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पहेली दिल की सुलझाऊँ तो कैसे
मैं इससे हार भी जाऊं तो कैसे।

लिपट जातें हैं पावों से बगूले
मैं बाहर दश्त से आऊँ तो कैसे।

पुकारे आसमां बाहें पसारे
परों बिन पास मैं जाऊं तो कैसे ।

धड़कता है वो दिल में दर्द बनकर
मैं उसको भूल भी जाऊं तो कैसे ।

गुलो पर बूँद मैं शबनम की बनके
हवा में फिर से घुल जाऊं तो कैसे।

उमड़ती ज़ह्ण में ख़्वाबों की नदियां
समन्दर मुट्ठी में लाऊँ तो कैसे

बदन पर पैरहन यादों का तेरा
नज़र आईने को आऊँ तो कैसे।

जवानी लौट के आये न फिर से
कि सहरा में नदी लाऊँ तो कैसे

मैं गुड़िया मोम की सीमा वो पत्थर
उसे जलकर भी पिंघलाऊं तो कैसे ।

मौलिक और अप्रकाशित

सीमा शर्मा मेरठी

Views: 832

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 18, 2016 at 3:45pm

बहुत ही खूबसूरती से अहसासों को पिरोया है हार्दिक बधाई 

Comment by सीमा शर्मा मेरठी on April 6, 2016 at 1:37pm
शुक्रिया जी
Comment by vijay nikore on April 6, 2016 at 1:15pm

खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई।

Comment by सीमा शर्मा मेरठी on March 12, 2016 at 6:57pm
शुक्रिया आभार आदरणीय
Comment by जयनित कुमार मेहता on December 31, 2015 at 8:58pm
बहुत खूबसूरत ग़ज़ल बन पड़ी है,आदरणीय सीमा जी। बधाई आपको।।
Comment by MUKESH SRIVASTAVA on December 31, 2015 at 11:46am

khoobsooart GAzala Seema jee - badhaee

Comment by gumnaam pithoragarhi on December 30, 2015 at 7:21pm

वाह खूब वाह अच्छा है वाह ............

Comment by सीमा शर्मा मेरठी on December 30, 2015 at 12:58pm
शुक्रिया श्याम साहेब
Comment by Shyam Narain Verma on December 30, 2015 at 12:49pm
बहुत ही बढ़िया ग़ज़ल ....हार्दिक बधाई ! 
Comment by सीमा शर्मा मेरठी on December 30, 2015 at 12:09pm
laxman saheb dil sey shukriya aapka bhi

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