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आईने की दुनिया

उसे कुछ दिखाई नहीं देता
सिवा
अपने आप के
अपनी आँखों के सामने
उसने रखा है
आईना
वह रहता है आत्ममुग्ध
समझता है स्वयं को ही
सबसे सुंदर
सर्वश्रेष्ठ
उसने देखा नहीं है
कोई और चेहरा
उसे कुछ सुनाई भी नहीं देता
बंद कर रखे हैं
उसने अपने कान
वह सुनता है
सिर्फ अपने आप को ही
गूँजती है उसके कान में
अपनी ही आवाज
मानता है अपनी बात को ही
एक मात्र सत्य
चाहता है समूची दुनियाँ को
बनाना अपने जैसा
आँखों के सामने आईना रखा आदमी
मैं प्रतिबद्ध हूँ
उसका प्रतिरोध करने के लिए
मैं जानता हूँ
दुनिया आईने में नहीं देखि जा सकती

..... नीरज कुमार नीर/ मौलिक एवं अप्रकाशित 

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Comment by Samar kabeer on December 30, 2015 at 5:46pm
अब में कविता के सन्देश तक पहुंच गया,आपको पुनः बधाई इस कविता के लिये |
Comment by Neeraj Neer on December 30, 2015 at 4:17pm

जनाब समर कबीर साहब आपका शुक्रिया ..... ये आइना रखने वाले से सन्दर्भ उन तमाम लोगों से हैं, जो धार्मिक, सांप्रदायिक आदि आधारों पर स्वयं ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं एवं दुनियां के सारे लोगों को अपने ही मत एवं विश्वास के अनुसार कर देना चाहते हैं . ऐसे लोग कमोबेश सभी जगह , सभी समाज में पाए जाते हैं...... ऐसे लोगों का प्रतिकार जरूरी है . 

Comment by Samar kabeer on December 29, 2015 at 2:45pm
जनाब नीरज कुमार नीर जी आदाब,कविता अच्छी है पर ये समझ नहीं आता कि किसने आइना रख लिया है?

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