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फिर आओ गोपाल [ दोहा गीत जन्माष्टमी पर ]

 

हे पार्थ के सारथी, हे जसुमति के लाल

हरने जन की पीर अब , फिर आओ  गोपाल

 

ध्वस्त किया था कंस का ,इक दिन तुमने मान

निडर हो गया कंस अब ,और हुआ बलवान

घूम रहा है ओढ़ कर ,सज्जनता की खाल

हरने जन की पीर अब ,  फिर आओ  गोपाल

 

पाँचाली के चीर का ,किया खूब विस्तार   

नयनों में भर नीर फिर ,तुमको रही पुकार

अंध सभा में ठोकता , दुःशासन फिर  ताल

हरने जन की पीर अब  ,फिर आओ गोपाल

 

अर्जुन का रथ थाम कर…

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Added by pratibha pande on August 25, 2016 at 8:00am — 14 Comments

नेपाल यात्रा - यादों के झरोखे से (संस्मरण)

यह 1980-81 की बात है । मैं दसवी क्लास में थी । स्कूल का आखरी टूर था । पता चला कि नेपाल जाना था । स्कूल के टूर साल में दो बार होते थे गर्मी और विंटर की छुट्टियों में । दिसम्बर में जाना तय हुआ था । प्रिंसिपल सर ने घोषणा की कि दिल्ली , आगरा , पटना , गया से समस्तीपुर होते हुए नेपाल जाना होगा । हम क्लास में आपस में बाते करने लगे थे । अपने अपने मनसूबों के साथ हम में एक उत्साह था । यह स्कूल का आखरी टूर था । हम सब जल्द ही बिछड़ने वाले थे । मेरे मन में था मैं भी जाऊं । पर कैसे ?? एक नोटिस मिलता था ।…

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Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 25, 2016 at 7:00am — 9 Comments

उम्मीदों की कश्ती

टिमटिमाते तारे की रोशनी में

मैंने भी एक सपना देखा है ।  

टुटे हुए तारे को गिरते देखकर

मैंने भी एक सपना देखा है ।  

सोचता हूं मन ही मन कभी

काश ! कोई ऐसा रंग होता

जिसे तन-बदन में लगाकर

सपनों के रंग में रंग जाता ।

बाहरी रंग के संसर्ग पाकर

मन भी वैसा रंगीन हो जाता ।

सपनों से जुड़ी है उम्मीदें, पर   

उम्मीदों की उस परिधि को

क्या नाम दूं ? सोचता हूं तो 

मन किसी अनजान भंवर में

दीर्घकाल तक उलझ जाता…

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Added by Govind pandit 'swapnadarshi' on August 24, 2016 at 10:13pm — 4 Comments

ग़ज़ल

१ २ २ / १ २ २ / १ २ २ /१ २

याँ कुछ लोग जीते भलों के लिए

जिओ जिंदगी दूसरों के लिए |

गुणों की नहीं माँग दुख वास्ते 

सकल गुण जरुरी सुखों के लिए |

मैं गर मुस्कुराऊं, तू मुँह मोड़ ले

शिखर क्यूँ चढूं पर्वतों के लिए ? 

मैं किस किस की बातें सुनाऊं यहाँ

जले शमअ कोई शमो के लिए  |

मकाँ और दुकाने जो भी हैं यहाँ

जवाँ केलिए ना बड़ों के लिए |

मौलिक…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on August 24, 2016 at 8:30pm — 5 Comments

लूली---लघुकथा

 पास ही  की झुग्गी के  बच्चे और यहाँ तक की कुत्ते भी अचानक से उस और दौड़ पडे .

"अरे मुन्ना! वो देख जा जल्दी बहुत सारा खाना आया दिखता है." लूली ने जोर देकर अपने भाई से कहा और …

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Added by नयना(आरती)कानिटकर on August 23, 2016 at 10:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल - मेरे दर्दे गम की कहानी न पूछो

122 122 122 122



मेरे दर्दो गम की कहानी न पूछो ।

मुहब्बत की कोई निशानी न पूछो ।।



बहुत आरजूएं दफन मकबरे में ।

कयामत से गुजरी जवानी न पूछो ।।



मुझे याद है वो तरन्नुम तुम्हारा ।

ग़ज़ल महफ़िलों की पुरानी न पूछो ।।



हुई रफ्ता रफ्ता जवां सब अदाएं ।

सितम ढा गयी कब सयानी न पूछो ।।



बयां हो गई इश्क की हर हकीकत ।

समन्दर की लहरों का पानी न पूछो ।।



सलामी नजर से नज़र कर गयी थी ।

वो चिलमन से नज़रें झुकानी न पूछो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 23, 2016 at 10:00pm — 7 Comments

सच से कम कुछ कहा नहीं जाता- ग़ज़ल

2122 1212 22



गुमशुदा यूँ रहा नहीं जाता

घुट के हमसे मरा नहीं जाता



रौशनी की बहुत ज़रूरत है

इसलिए ही बुझा नहीं जाता



आँख मन से जुड़ी है सीधे ही

सोचने से बचा नहीं जाता



लेखनी ताक़ पर मैं रख देता

दिल बिना तो जिया नहीं जाता



हाँ; जी पढ़ता नहीं कोई पुस्तक

कर्ज़ लेकर लिखा नहीं जाता



है तो दुनिया बड़ा सरोवर पर

नीर के बिन खिला नहीं जाता



दुश्मनी पालिये भले साहिब

सच से कम कुछ कहा नहीं जाता



राह… Continue

Added by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2016 at 9:00pm — 7 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
पकड़कर हाथ राधा का चले जो नूर का बेटा (फिल्बदीह ग़ज़ल 'राज '

पड़े आफ़ात तो छुपता किसी मशहूर का बेटा 

कलेजा शेर का रखता मगर मजदूर का बेटा 



कहीं ऊपर जमीं के उड़ रहा मगरूर का बेटा 

जमीं को चूमता चलता किसी मजबूर का बेटा



कई तलवार बाहर म्यान से आती दिखाई दें  

पकड़कर हाथ राधा का चले  जो नूर का बेटा



सिखाने पर परायों के भरा है जह्र नफरत का 

चला हस्ती मिटाने को कोई अखनूर का बेटा



कदम पीछे हटा लेता जहाँ उसकी जरूरत हो 

हर इक रहबर फ़कत कहने को है जम्हूर का बेटा 



सरापा थाम…

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Added by rajesh kumari on August 23, 2016 at 6:32pm — 23 Comments

रामभरोसे (लघुकथा)राहिला

"अरे अब चुप भी हो जा।लड़के के नम्बर तेरे नाराज़ होने से बढ़ नहीं जायेंगे।जैसे तू डाक्टर बन गया ,वो भी बन जायेगा।सीटें तो मिलनी ही हैं वो कहाँ जाएँगी।"

"आप उसे बढ़ावा ना दें पिताजी!"

"अरे भई!मैं उसे कोई बढ़ावा नहीं दे रहा।बस,तू अब ये किच-किच बंद कर।मेरी तबियत वैसे भी सुबह से कुछ ठीक नहीं हैं।कह कर वो धम्मसे सौफे पर गिर गए और पसीने - पसीने हो गए।

"क्या हुआ आपको? "घबराकर राजेश ने उन्हें सम्हाला।लेकिन जल्दी ही एक हृदय रोग विशेषज्ञ होने के नाते उसे समझते देर ना लगी ,मामला हृदयघात का… Continue

Added by Rahila on August 23, 2016 at 1:30pm — 4 Comments

कुकुभ -छन्द -२

कुकुभ छंद -२

जीवन में दुःख के लिए तो, गुण जरुरी नहीं होता

हमेशा दुख है घुसपैटिया, अनाहूत पाहुन होता |

योग्यता, प्रतिभा जरूरी है, गर दिल में सुख की इच्छा

चढ़ता वही पर्वत शिखर पर, जिसमे है सशक्त स्वेच्छा |

 

प्रकृति कब कुपित हो लोगों से, कोई नहीं कभी जाने

करते गलती मानव जग में, कभी भूल से अनजाने |

जल प्रलय में डूबे हजारों, मकान थे नदी किनारे

ज़खमी न जाने जितने हुए, कितने अल्ला को प्यारे |

 

मौलिक एवं…

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Added by Kalipad Prasad Mandal on August 23, 2016 at 10:19am — 5 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - गुड़ मिला पानी पिला महमान को ( गिरिराज भंडारी )

गुड़ मिला पानी पिला महमान को

2122    2122    212

********************************

तब नज़र इतनी कहाँ बे ख़्वाब थी

और ऐसी भी नहीं बे आब थी 

 

नेकियाँ जाने कहाँ पर छिप गईं

इस क़दर उनकी बदी में ताब थी

 

गैर मुमकिन है अँधेरा वो करे

बिंत जो कल तक यहाँ महताब थी

 

बे यक़ीनी से ज़ुदा कुछ बात कह

ठीक है, चाहत ज़रा बेताब थी

 

डिबरियों की रोशनी, पग डंडियाँ

थीं मगर , बस्ती बड़ी शादाब थी

 शादाब-…

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Added by गिरिराज भंडारी on August 23, 2016 at 8:30am — 24 Comments

गजल (पुरस्कारों को इंगित) (मनन)

2122 2122 2122 2



मर रहे क्यूँ नाम के अखबार की खातिर

कब बने तमगे कहो फनकार की खातिर।1



लिख रहे जो बात कुछ भी काम आये तो

गर बहें आँसू किसी दरकार की खातिर।2



चाँद-सूरज जल रहे फिर मोम गलती है,

रूठते हैं कब भला उपहार की खातिर।3



बाढ़ आती है जहाँ कुछ- कुछ पनपता है

है कहाँ सब लाजिमी घर-बार की खातिर।4



खुद खुशी हित थी लिखी बहु जन मिताई ही

लिख रहे कुछ लोग निज उपकार की खातिर।5



शोखियों का शौक रखते बदगुमां कुछ…

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Added by Manan Kumar singh on August 23, 2016 at 7:00am — 18 Comments

दीवारें दरकतीं हैं ...(लघुकथा)

मैं जब स्कूल से आयी तो देखा बिशम्भर नाथ जी यानि कि मेरे चाचा जी मेरे सगे चाचा जी ड्राइंग रूम में बैठे माँ के साथ बतिया रहे थे। वही पुरानी खानदान की बातें, पुराने बुआ दादी के किस्से । मैंने देखा उन्होंने कनखियों से एक नज़र मुझ पर भी डाली है।

‘‘बेटा इधर आओ देखो चाचा जी आये हैं’’ मैं माँ की बात को अनसुना करके अपने कमरे में चली गयी। आज मुझे ‘चाचाजी’ शब्द से ही घृणा हो रही थी। जिनकी गोदी में मैं बचपन से खेलती आयी हूं जिनके लिये मैं हमेशा उनकी छोटी सी गुड़िया रही वही इस गुड़िया के शरीर से खेलना…

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Added by Abha saxena Doonwi on August 22, 2016 at 10:00pm — 5 Comments

खूबसूरत जहां

आकाश ,बादल, चाँद, सितारे

लगते है कितने प्यारे प्यारे

बच्चों की कहानियों में आते

युवा के मन को यह है भाते

सुबह और शाम

दिन और रात

चार पहर की चार बाते

चार बातों की चार सौगातें

पेड़ पौधों की अपनी महफ़िल

परिंदों के अपने कलरव

रेंगते कीड़ों की अपनी वाणी

धरा की बढती खूबसूरती

आकाश को महकाती

क्षितिज देखता चहु और से

नदी सागर का बहना

चट्टानों से बहते झरनें

चमकते पत्थर

सूखे पठार

चुभते काँटे

मिट्ठी मीट्टी की… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on August 22, 2016 at 9:23pm — 8 Comments

ग़ज़ल - वो दिल मांगते दिल बसाने से पहले

122 122 122 122



तेरी बज्म में कुछ सुनाने से पहले ।

मैं रोया बहुत गुनगुनाने से पहले ।।



न बरबाद कर दें ये नजरें इनायत ।

वो दिल मांगते दिल बसाने से पहले ।।



है इन मैकदों में चलन रफ्ता रफ्ता ।

करो होश गुम कुछ पिलाने से पहले ।।



तेरे हर सितम से सवालात इतना ।

मैं लूटा गया क्यूँ जमाने से पहले ।।



बदल जाने वाले बदल ही गया तू ।

मुहब्बत की कसमें निभाने से पहले ।।



ख़रीदार निकला है वो आंसुओं का ।

जो आकर गया…

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Added by Naveen Mani Tripathi on August 22, 2016 at 9:00pm — 10 Comments

तीन क्षणिकाएँ

क्षणिका .. १

सूखी पीली झाड़ी सरीखा बाँझ रिश्ता

अँधियाले भरी सांझ में मानो कोई घायल पक्षी

वेदनाओं की नीली गुत्थियाँ खोले

 

क्षणिका .. २

कुम्हलाए साँवले रिश्ते के उदास बगीचे में

सुनता हूँ, "स्नेह अभी भी है"

पर अनस्तित्व को अस्तित्व देती

उस स्नेह में अब मीठी चाशनी नहीं है

क्षणिका .. ३

गहरे अकेले प्रश्नों से बिम्बित

पुराना वेदनामय अस्तित्व ...

बहती है अभी भी रुधिर…

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Added by vijay nikore on August 22, 2016 at 5:00pm — 6 Comments

संतुलन - डॉo विजय शंकर

जोड़-तोड़ खूब कर लेते हो।
जहां तोड़ लेना चाहिए ,
वहीं जोड़ लेते हो ,
समस्या को निपटा नहीं पाते ,
लिपटा लेते हो , गले लगा लेते हो।
उसी का राग अलापते हो ,
गीत गाते हो , छोड़ते नहीं ,
अलबत मौक़ा मिलते ही भुना लेते हो।
जिनको जोड़ लेना चाहिए ,
उन्हें भूले रहते हो।
संतुलन बनाये रखते हो।
कहते हो , राजनीति है ,
कर लेते हो।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on August 22, 2016 at 10:24am — 20 Comments

पुनर्नवा ( लघुकथा)

“चलो भैया घर नहीं चलना है क्या?”

साथी के स्वर सुन,सोच में डूबा मदन, चौंक कर बोला, “हाँ हाँ चलो भाई निकलतें हैं”

सब अपनी-अपनी साईकिल लेकर बढ़ चले, तो साथ ही काम करने वाला राघव, अपनी साईकिल मदन के आगे लगाकर बोला,

“चलिए दद्दा हम भी चलते हैं”

“जिनसे नाता था वो तो कब का छोड़ गए... तू कौन से जन्म रिश्ता निभा रहा है, रे?” साईकिल पर बैठते हुए उसने कहा.

साईकिल बढ़ाते हुए राघव बोला, “दद्दा, उम्र में छोटा हूँ, आपसे कहने का हक तो नहीं है. मगर...”

“पता है तू क्या कहेगा... मगर…

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Added by Seema Singh on August 22, 2016 at 9:00am — 26 Comments

कुछ मुक्तक आँखों पर

अँखियों में अँखियाँ डूब गई,

अँखियों में बातें खूब हुई.

जो कह न सके थे अब तक वो,

दिल की ही बातें खूब हुई.

*

हमने न कभी कुछ चाहा था,

दुख हो, कब हमने चाहा था,

सुख में हम रंजिश होते थे,

दुख में भी साथ निबाहा था.

*

ऑंखें दर्पण सी होती है,

अन्दर क्या है कह देती है.

जब आँख मिली हम समझ गए,

बातें अमृत सी होती है.

*

आँखों में सपने होते हैं,

सपने अपने ही होते हैं,

आँखों में डूब जरा…

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Added by JAWAHAR LAL SINGH on August 22, 2016 at 7:00am — 16 Comments

ग़ज़ल ( क़लम तक न पहुंचे )

ग़ज़ल ( क़लम तक न पहुंचे )

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१२२ --१२२ --१२२ --१२२

वो पहुंचे मगर चश्मे नम तक न पहुंचे ।

हंसी में छुपे मेरे गम तक न पहुंचे ।

इनायत है उनकी मगर खौफ भी है

कहीं  सिलसिला यह सितम तक न पहुंचे ।

कई बार उनसे हुई बात लेकिन

मेरे जज़्बए दिल सनम तक न पहुंचे ।

यही रहबरों चाहती है रियाया

सियासत कभी भी धरम  तक न पहुंचे ।

तसव्वुर नहीं बंदिशें हैं मिलन…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on August 21, 2016 at 5:33pm — 10 Comments

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