For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

All Blog Posts (19,179)

जीवन के तीन कर्त्तव्य

कर्तव्य प्रथम इस जीवन का है ,

मात -पिता की सेवा करना। 

आशीर्वाद उन्हीं का लेकर ,

जीवन पथ पर आगे बढ़ना।।

कर्तव्य दूसरा जगती पर है ,

मानवता की रक्षा करना। 

दया धर्म का भाव सदा ही ,

अपने से छोटों पर रखना।।

कर्तव्य तीसरा यही हमारा ,

देश धर्म के लिये ही जीना। 

बलिदानों के पथ पर बढ़कर ,

मातृ -भूमि की सेवा करना।।

"मौलिक व अप्रकाशित "

Added by chouthmal jain on July 7, 2017 at 10:11pm — 3 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - अजब मासूम है क़ातिल हमारा ( गिरिराज भंडारी )

1222    1222   122

वो दहशत गर्द है या मुस्तफ़ा है

क्या तुमने फैसला ये कर लिया है ?

 

अजब मासूम है क़ातिल हमारा

वो ख़ूँ बारी से अब दहशत ज़दा है

 

तमाशाई के सच को कौन जाने ?

वो सच में मर रहा है, या अदा है

 

वो सारी ख़ूबियाँ पत्थर की रख कर

किया है मुश्तहर... वो.. आइना है

 

कज़ा से बस कज़ा की बात होगी

हमारा बस यही इक फैसला है

 

बहुत दूरी नहीं है, पर चला जो

कभी मस्ज़िद से मन्दिर... हाँफता…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on July 7, 2017 at 10:10pm — 18 Comments

यारियां .../रूठे ...



1. यारियां ...

एक ही पल में कितनी दूरियां  हो जाती हैं

हर नफ़स अश्कों से यारियां  हो  जाती  हैं

धड़कनें ख़ामोश ज़िस्म बेज़ान हो जाता  है

गिरफ़्त में हालात के खुद्दारियां हो जाती हैं

....................................................

2. रूठे ...

न जाने कितने शबाबों की शराब अभी बाकी है

न जाने कितने जख्मों का हिसाब अभी बाकी है

कैसे चले जाएँ भला हम उठ के अभी मैखाने से 

बेवज़ह रूठे हर सवाल का जवाब अभी…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 7, 2017 at 9:30pm — 8 Comments

उम्र

उसने मिलते ही कहा..

उस उम्र से ये उम्र की उम्र हो गई

जाने कहाँ कब कैसे वो उम्र खो गई

मीठे लम्हों से जो निखरी थी

खट्टे लफ्ज़ो से जो बिख़री थी

जहाँ मैं तुं नहीं सिर्फ हम थे

वहाँ हम नहीं सँभल पायें 

चलो फिर कही ढुंढते है

जिस…

Continue

Added by संजय गुंदलावकर on July 7, 2017 at 10:30am — 5 Comments

याद आता तब ख़ुदा जब आसरा कोई न हो

बह्र 2122 2122 2122 212



बे असर हों सब दुआएँ,और दवा कोई न हो

याद आता तब ख़ुदा जब आसरा कोई न हो ||



क्यूँ छुपाती हुस्न अपना हर घड़ी पर्दानशी

हुस्न वो किस काम का गर देखता कोई न हो ||



एक ख़्वाहिश है मेरी यारो ख़ुदा के फ़ज़्ल से

शैर इक ऐसा कहूँ, जैसा कहा कोई न हो ||



कौन आया है यहाँ पीकर,बता आब-ए-हयात

कौन सा घर है बता जिसमें मरा कोई न हो ||



दोष देना हो किसी को,देख लो ख़ुद आइना

ये भी तो सम्भव है कि तुमसे बुरा कोई न हो… Continue

Added by नाथ सोनांचली on July 6, 2017 at 10:39pm — 24 Comments

गजल(गदहा बोला......)

22 22 22 22

*---------------*

गदहा बोला--- हाँक लगायें,

आओ लोगों को भड़कायें।1



मोर बना बैठा है राजा

उसकी कुर्सी को खिसकायें।2



हम भी हो सकते हैं मंत्री

आगे बढ़कर हाथ मिलायें।3



भैंस भली,जब अक्ल मरी हो

कुत्तों को माला पहनायें।4



'चीं चीं' कर दे सकती, चलकर,

'सोन चिरैया' को सहलायें।5



'नीति' नहीं अब प्रीत समझती

कितनी बार गले लग जायें?6



'भालू-कालू' !भेद भुलाकर

आओ एक जमात… Continue

Added by Manan Kumar singh on July 6, 2017 at 7:30pm — 17 Comments

राज़ [ लघुकथा प्रतिभा पाण्डे ]

“ कब से इंतज़ार कर रहा हूँ तेरा I एक राज़ की बात बतानी है I’’ राधा के बाहर आते ही अब्दुल ड्राईवर झट उसके पास आ गया I

“जल्दी बता, बहुत काम पड़ा है I” झटके का कपड़ा कमर में खोंसती राधा बोली I

“ कल तू बता रही थी ना कि मेमसाब आजकल बदली बदली हैं, बहुत मीठा बोलती हैं , टूट फूट में चिल्लाती  भी नहीं हैं I’’

“ हाँ तो ?’’

“दोनों कड़वे करेलों की दरियादिली का राज़ आज खुल गया है I’’ अब्दुल का अंदाज़ भेद भरा था  I

“दोनों मतलब ?’’

“ साहब भी आजकल मीठे हो रहे हैं I…

Continue

Added by pratibha pande on July 6, 2017 at 6:00pm — 9 Comments

'अजय' बीते जमाने में कहीं कुछ छोड़कर आया,

जरा सा सोंचकर देखा तो मुझको याद कर आया,

'अजय' बीते जमाने में कहीं कुछ छोड़कर आया,



सजी यारों की महफिल थी बड़ा बेखौफ बचपन था,

बड़ी मजबूरियों ने रास्तों पर जाल बिछवाया,



ज़माने को समझने की बड़ी पुरजोर कोशिश की,

ज़माने की नसीहत ने ही मुझको और भरमाया,



जिन्हें अपना समझ बैठे थे सारी भूलकर शर्तें,

उन्हीं के कारनामों ने ही मुझको और तड़पाया,



सिवा तेरे जहाँ में और कोई है नहीं मेरा,

मेरे मौला , मेरे मौला तू मेरी रूह में… Continue

Added by Ajay Kumar Sharma on July 5, 2017 at 11:57pm — 6 Comments

कुछ मुक्तक (भाग-5)

मात्रा विन्यास

1222 1222 1222 1222



लगे वो जल परी जैसी, अधर मधु हास बिखराती।

वो तरुणी वारुणी जैसी, नशा नस नस में महकाती।

लगे ज्यों दिव्य मूरत सी, रचा खुद ब्रह्म ने जिसको।

हुई मदहोश महफिल पर, तुरत ही ताजगी आती।



अलग है बात कुछ तुझमें, नहीं हर एक में मिलती।

भरी तू दोपहर जैसी, सुहानी शाम भी लगती।

निशा का मस्त आंचल तू, सुबह की ताजगी तुझमें।

स्वयं शृंगार कर उपमा, तुझे है आरती करती।



है कैसा हाल अब उनका, खबर कोई सुनाये तो।

तड़प मन… Continue

Added by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 5, 2017 at 4:51pm — 4 Comments

ग़ज़ल...गमे दिल अब मुझे आराम दे दो

1222 1222 122
मेरी बेचैनियों को नाम दे दो
बहुत टूटा हूँ अब अंजाम दे दो

उन्हें मैं याद कर के थक चुका हूँ
गमे दिल अब मुझे आराम दे दो

पुरानी बात है आहें, तड़पना
मुहब्बत को नये आयाम दे दो

कि जिसको सोचते ही मुस्कुरा दूँ
तसव्वुर के लिए वो शाम दे दो

कहाँ है मीत वो किस हाल में है
हवाओ कोई तो पैगाम दे दो
(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on July 5, 2017 at 8:48am — 16 Comments

प्रेम ...

प्रेम ...

अनुपम आभास की

अदृश्य शक्ति का

चिर जीवित

अहसास है

प्रेम

मौन बंधनों से

उन्मुक्त उन्माद की

अनबुझ प्यास है

प्रेम

संवादहीन शब्दों की

अव्यक्त अभिव्यक्ति

का असीमित

उल्लास है

प्रेम

निःशब्द शब्दों को

भावों की लहरों पर

मुखरित करने का

आधार है

प्रेम

अपूर्णता को

पूर्णता में परिवर्तित कर

अंतस को

मधु शृंगार से सृजित कर…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 4, 2017 at 9:22pm — 10 Comments

ग़ज़ल-रामबली गुप्ता

ग़ज़ल

1222 1222 1222 1222



जो लड़कर आँधियों से जीत का इनआम लेता है

ज़माना फ़ख्र से उसका युगों तक नाम लेता है



सहारा जो यहाँ हर डूबते इन्सां का बन जाये

खुदा भी हाथ उसका मुश्किलों में थाम लेता है



दुआओं की कमी होती नहीं उसको कभी यारों

बज़ुर्गों का यहाँ जो हाल सुबहो-शाम लेता है



पता सबको है मुश्किल की घड़ी होती बहुत छोटी

कहाँ हर आदमी हिम्मत से लेकिन काम लेता है



खुदा को भी शिकायत होगी शायद अपने बन्दे से

कि वो है खुदग़रज़ दुख… Continue

Added by रामबली गुप्ता on July 4, 2017 at 11:30am — 21 Comments

रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़



यारों में जब रंजिश होने लगती है

चुपके चुपके साज़िश होने लगती है



आँखों में जब सोज़िश होने लगती है

रिम झिम रिम झिम बारिश होने लगती है



बाबू जी का साया सर से उठते ही

धरती की पैमाइश होने लगती है



तुम जब मेरे साथ नहीं होते जानाँ

मुझ पर ग़म की यूरिश होने लगती है



मुझसे कोई काम अटक जाता है जब

उनको मेरी काविश होने लगती है



जब जब भी मैं नाम तुम्हारा लिखता हूँ

हाथों में क्यूँ लरज़िश… Continue

Added by Samar kabeer on July 4, 2017 at 12:07am — 39 Comments

तुम्हारे हृदय में ....

तुम्हारे हृदय में ...

ये

समय ठहरा था

या कोई स्मृति

वाचाल बन

मेरी शेष श्वासों के साथ

चन्दन वन की गंघ सी

मुझे

कुछ पल और

जीवित रखने का

उपक्रम कर रही थी

ये

समय का कौन सा पहर था

मैं पूर्णतयः अनभिज्ञ था

अपनी क्लांत दृष्टि से

धुंधली होती छवियों में

स्वयं को समाहित कर

अपने अंत को

कुछ पल और

जीवित रखने का

असफ़ल

प्रयास कर रहा था

शायद किसी के

इंतज़ार में

तुम…

Continue

Added by Sushil Sarna on July 3, 2017 at 6:00pm — 8 Comments

पढ़ा हुआ पाठ

"आ गए साहबजादे!" माँ के चुप रहने के इशारे के बाद भी शाम ढ़ले घर में घुसते ही, उसके पिता का बड़बड़ाना शुरू हो गया। "जाने कहाँ आवारागर्दी करता फिरता है ये लड़का सारा दिन।"



"कुछ गलत न करे है मेरा बेटा, अब किताबों में भी कितनी मगजमारी करे, कुछ देर दोस्तों में गुजार आवे है तो हर्ज ही क्या है?" माँ ने उसकी तरफदारी की कोशिश की।



"तो वही जाहिल लोग रह गए है दोस्ती के लिए।" पिता ने माँ को भी डांट की लपेट में ले लिया।



"पिताजी, अब ऐसे भी जाहिल न है वे लोग।" वह चुप न रह… Continue

Added by VIRENDER VEER MEHTA on July 3, 2017 at 10:39am — 6 Comments

गरीबी - उपचार -- डॉo विजय शंकर

किसी ने गरीब को
एक जोड़ी चप्पल दिला दी
किसी ने भूखे को एक वक़्त
शानदार रेस्त्रां में रोटी खिला दी ,
रेस्त्रां के मालिक ने
खाने के पैसे नहीं लिए
कहा , मानवता के पैसे नहीं लगते ,
कुछ इस तरह एक छोटे गरीब ने
एक बड़े गरीब की गरीबी मिटा दी ।

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on July 3, 2017 at 10:12am — 12 Comments

हृदय-सम्बन्ध .... क्षणिकाएँ

१.

अर्थहीन प्रश्नों के

चकरदार अर्थ

अर्थहीन न तो क्या होंगे

घेर लेते हैं मुझको

छेड़ी हुई मधुमक्खियों की तरह

अब मुंद जाने दो आँखें

बन्द कर दो किवाड़

             -----

२.

कोमल पत्तों पर अटकी

प्रांजल बूँदें ...

अपनी ही गढ़ी हुई 

वेदना का विस्तार

शायद ... तुम ...

मन के गहरे में कुछ

पल्लवित होना चाहता है

            -----

३.

कभी ऐसा भी तो होता…

Continue

Added by vijay nikore on July 3, 2017 at 8:29am — 14 Comments

किसान /मुक्तक

(1) सूखा हुआ किसान को दाना बना दिया ,
फिर ख़ुदकुशी का एक बहाना बना दिया ,
अब कहते अन्नदाता उसे शर्म आती है ,
भूख और मुफ़लिसी का तराना बना दिया ।
(2) अरमानों को कफ़न में सजाता किसान है,
अब ख़ुद ही अपनी लाश उठाता किसान है,
गोली पुलिस की खाए कि फ़ाकों से वो मरे,
मय्यत का रोज़ जश्न मनाता किसान है ।
मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on July 2, 2017 at 11:00pm — 10 Comments

रिश्ता (कविता)

प्यार चाहे कोई रिश्ता
कोई चाहे दिखावा

कहीं होता व्यापार रिश्तों का
कहीं ढ़ोल है पीटे जाते

कभी निकल जाता है जीवन
ताना बाना बुनने में

एक शब्द है पर
अर्थ है कितने


रिश्तों की तरह
अद्भुत , अटल सत्य की तरह

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on July 2, 2017 at 11:00pm — 6 Comments

ग़ज़ल

*221 2121 1221 212*



किस्मत ने उस के साथ करिश्मा नहीं किया ।

जिसने कभी वफ़ा से किनारा नहीं किया ।।



रहना पड़ा उसी के बज़्म में तमाम उम्र ।

जिसने हमारा साथ गवारा नहीं किया ।।



कितनी मिली जफ़ा है मुहब्बत के वास्ते ।

तुमने कभी हिसाब पे चर्चा नहीं किया ।।



कानून पास हो चुके मुद्दों के नाम पर ।

किसने कहा करों में इजाफा नहीं किया ।।



लुटती है आबरू जो सरेआम शह्र में ।

कहते हैं लोग हुस्न पे परदा नहीं किया ।।



शायद कोई ख़ता… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on July 2, 2017 at 4:15pm — 8 Comments

Monthly Archives

2026

2025

2024

2023

2022

2021

2020

2019

2018

2017

2016

2015

2014

2013

2012

2011

2010

1999

1970

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"  उत्साहित बने रहने और सतत चलते रहने के सुझाव से निस्सृत होती सकारात्मकता का आयाम आश्वस्तिकारी…"
Monday
धर्मेन्द्र कुमार सिंह replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"जब कविता कोश चल सकता है तो ओबीओ क्यूँ नहीं। वहाँ भी शुरू में जो लोग थे आज नहीं हैं। नए-नए लोग…"
Saturday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"चर्चा में आपकी उपस्थिति तथा आपके भावमय शब्दों का स्वागत है आदरणीय मिथिलेश जी. "
Saturday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post "प्यारी दुश्मन" -[लघु कथा] (18)
"मेरी इस रचना के अवलोकन हेतु पाठकों को हार्दिक धन्यवाद।"
Friday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post "शह और शिकस्त" - [लघुकथा] 25 (शतरंज संदर्भित) - शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"मेरी इस रचना पर 446 अवलोकन हेतु हार्दिक आभार पाठकों के प्रति।"
Friday
Sheikh Shahzad Usmani commented on Sheikh Shahzad Usmani's blog post सूरज के तेवर (लघुकथा) [छंदोत्सव-58 चित्र से प्रेरित] /शेख़ शहज़ाद उस्मानी
"रचना पटल पर उपस्थिति, समीक्षात्मक टिप्पणी और सवाल हेतु हार्दिक धन्यवाद आदरणीया कान्ता रॉय जी। मेरी…"
Friday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
" सादर नमस्कार आदरणीय मंच। कुछ अन्य सुझाव: 1- सदस्यों से सहयोग राशि एकत्रित कर ओबीओ की पत्रिका…"
Jun 1
आशीष यादव replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"अच्छा सुझाव"
Jun 1
Gajendra shrotriya replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"प्रतिष्ठित मंच के सभी सम्माननीय सदस्यों को सादर प्रणाम🙏ओ बी ओ परिवार के समक्ष बनी इस विषम परिस्थिति…"
May 31
Manjeet kaur replied to Admin's discussion अति आवश्यक सूचना : कृपया अवश्य अवगत हों .....
"ओ बी ओ मंच से बहुत कुछ सीखने को मिला इसके बंद होने की खबर दुखद और पीड़ादाई लगी। अजय गुप्ता जी की…"
May 30
Manjeet kaur commented on धर्मेन्द्र कुमार सिंह's blog post रहना हो भारत में जिंदा, चुप रहिए (ग़ज़ल)
"धर्मेंद्र कुमार जी आज के मुश्किल दौर में इतना जिगरा ! यथार्थ और सटीक वर्णन के लिए बहुत बहुत बधाई"
May 30
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा सप्तक. . . .मंच

दोहा सप्तक. . . . . मंचअभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।यह जग…See More
May 30

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service