's blog post फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)
"हार्दिक बधाई आदरणीय सुधेन्दु ओझा जी।बेहतरीन कविता/नज़्म। आज़ाद परिंदे हो,तुम उड़ ही जाओगे।माँ-बाप की कभी खटिया,पुरानी देख लेना॥"
Mar 17
सतविन्द्र कुमार commented on SudhenduOjha's blog post फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)
"आदरणीय सुधेन्दु ओझा सर,बेहतरीन नज्म कही है आपने।हार्दिक बधाई स्वीकारें।"
Mar 16
SudhenduOjha posted blog posts
Mar 16
SudhenduOjha replied to SudhenduOjha's discussion वर्तमान हिन्दू समाज में जातिगत विभीषिका को किस तरह समाप्त किया जासकता है? in the group आध्यात्मिक चिंतन
"Part-2 मैं कृतार्थ हूँ उन सज्जन का कि उन्होंने मेरी प्रथम पाण्डुलिपि पर बेबाक टिप्पणियाँ कीं और उसे दस-पंद्रह दिनों के अंदर ही मुझे लौटा भी दिया। उनकी इन टिप्पणियों से मैं बहुत लाभान्वित हुआ। मैंने ‘सनातन समाज की नई संहिता’ को समग्र…"
Aug 21, 2016
SudhenduOjha replied to SudhenduOjha's discussion वर्तमान हिन्दू समाज में जातिगत विभीषिका को किस तरह समाप्त किया जासकता है? in the group आध्यात्मिक चिंतन
"Part-1         सुधेन्दु ओझा (9868108713)     नए ‘सनातन समाज’ का गठन सभी हिन्दू-अहिन्दू अनिवार्यरूप से पढ़ें चतुर्थ वर्ण का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य वर्णों में आमेलन हिंदुओं की आदर्श नई समाज…"
Aug 21, 2016
Kalipad Prasad Mandal replied to SudhenduOjha's discussion वर्तमान हिन्दू समाज में जातिगत विभीषिका को किस तरह समाप्त किया जासकता है? in the group आध्यात्मिक चिंतन
"जातिप्रथा जाति प्रथा, कुरीतियाँ कैसे समाप्त हो सकती है? जब तक इन्सान स्वार्थी बने रहेंगे तबतक न कुरीतियाँ ,न जातिप्रथा, न तथाकथित धर्माचायों के कुचक्र का अंत होगा | स्वार्थ के कारण मनुष्य के व्यवहार में विरोधाभास उत्पन्न हो गया है, जिसे प्रचलित…"
Jul 27, 2016
SudhenduOjha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 63 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भण्डारी जी, मानता हूँ गेयता की कमी अवश्य होगी। कारण यह है कि मैं खुद कभी गा नहीं सका। इसलिए बेताला हूँ। हाँ गुणी संगीतज्ञों के बीच अवश्य रहा हूँ, वे मेरी सभी रचनाओं को खींच-खांच कर गा लेते हैं। एक बार ऐसे ही स्वर्गीय रवीन्द्र जैन जी के साथ भी…"
Jul 15, 2016
SudhenduOjha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 63 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय श्रीवास्तव जी आपने ठीक त्रुटि पकड़ी। धन्यवाद। कृपया निम्नवत कर लें : नीड़ का निरमान और, बुधीराम लाचार। सहयोगी जन को करे, शत-शत वह आभार॥ सादर,"
Jul 15, 2016
SudhenduOjha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 63 in the group चित्र से काव्य तक
"परम-परम आदरणीया सुश्री राजेश कुमारी जी, यह रचना किस विधा में है? इसका निराकरण सुलभ जी द्वारा सुलभ होगया है। इसलिए नहीं लिख रहा हूँ। "वैसे प्रस्तुति प्रदत्त चित्र के अनुरूप भी नहीं है।" इस ओब्ज़र्वेशन का कोई आधार तो होगा? मोटे तौर पर चित्र…"
Jul 15, 2016
SudhenduOjha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 63 in the group चित्र से काव्य तक
"रुत पावस की आगई, गहे पवन का हाथ। थूनी-छप्पर भी उड़े, पाकर अदभुत साथ॥ रुत है बहुत सुहानी बरसता झम-झम पानी बूँद-बूँद जो गिर रही, बरखा रात-बिरात। मुइ माटी की भीत भी, कर गइ भीतर-घात॥ घर-घर में नई कहानी हुए घर पानी-पानी गीली-सीली भीत…"
Jul 15, 2016
SudhenduOjha replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 63 in the group चित्र से काव्य तक
"तेरी जद छोड़ रहा हूँ मैं देख, तेरी हद तोड़ रहा हूँ मैं और कब तक बहेगी विरोध में हवा हवा का रुख मोड़ रहा हूँ मैं तिनका नहीं कि दर-बदर कर दे तिनकों से मकां जोड़ रहा हूँ मैं गरीब जान कर मुझे उजाड़ने वाले हर मसायल का मुंहतोड़ रहा हूँ मैं ये तूफान भी, अब डराते…"
Jul 15, 2016
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चित्र से काव्य तक

"ओ बी ओ चित्र से काव्य तक छंदोंत्सव" में भाग लेने हेतु सदस्य इस समूह को ज्वाइन कर ले |See More
Jul 15, 2016
SudhenduOjha replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-69
"वो अफसाना, जिसे किसी अंजाम तक लाना न हो मुमकिन उसे इक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना बेहतर!!!!! आदरणीय रक्ताले जी आप आदरणीय रवि जी की टिप्पणी के साथ मेरे उत्तर को पढ़ें। मैंने कुछ अनुचित नहीं कहा है। उन्हें द्रुत गति से कविता अथवा गीत की दुर्गति करनी थी सो…"
Jul 8, 2016

Profile Information

Gender
Male
City State
New Delhi
Native Place
Pratapgarh (UP)
Profession
Service

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दुनिया कहती है, मैं ऐसा हूँ। दुनिया कहती है, मैं वैसा हूँ॥

दुनिया कहती है,

मैं ऐसा हूँ।

दुनिया कहती है,

मैं वैसा हूँ॥

जेठ की दोपहरी

पसीने का एहसास,

ताम्र वर्ण की-

अतृप्त प्यास॥

तेरी काँख के गंध

जैसा हूँ॥



दुनिया कहती है,

मैं ऐसा हूँ।

दुनिया कहती है,

मैं वैसा हूँ॥

सही वक़्त, सही लोग

मिल नहीं पाए।

शब्द बिखरे रहे,

अर्थ मिल नहीं पाए॥

उनींदी रातों की,

सिलवटों जैसा हूँ॥



दुनिया…

Continue

Posted on May 20, 2017 at 10:05pm

फुर्सत से कभी मेरी,ज़िंदगानी देख लेना (कविता/नज़्म)

फुर्सत से कभी मेरी,

ज़िंदगानी देख लेना।

हो सके तो दरिया,

तूफानी देख लेना॥



है मेरी माँ ये,

समझाऊँ तुम्हें कैसे।

भूखा जो रहूँ, मैं

इसकी पेशानी देख लेना॥



आज़ाद परिंदे हो,

तुम उड़ ही जाओगे।

माँ-बाप की कभी खटिया,

पुरानी देख लेना॥



मैं अकेला कब था

मुझ में क़ायनात थी।

किस तरह से हमने, की

बे-ईमानी देख लेना॥



है सहूलियत तो,

मुंह खोलने से पहले।

पिताजी के अपनी,

परेशानी देख लेना॥



पीपल… Continue

Posted on March 16, 2017 at 2:35pm — 4 Comments

चेहरे को देख कर, मुझे समझाता रहा वो प्यार

  1. चेहरे को देख कर, मुझे
    समझाता रहा वो प्यार
    भीतर में झांक कर, मेरा
    सहरा नहीं देखा

    दुनिया के ठहाकों में
    कुछ इस तरह खोया
    झील में दर्द मेरा
    ठहरा नहीं देखा

    मौन से, निश्शब्द
    चेहरों से डरे हुक्काम
    सत्य पर इस क़दर
    पहरा नहीं देखा

    राम-लक्ष्मणों के तीर
    क्या भ्रष्ट हो गए
    हर साल बिना रावण
    दशहरा नहीं देखा

मौलिक एवं अप्रकाशित

सुधेन्दु ओझा

Posted on July 3, 2016 at 9:30pm — 1 Comment

गिरा हुआ हूँ मुझको उठाओ कभी-कभी

गिरा हुआ हूँ मुझको उठाओ कभी-कभी

गिरा हुआ हूँ मुझको

उठाओ कभी-कभी

आँखों में यूंही लौट के,

आओ कभी-कभी



हसरत थी कि झूम के,

होंठों को चूम लूं

हौसले को मेरे,

बढ़ाओ कभी-कभी

जो भी मिला वही मुझे, 

कुछ दाग़ दे गया

दागों की दास्ताँ भी,

सुनाओ कभी-कभी



राहों में रोक कर मुझे,

दहला रहे सवाल

इनके जवाब लेके भी,

आओ कभी-कभी



तुझे साथ लेके चलने पे,

ज़माने को…

Continue

Posted on July 3, 2016 at 9:30pm — 6 Comments

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At 6:00pm on June 9, 2016,
सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर
said…

आपका अभिनन्दन है.

ग़ज़ल सीखने एवं जानकारी के लिए

 ग़ज़ल की कक्षा 

 ग़ज़ल की बातें 

 

भारतीय छंद विधान से सम्बंधित जानकारी  यहाँ उपलब्ध है

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