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रात की सरहदें

रात की सरहदें,

चाँद का दबदबा,

जिनको करने फ़तह,

है सुबह चल पड़ी

नींद के सब किले,

बाँध लो तुम ज़रा,

ख़्वाब की ज़िन्दगी,

अब बहुत कम बची

सुबह और रात में,

जंग लो छिड़ गयी,

क़त्लो-ग़ारत हुई,

रात फिर छट गयी,

लाश तारों की उफ़!,

ओस बन बिछ गयी,

रौशनी, रौशनी,

हर तरफ चढ़ गयी

जीत का जश्न फिर,

खूब दिन भर चला,

आसमां रौंद कर,

देखो सूरज चला,

कितना मगरूर था,

हाय! कितना गुमां,…

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Added by Karunik on December 30, 2015 at 11:30pm — 3 Comments

चिता पर हूँ लेटा, जला क्यूँ न देती---ग़ज़ल (पंकज के मानसरोवर से)

122-122-122-122

.
मैं रूठा हूँ तुमसे, मना क्यूँ न लेती।
अदाओं का जादू, चला क्यूँ न लेती।।

गज़ब का नशा है जो,तेरी नज़र में।
तो हाला ये तू, आज़मा क्यूँ न लेती।।

पता है मुझे सिर्फ़, धोखाधड़ी है।
हक़ीक़त पता तू,लगा क्यूँ न लेती।।

जो डरती है हासिल,गँवाने से ग़र तू।
तो इन आंसुओं को छिपा क्यूँ न लेती।।

सुना है तेरे जिस्म में दामिनी है।
चिता पर हूँ लेटा,जला क्यूँ न देती।।

मौलिक एवम् अप्रकाशित

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on December 30, 2015 at 10:30pm — 10 Comments

ग़ज़ल ,,,,,,,,, गुमनाम पिथौरागढ़ी ,,,,,,,

२१२  २१२ 

आपका नाम था

मेरा तो जाम था

हर किसी धर्म में

प्यार पैगाम था

रब मिला ही नहीं

उससे कुछ काम था

वो ख़ुदा था कहीं

पर कहीं राम था

थी ख़ुशी ख़ास में

गम मगर आम था

प्रेम इंसानियत

अब भी गुमनाम था

मौलिक व अप्रकाशित

गुमनाम पिथौरागढ़ी

Added by gumnaam pithoragarhi on December 30, 2015 at 7:28pm — No Comments

कविता के मर जाने तक

उस दिन जब हम मिले थे 

पहली बार

हम चुप रहे

या यूँ कहो बोल ही न सके

और फिर यूँ ही मिलते रहे

तब तक  

जब तक तुमने शुरु नही किया

बोलना

हालांकि मैं 

बोल न सकी फिर भी

अधर थरथराये जरूर

पर खोल न सकी मुख

पर तुमने जब शुरू किया

तो जाने कहाँ से

शब्दों का समंदर उमड़ पड़ा  

और मैं

उसके घात-प्रतिघात के बीच

खाती रहे हिचकोले

मंत्र-मुग्ध, आतुर, विह्वल  

 

मैं जानती…

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Added by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 30, 2015 at 4:37pm — 4 Comments

कटे नहीं जीवन का तार ।

फूल बिना भौंरे का जीवन ,  जग में   है  कितना लाचार ।
जब  बाग वन कहीं खिले कली , आ जाये बिकल बेकरार ।
रंग रूप ना  दूरी देखे ,     नैनों    से    करता    इजहार ।
खार वार कुछ भी ना देखे ,    जोश     में  आये बार…
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Added by Shyam Narain Verma on December 30, 2015 at 12:30pm — 1 Comment

जतन कछ तो करो पेड़ों भले ही भार जादा अब -(गजल)- लक्ष्मण धामी ‘मुसाफिर’

1222    1222    1222    1222



सियासत काम कम करती मगर तकरार जादा अब

बुढ़ापा  चढ़  गया  है  या  पड़ी   बीमार  जादा  अब /1



जवानी   क्या   खुदा  ने  दी  फरामोशी  चढ़ी  सर  पर

लगे कम माँ की ममता जो सनम का प्यार जादा अब /2



बहुत था शोर पर्दे में रखे हैं खूब अच्छे दिन

उठा पर्दा तो  ये जाना  पड़ेगी मार जादा अब /3



कहा हाकिम ने है यारो चलेगी सम विषम जब से

हुए खुश यार  निर्माता  बिकेंगी  कार जादा अब /4



जहर लगती है मुझको तो…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 30, 2015 at 11:00am — 4 Comments

सक्षम कटी पतंग (लघुकथा) ['आकांक्षा' संदर्भित-2] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी (50)

"और क्या चाहती हैं आप इस उम्र में मेरे बाबूजी से ? हर महीने बिज़ली का बिल जमा करा देते हैं, गैस सिलेन्डर का भुगतान करा देते हैं, पीने के पानी का टेंकर डलवा देते हैं अपनी पेन्शन में से और हमारे बेटे की सालाना बीमा किश्त भी तो !" - विजय ने अपनी पत्नी के भाषण के जवाब में कहा।



" तुम्हारी हैसियत नहीं है, सो कर देते हैं, मुझे इन बातों से क्या मतलब, नहीं करेंगे तो मैं तो सक्षम हूँ न !” - ऑफिस जाने के लिए अपना पर्स उठाते हुए निशा ने अपने तकिया कलाम दोहरा दिये ।



"बाबूजी को नाश्ता… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 30, 2015 at 8:40am — 1 Comment


सदस्य टीम प्रबंधन
देहात में, सिवान से (नवगीत) // --सौरभ

क्या हासिल हर किये-धरे का ?

गुमसी रातें

बोझिल भोर !

 

हर मुट्ठी जब कसी हुई है

कोई कितना करे प्रयास

आँसू चाहे उमड़-घुमड़ लें

मत छलकें पर

बनके आस

 …

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Added by Saurabh Pandey on December 30, 2015 at 2:32am — 6 Comments

ग़ज़ल सीमा शर्मा

पहेली दिल की सुलझाऊँ तो कैसे

मैं इससे हार भी जाऊं तो कैसे।



लिपट जातें हैं पावों से बगूले

मैं बाहर दश्त से आऊँ तो कैसे।



पुकारे आसमां बाहें पसारे

परों बिन पास मैं जाऊं तो कैसे ।



धड़कता है वो दिल में दर्द बनकर

मैं उसको भूल भी जाऊं तो कैसे ।



गुलो पर बूँद मैं शबनम की बनके

हवा में फिर से घुल जाऊं तो कैसे।



उमड़ती ज़ह्ण में ख़्वाबों की नदियां

समन्दर मुट्ठी में लाऊँ तो कैसे



बदन पर पैरहन यादों का तेरा

नज़र…

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Added by सीमा शर्मा मेरठी on December 29, 2015 at 10:00pm — 13 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
कसीदे काम के पिछले सुना है वो पढ़ेगा कल (नव वर्ष पर ग़ज़ल 'राज )

नई हसरत नई हिम्मत नई परवाज़ देगा कल

मिटाने  तीरगी सबकी  नया सूरज उगेगा कल

 

नये सपने उगाये खेत में देखो सियासत ने

फ़लक तक कीमतें पाकर बशर बेबस हँसेगा कल

नये इस दौर में आकर हुआ नेता कलम मेरा

अधूरा छोड़ कर कल का नया वादा लिखेगा कल 

 

किसी भी रोज दफ्तर में किया कुछ भी नहीं जिसने

कसीदे काम के पिछले  सुना है वो पढ़ेगा कल

 

जो पिछले साल सोचे थे हुए पूरे कहाँ उसके  

भुलाकर वो पुराने अब नये संकल्प लेगा…

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Added by rajesh kumari on December 29, 2015 at 8:30pm — 10 Comments

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको

२१२  २१२  २१२  २१२ 

दो घड़ी जब ठहरना नहीं आपको 

तय ही है प्यार करना नहीं आपको 

चाँद अम्बर पे भी चाँद छत पे भी है 

कुछ भी हो है बहकना नहीं आपको 

रात दिन हुस्न क्यूँ यूं संवरता फिरे 

आँखों से कुछ समझना नहीं आपको 

बात गुल बुलबुलों तोता मैना कि क्या 

है कभी जब चहकना नहीं आपको 

सूखती जूड़े में नित नयी गुल कली 

खूब समझे बदलना नहीं आपको 

कितना भी यूं घटाओं सा उमड़ो मगर 

अब्र जैसे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on December 29, 2015 at 6:30pm — 8 Comments

अन्ना , मेरे भरोसे मत रहना / प्रदीप नील

लगे रहो तुम मेरे प्यारे, पीछे मत हटना अन्ना हज़ारे

सोलह से अनशन ज़रूर करना, अब किसी से ज़रा न डरना

क्योंकि पूरा देश तुम्हारे साथ है

पर ये और बात है,

कि मैं नहीॅं आ पाऊंगा ।

क्योंकि बिजली चोरी करते पकड़ा गया था

ज़ुर्माना भरने अदालत जाऊंगा

मज़बूरी है वर्ना ज़़रूर आता , साथ तुम्हारे नारे लगाता

गली-गली में शोर है, हर एक नेता चोर है ।।

अन्ना, मैं सत्रह को भी नहीं आ पाऊंगा

नया मकान खरीदा है, रजि़स्ट्री कराने जाऊंगा

मैं वहां मौज़ूद रहा तो दो…

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Added by प्रदीप नील वसिष्ठ on December 29, 2015 at 12:49pm — 2 Comments

देसी औरत (लघुकथा) / शेख़ शहज़ाद उस्मानी (48)

कड़ाके की सर्दी में सर्दी-बुख़ार से पीड़ित गर्भवती औरत कम्बल ओढ़े हुए ज़ोर-ज़ोर से कराह रही थी। रेलवे स्टेशन की टिकट खिड़की के पास ही एक कोने में अपने पति के साथ वह देर रात से बैठी हुई थी ।



"क्यों रे , अपनी लुगाई को सरकारी अस्पताल क्यों नहीं ले जा रहा, रात भर से कराह रही है। अब तो ऑटो- रिक्शा भी मिल जायेगा !"- एक कैन्टीन वाला दूर से ही चिल्लाकर बोला । पति खड़े होकर इधर उधर देखने लगा, फिर ठिठुरते हुए वापस अपनी जगह पर बैठ गया । औरत लगातार कराह रही थी। उसने इशारों से पति को परेशान न… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on December 29, 2015 at 9:43am — 10 Comments

कुछ छन्नपकैया सारछन्द

छन्न पकैया छन्न पकैया, खाकर रोटी चटनी

अब तो हम छन्दों में यारो,कहते विपदा अपनी



छन्न पकैया छन्न पकैया,सोवत काहे भैया

तेरी इस निंदिया के कारण डूब न जाये नैया



छन्न पकैया छन्न पकैया ,जीवन बीता रोते

क्यूँकि अपने साथ साथ औरों का दुःख भी ढोते



छन्न पकैया छन्न पकैया ,मुझ पर छींटा कँसती

जब भी मैं सच कहता हूँ ये ज़ालिम दुनिया हँसती



छन्न पकैया छन्न पकैया,भटके दर दर जोगी

कि भिक्षा देता वही उसे जो होता मन का रोगी



छन्न पकैया छन्न… Continue

Added by Samar kabeer on December 28, 2015 at 11:02pm — 8 Comments

आईने की दुनिया

उसे कुछ दिखाई नहीं देता

सिवा

अपने आप के

अपनी आँखों के सामने

उसने रखा है

आईना

वह रहता है आत्ममुग्ध

समझता है स्वयं को ही

सबसे सुंदर

सर्वश्रेष्ठ

उसने देखा नहीं है

कोई और चेहरा

उसे कुछ सुनाई भी नहीं देता

बंद कर रखे हैं

उसने अपने कान

वह सुनता है

सिर्फ अपने आप को ही

गूँजती है उसके कान में

अपनी ही आवाज

मानता है अपनी बात को ही

एक मात्र सत्य

चाहता है समूची दुनियाँ को

बनाना अपने जैसा

आँखों…

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Added by Neeraj Neer on December 28, 2015 at 8:34pm — 3 Comments

तुलना (लघुकथा)

आज 'उनका' फ़ोन आया था।फोन तो रोज ही आता था पर आज कुछ ख़ास बात कही आता उन्होंने। उन्होंने कहा,"अब शादी का दिन करीब आ रहा है थोड़ी 'डाइटिंग' कर लो। माँ कह रही थी कि स्टेज पर बैठेगी तो पतली ही अच्छी लगेगी। अभी दो महीने हैं। मैं तुम्हे 'डाइट प्लान' और योग की सीडी भेज दूँगा,प्लीज मेरे लिए करोगी न।"

शब्द घर कर गए दिल में,अब घबराहट होने लगी थी कि पतली न हुई तो 'उनकी' माँ और 'वो' क्या सोचेंगे मेरे बारे में....

अब रह रह कर माँ और भाई की बाते याद आ रही थी...कितना टोकते थे मुझे....मीठा खाने…

Continue

Added by निधि जैन on December 28, 2015 at 7:00pm — 2 Comments

गजल

गजल

2122 212 2122 2122

था फलक निज का कभी हो गया अब हाशिया हूँ

रोशनी तब थी मिली खो गयी बस मैं जिया हूँ।1

ढूँढता तब से रहा मैं अरे मिल भी सकी कब?

वह पहेली हो रही अब इधर मैं मुँह सिया हूँ।2

आ गये कितने खिलाड़ी खला मैं उन भलों को

खाल घर की बेचते बोलते खुद काफ़िया हूँ।3

तब लड़ी मैंने लड़ाई थके बिन जय कही भी

दुश्मनों पर छक चढ़ा फिर छका कर जय किया हूँ।4

जल सपन अपने गये बस रही है आरजू यह

हर कली खिल सज चले अब नये मग क्या लिया हूँ?5

लूटते हो लाज तुम… Continue

Added by Manan Kumar singh on December 27, 2015 at 10:00pm — 2 Comments

गाँधी जी का तीसरा बंदर (लघुकथा)

"क्या बात है?" घर पहुँचते ही उसकी माँ ने उसकी आँखों में आँसू और पिता की आँखों में चिंता को देखकर घबरा कर पूछा|

उसके पिता ने बताया, "सेठ जी के बेटे और सामने वाले भाईसाहब की बेटी के बीच कुछ चल रहा था, इसे सब बात पता थी| अब कल किसी बात पर उस लड़की ने आत्महत्या कर ली, तो आज ये पुलिस को सब बातें बताने लगी| वो तो ऐन वक्त पर मैनें भीड़ का फायदा उठा कर इसका मुंह बंद कर दिया नहीं तो....."

"नहीं तो क्या बाबूजी?" उसने पूछा

"किसी के फटे में हम टांग क्यों डालें? तू चुप नहीं रह सकती?"…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on December 27, 2015 at 4:00pm — 10 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हौंसलों के पंख (गीत).......डॉ0 प्राची



हौसलों के पंख ओढ़े

स्वप्न फिर थिरके सभी,

चूम कर अपना धरातल

उड़ चले विस्तार को...

क्या हुआ गत वक्त की यदि बेड़ियाँ थीं क्रूरतम

क्या हुआ जख्मी हृदय यदि दर्द से होते थे नम

स्वप्न में कण भर धड़कते प्राण जब तक शेष हैं

जीतती है आस तब तक, हारते विद्वेष हैं

हर विगत की आँच पर रख

नर्म भावों की छुअन,

बढ़ चले हैं स्वप्न फिर

युग के नवल शृंगार को...

हो निशा चाहे घनेरी ये चलेंगे पार तक

राह नित गढ़ते बढ़ेंगे रौशनी केे द्वार तक…

Continue

Added by Dr.Prachi Singh on December 27, 2015 at 1:00am — 13 Comments

फेरे लघुकथा

फेरे '



घर के काम से फ़ुरसत हो थोड़ा आराम करने जा ही रही थी , वक़्त बेवक्त घंटी के बजते ही मन में आया इस समय कौन होगा, अभी सूरज के आने का समय तो हुआ नहीं है, दरवाज़े पर पति को देख मैं चकित रह गई।

"अरे आप !!!!" पति को अचानक सामने ,पसीने से तरबतर देख ,अपने आप को बोलने से रोक ना पाई।

पानी लेने जा रही थी, सूरज ने हाथ पकड़ कर रोक लिया।

"तुमसे कुछ कहना है मुझे सुमन, मैं फिसल गया, रोशनी से संबंध बना बैठा , मुझे माफ़ करोगी ना मुझे हर सज़ा मंज़ूर है।

तुम्हारे,बच्चों के बिना… Continue

Added by Nita Kasar on December 26, 2015 at 6:20pm — 8 Comments

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