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ग़ज़ल-नूर की -ईमान छोड दूँ तो क़िरदार मार देगा,

२२१२ १२२ २२१२ १२ २

.

ईमान छोड दूँ तो क़िरदार मार देगा,

इस पार बच गया तो उस पार मार देगा.

.

आदत सी पड़ गयी है अब नफ़रतों की मुझ को

इतना न मुझ को चाहो ये प्यार मार देगा.

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कितना बचाऊँ लेकिन है तज्रबा... मुकद्दर,

इक रोज़ मेरे सर पर दीवार मार देगा.

.

ये हक़ बयानी का इक औज़ार था मगर अब,

सच बोल दे कलम गर अख़बार मार देगा. 

.

कोचिंग की आशिक़ी में वह मुँह चिढ़ाता शनिचर,

लगता था जैसे हम को इतवार मार देगा.

.  

बोली बढ़ा घटा…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 8, 2018 at 9:00pm — 15 Comments

प्रवासी पीड़ा(कविता )

प्रवासी पीड़ा

शहर पराया गाँव भी छूटा

चाँदी के चंद टुकड़ों ने

हमको लूटा-हमको लूटा-हमको लूटा |

भूख खड़ी थी जब चौखट पे

कदम हमारे निकल पड़े थे

मिल गई रोटी शहर में आकर

पर अपनों का अपनेपन का

हो गया टोटा-हो गया टोटा-हो गया टोटा |

माल कमाया सबने देखा

रात जगे को किसने देखा

मेहमां-गाँव से ना उनको रोका

एक कमरे की ना मुश्किल समझी

दिल का हमको 

कह दिया छोटा-कह दिया छोटा-कह दिया छोटा…

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Added by somesh kumar on March 8, 2018 at 6:07pm — 2 Comments

ग़ज़ल (वो लगता है आफ़ात करने चले हैं )

(फ़ऊलन--फ़ऊलन--फ़ऊलन--फ़ऊलन)



शुरूए इनायात करने चले हैं |

वो लगता है आफ़ात करने चले हैं |



ख़ुदा ख़ैर पाबंदियाँ हैं नज़र पर

मगर वो मुलाक़ात करने चले हैं |



यक़ीं ही नहीं उम्र ढलने का उनको

जो तब्दील मिर आत करने चले हैं |



खिलाना है फ़िरक़ा परस्तों को मुंह की

वो लोगों फ़सादात करने चले हैं |



मुहब्बत के अंजाम से हैं वो ग़ाफ़िल

जो इसकी शुरुआत करने चले हैं |



भला किस तरह कर दें उसको नुमायाँ

सनम से जो हम बात करने चले हैं…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 8, 2018 at 5:00pm — 18 Comments

दे सोच कर सज़ाएं गुनहगार हम नहीं - सलीम रज़ा रीवा

221   2121   1221   212 

दे सोच कर सज़ाएं गुनहगार हम नहीं

ये तू भी जानता है ख़तावार हम नहीं

-

जिस पर किया भरोसा वही दे गया  दगा

लेकिन किसी भी शख़्स से बे-ज़ार हम नहीं

-

दिल तो दिया था जान भी तुझपे निसार की

फिर क्यूँ  तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं    

-

जिनकी खुशी के वास्ते सब कुछ लुटा दिया

उफ़ वो ही कह रहे हैं वफादार हम नहीं

-

हैरत है दिल के पास थे जिनके सदा 'रज़ा'

अब तो उन्ही के प्यार के हक़दार हम नहीं

____________________

मौलिक व…

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Added by SALIM RAZA REWA on March 8, 2018 at 2:58pm — 15 Comments

खूंटे (लघुकथा) राहिला

"अरे चमनलाल...! आओ-आओ भैया!कितने वर्षों बाद , गांव का रास्ता कैसे भूल गए ? " खुशी से झूमते हुए उसने , उसको कसकर गले लगा लिया।

"बस भैया चले ही आ रहे हैं , अरे...! घर में सन्नाटा सा पसरा है, कोई है नहीं का?" उसने बाखर का सरसरी तौर पर मुआयना करते हुए कहा।

"है ना..., तुम्हारी भाभी हैं भीतर,

अरे सुनती हो! चमनवा आया है ,जरा बढ़िया सी चाय तो बना लाओ दुई कप।"

"और बहुएँ कहाँ हैं ?"

" बड़ी , आंगनबाड़ी में सुपरवाइजर हो गयी है , छोटी तो मास्टरनी थी ही। आती होंगीं समय तो हो…

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Added by Rahila on March 8, 2018 at 12:30pm — 17 Comments

ग़ज़ल- सारथी || फूलों में नाज़ुकी कहाँ है अब ||

फूलों में नाज़ुकी कहाँ है अब

थी कभी ताज़गी कहाँ है अब

आज कल इश्क़ तो दिखावा है

आशिक़ी आशिक़ी कहाँ है अब

शक्ल-सूरत तो पहले जैसी है

आदमी आदमी कहाँ है अब

अब नुमाइश है सिर्फ चेह्रों की

हुस्न में सादगी कहाँ है अब

चाँद अब दूधिया नहीं दिखता

रात भी शबनमी कहाँ है अब

लोग बाहर से मुस्कुराते हैं

यार सच्ची हँसी कहाँ है अब

जो समंदर को ढूंढ़ने निकले

ऐसी अल्हड़ नदी कहाँ है अब

छाँव भी बदली बदली लगती है

धूप भी धूप सी कहाँ है…

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Added by Saarthi Baidyanath on March 8, 2018 at 11:56am — 3 Comments

ग़ज़ल- सारथी || ख़बर तो कागज़ों की कश्तियाँ दे जाएँगी मुझको ||

ख़बर तो कागज़ों की कश्तियाँ दे जाएँगी मुझको

ये लहरें ही तुम्हारी चिठ्ठियाँ दे जाएँगी मुझको

लिखे थे जो दरख्तों पर अभी तक नाम हैं कायम 

ख़बर ये भी कभी पुरवाईयाँ दे जाएँगी मुझको

कभी तो बात मेरी मान जाया कर दिले-नादां

तेरी नादानियाँ दुश्वारियाँ दे जाएँगी मुझको

बिछुड़ जाने का डर मुझको नहीं डर है तो ये डर है 

न जाने क्या न क्या रुस्वाईयां दे जाएँगी मुझको

तुम्हीं को भूल जाऊं मैं अजी ये हो नहीं सकता 

तुम्हारी यादें आकर हिचकियाँ दे जाएँगी…

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Added by Saarthi Baidyanath on March 8, 2018 at 11:51am — 12 Comments

नारी दिवस के दोहे - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

माता भगिनी  संगिनी, सुता  रूप  में नार

विपदा दुख पीड़ा सहे, बाँटे लेकिन प्यार।१।



रही जन्म से नार तो, सदा शक्ति का रूप

समझे कैसे खुद रहा, मर्द हवस का कूप।२।



जो नारी का नित करें, पगपग पर सम्मान

संतो सा उनका रहा, सचमुच चरित महान।३।



नारी को जो  कह गये, यहाँ  नरक का द्वार

सब जन उनको जानिए, इस भू पर थे भार।४।



मुझ मूरख का है नहीं, गीता का यह ज्ञान

देवों से बढ़  नार का, कर  मानव सम्मान।५।



बन जायेगा सच कहूँ,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 8, 2018 at 11:30am — 15 Comments

महामूर्ख  -  लघुकथा  –

महामूर्ख  -  लघुकथा  –

"दुर्योधन, तुम इस विश्व के सबसे बड़े मूर्ख हो, महामूर्ख"।

"माते, आप यह कैसी भाषा बोल रही हैं? मैं तो सदैव ही आपका सबसे प्रिय पुत्र रहा हूँ"।

"मगर आज तुमने अपने आप को  महामूर्ख प्रमाणित कर दिया"।

"माँ, आप इस साम्राज्य की महारानी हैं।मैं आपका अपमान नहीं करना चाहता , लेकिन आपकी यह कटु वाणी मेरी सहनशीलता को धैर्यहीन बना रही है"।

"दुर्योधन, तुमने अपनी माँ के आदेश की अवज्ञा करके अपनी मृत्यु को स्वंय दावत दी है"।

"मैंने जो कुछ भी किया…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 7, 2018 at 9:29pm — 16 Comments

शरणार्थी(लघुकथा)

दो मित्र आपस में बातें कर रहे थे;एक मानवतावादी था और दूसरा समाजवादी।पहले ने कहा-
अरे भई!वो भी आदमी हैं,परिस्थिति के मारे हुए।बेचारों को शरण देना पुण्य-परमार्थ का काम है।
दूसरा:हाँ तभी तक,जबतक यहाँ के लोगों को शरणार्थी बनने की नौबत न आ जाये।

"मौलिक व अप्रकाशित"

Added by Manan Kumar singh on March 7, 2018 at 8:25pm — 8 Comments

आदमी एवं नदी (कविता )

आदमी और नदी

पहाड़ों से निकलतीं थीं झूम-झूम कर

खो जाती थीं एक-दुसरे में घूम-घूम कर

विशद् धारा बन जाती थी

 एक नदी कहलाती थी

समुंदर में जाकर प्रेम करती सुरूप

हो जाती एकरूप |

आदमी भी कुछ ऐसा था

स्वीकारता दुसरे को

चाहे दूसरा जैसा था

आदमी होना प्रथम था

बाद में ज़मीन-पैसा था |

आदमी का मेल-मिलाप /सभ्यता रचता था

इसी तरह एक राज्य/एक देश बसता था |

बाद में नदी को जरूरत के…

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Added by somesh kumar on March 7, 2018 at 8:00pm — 3 Comments

पुल (लघुकथा)

एक बहुत बड़े जमींदार थे। उनका कुनबा भी बहुत बड़ा था। उनकी जमीन से होकर एक सोता बहता था। सोते के दूसरी तरफ भी कुनबे के कुछ लोग रहते थे। जिनसे यदा कदा ही मिलना हो पाता था।



सरकार ने जब जमींदारी जब्त करनी शुरू की तो जमींदार साहब को अपने धन का अपने लोगों के लिए सदुपयोग करने का उपाय सूझा। उन्होंने सरकार के तय मापदंड के अलावा बचे धन से उस सोते पर एक पुल बनवा दिया। ताकि कुनबे के लोग आपस में मिलते जुलते रहें। जम्हूरियत में संख्या बल का अपना ही महत्व है ये बात वह खूब समझते थे।



पुल…

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Added by Kumar Gourav on March 6, 2018 at 10:00pm — 7 Comments

ग़ज़ल नूर की- ज़ालिम तुझ से डरे नहीं हैं..

22/ 22/ 22/ 22

ज़ालिम तुझ से डरे नहीं हैं,

हारे हैं .....पर मरे नहीं हैं.

.

और कुछ इक दिन ज़ुल्म चलेगा,

अभी पाप-घट भरे नहीं हैं. 

.

खोट है उस की नीयत में कुछ

पूरे हम भी खरे नहीं हैं.

.

कौन सी जन्नत कैसी क़यामात

ये सब मौत से परे नहीं हैं.

.

कहते हैं वो अपने मन की

पर मन की भी करे नहीं हैं.

.

गर्दभ होते ...घास तो चरते

साहिब.. घास भी चरे नहीं हैं.

.

बोल रहे हैं अपने कलम से

“नूर जी” चुप्पी धरे…

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Added by Nilesh Shevgaonkar on March 6, 2018 at 9:33pm — 11 Comments

बैजनाथ शर्मा ‘मिंटू’ - लिख रहें हैं ग़ज़ल कहानी में......

अरकान- 212 212 12 22

 

बात कहनी थी जो ज़ुबानी में|

लिख रहें हैं ग़ज़ल कहानी में|

 

फूल-ख़त संग लाख दर्दोगम 

उसने हमको दिये निशानी में|

 

देवता बन के आये हैं मेहमां  

कुछ कसर हो न मेज़बानी में |

 

प्यार रुसवा मेरा भी हो जाता

जिक्र करता अगर कहानी में |

 

सर्द मौसम में गर गिरा पल्लू 

आग फिर तो लगेगी पानी में |

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on March 6, 2018 at 8:30pm — 5 Comments

आमूल-चूल भूल (लघुकथा)

महाविद्यालयीन कक्षा में छात्रों के अनुरोध पर हिन्दी के शिक्षक उन्हें "भूल, ग़लती, और भूलना" शब्दों में अंतर समझाते हुए बोले - "भूतकाल में अज्ञानता वश किया गया कोई भी कार्य या क्रिया जिसके कारण वर्तमान या भविष्य में हानि उठानी पड़े 'भूल' कहलाती है! 'भूल' का हिन्दी में अर्थ होता है “गलती या दोष”; इस शब्द का इस्तेमाल अक्सर “चूक” शब्द के साथ किया जाता है!" कुछ उदाहरणों सहित समझाने के बाद शिक्षक ने छात्रों से कुछ और उदाहरण प्रस्तुत करने को कहा। 'भूल' पर कुछ जवाब यूं भी रहे :



"जैसे अमर…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 6, 2018 at 8:30pm — 8 Comments

आप मेरी बेबसी पर मुस्कुराते जाइये

2122 2122 2122 212



इस नए हालात पर तुहमत लगाते जाइये ।

आप मेरी बेबसी पर मुस्कुराते जाइये ।।

आंख पर पर्दा अना का खो गयी शर्मो हया ।।

रंग गिरगिट की तरह यूँ ही दिखाते जाइये ।।

तिश्नालब हैं रिन्द सारे मैकदा है आपका ।

जाम रब ने है दिया पीते पिलाते जाइये ।।

इस चिलम में आग है गम को जलाने के लिए ।

फिक्र अपनी भी धुएँ में कुछ…

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Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2018 at 8:00pm — 3 Comments

मौन-संबंध

मौन-संबंध

असीम अँधेरी रात

भस्मीली परछाईं भी जहाँ दीखती नहीं

और न ही कहीं से वहाँ

कोई प्रतिध्वनि लौट कर आती है ...

इस अपार्थ रात में

छज्जे पर बैठी दूर तक तकती…

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Added by vijay nikore on March 6, 2018 at 1:24pm — 15 Comments

शिक्षा - लघुकथा –

शिक्षा - लघुकथा –

 "माँ, मैं भी होली खेलने जाऊं क्या? बस्ती के सब बच्चे होली खेल रहे हैं"।

"नहीं रेशमा,नहीं मेरी बच्ची, तेरे पास फ़टे पुराने कपड़े तो हैं नहीं। मुश्किल से एक जोड़ी तो कपड़े हैं, उन्हें भी होली में खराब कर लेगी तो कल से स्कूल कैसे जायेगी"?

"माँ, यह कैसा मज़ाक़ है, दिवाली पर कहती हो कि तुम्हारे पास नये कपड़े नहीं हैं इसलिये घर से मत निकलो। और होली पर कहती हो तुम्हारे पास पुराने कपड़े नहीं हैं,  सो होली मत खेलो"?

"क्या करें मेरी बच्ची, ऊपरवाले ने हम गरीबों के…

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Added by TEJ VEER SINGH on March 6, 2018 at 11:24am — 10 Comments

जब भी मेरे क़रीब आओगे - असरार धारवी

2122 1212 22
जब भी मेरे क़रीब आओगे
अपनी हस्ती को भूल जाओगे
.
है वफ़ा क्या यह जान जाओगे
दिल अगर हम से तुम लगाओगे
.
मुस्कुराता लगेगा जग सारा
आप जब दिल से मुस्कुराओगे
.
सोच लो खूब इश्क़ से पहले
ज़िन्दगी दांव पर लगाओगे
.
ज़िन्दगी की किताब मत खोलो
उसमें असरार कुछ न पाओगे
_____________________
मौलिक व अप्रकाशित

Added by ASRAR DHARVI on March 6, 2018 at 10:17am — 5 Comments

लघुकथा--माँ

बड़े बेटे ने माँ के फटे पुराने कपड़े इकट्ठे किए । दूसरा बेटा चश्मा और छड़ी ढूँढकर लाया । तीसरे ने दवाई की शीशी और पुड़ियाँ अलमारी से निकाली । छोटी बहू कड़वा ताना देती हुई बोली-" जाने कब मरेगी । लगता है कोई अमर बूटी खाकर आई है ।" चारों मिलकर माँ को वृद्धाश्रम छोड़ आए । अब चारों ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला -चिल्लाकर सभी को बता रहे हैं कि माँ अपनी राजी-मर्जी से हमेशा के लिए अपनी बेटी के घर चली गईं ।

मौलिक एवं अप्रकाशित ।

Added by Mohammed Arif on March 6, 2018 at 8:00am — 16 Comments

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