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मात्रा विन्यास
1222 1222 1222 1222

लगे वो जल परी जैसी, अधर मधु हास बिखराती।
वो तरुणी वारुणी जैसी, नशा नस नस में महकाती।
लगे ज्यों दिव्य मूरत सी, रचा खुद ब्रह्म ने जिसको।
हुई मदहोश महफिल पर, तुरत ही ताजगी आती।

अलग है बात कुछ तुझमें, नहीं हर एक में मिलती।
भरी तू दोपहर जैसी, सुहानी शाम भी लगती।
निशा का मस्त आंचल तू, सुबह की ताजगी तुझमें।
स्वयं शृंगार कर उपमा, तुझे है आरती करती।

है कैसा हाल अब उनका, खबर कोई सुनाये तो।
तड़प मन की मेरे जाकर, कोई उनको बताये तो।
दरस की आस ले मन में, पड़ा मैं द्वार पर उनके।
झलक बस एक दिलवर की, कोई मुझको दिखाये तो।

तेरे दीदार में जाना, न जाने बात कैसी है।
तू जैसे जाम रिंदों का, सुबह के चाय जैसी है।
तृषा मन की बुझी मेरे, तुम्हारी इक झलक पाकर।
मैं चातक प्यास से व्याकुल, तू स्वाती बूंद जैसी है।

इबादत हो अगर सच्ची, प्रकट तो ईश हो जाते।
पुकारा था उन्हें दिल से, तो क्योंकर वो नहीं आते।
तड़प धरती की सच्ची थी, समंदर में दिखा अंबर।
कि यूं ही दरम्यां दिल के, नजर दिलवर मेरे आते।

शुकूनोचैन छीना है, तुम्हारी याद ने प्रियवर।
चुरायी नींद आंखों से, तेरे अंदाज ने प्रियवर।
तू जीनत है अमानत है, अजब नायाब मोती है।
भरा है रंग जीवन में, हमारे आप ने प्रियवर।

मौलिक वह अप्रकाशित

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Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 10, 2017 at 6:38pm
आदरणीय समर कबीर सर! मुक्तक पर अपना बहुमूल्य समय देने के लिये आपका भूरिशः आभार। आपने विस्तृत रूप से दोषों की तरफ संकेत किया है। उसे दूर करने की कोशिश करता हूँ। सादर
Comment by विन्ध्येश्वरी प्रसाद त्रिपाठी on July 10, 2017 at 6:36pm
आदरणीया प्राची दीदी! मुक्तक पर अपना बहुमूल्य समय देने के लिये आपका भूरिशः आभार। जो कुछ दोष रह गया है उसे दूर करने की कोशिश करता हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 7, 2017 at 3:20pm
जनाब त्रिपाठी जी आदाब,मुक्तक लिखने का अच्छा प्रयास हुआ है,इसके लिए बधाई स्वीकार करें ।

पहले मुक्तक की दूसरी पंक्ति में 'नशा नस नस में महकाती',नशा महकाती प्रयोग सही नहीं लगता,'नशा नस नस में दौड़ाती होना चाहिये था ।

दूसरे मुक्तक में 'मिलती','लगती','करती' की तुकान्तता सही नहीं है ।

चौथे मुक्तक में 'जाना'को "जानाँ"कीजिये,और इस मुक्तक की दूसरी और चौथी पंक्ति में 'जैसी'के साथ 'जैसी'की तुकान्तता सही नहीं है।
इसी तरह पांचवें मुक्तक में भी तुकान्तता सही नहीं है ।

आख़री मुक्तक में तुकान्तता है ही नहीं,बस चारो पंक्तियां अलग अलग हैं,दूसरी बात ये कि पहली पंक्ति में 'शुकूनो चेन' आपने ग़लत लिखा है इसे इस तरह लिखिये "सुकून-ओ-चेन",'तू जीनत'नहीं "तू ज़ीनत" और तीसरी पंक्ति में 'तू' और चौथी में 'आप'इसे उर्दू में शुतरगुर्बा का दोष कहते हैं ।
अभी आपको बहुत अभ्यास की ज़रूरत है,इस सम्बन्ध में मंच पर मौजूद आलेख पढिये ।

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on July 7, 2017 at 2:57pm

सभी मुक्तक बहुत सुन्दर हुए है प्रिय विन्ध्येश्वरी भाई 

बहुत खूबसूरत सौम्य शृंगार का निर्वहन सबमें 

बस अंतिम मुक्तक में काफिये फिर से देख लीजियेगा 

मेरी दिली बधाई इन मुक्तकों पर 

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