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ग़ज़ल- सारथी || फूलों में नाज़ुकी कहाँ है अब ||

फूलों में नाज़ुकी कहाँ है अब
थी कभी ताज़गी कहाँ है अब

आज कल इश्क़ तो दिखावा है
आशिक़ी आशिक़ी कहाँ है अब

शक्ल-सूरत तो पहले जैसी है
आदमी आदमी कहाँ है अब

अब नुमाइश है सिर्फ चेह्रों की
हुस्न में सादगी कहाँ है अब

चाँद अब दूधिया नहीं दिखता
रात भी शबनमी कहाँ है अब

लोग बाहर से मुस्कुराते हैं
यार सच्ची हँसी कहाँ है अब

जो समंदर को ढूंढ़ने निकले
ऐसी अल्हड़ नदी कहाँ है अब
छाँव भी बदली बदली लगती है
धूप भी धूप सी कहाँ है अब

एक दीवाना सा जो शायर था
हाँ वही 'सारथी' कहाँ है अब

.............................................
सर्वथा मौलिक व अप्रकाशित

अरकान: २१२२ १२१२ २२ 

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Comment by Baidyanath Saarthi on March 9, 2018 at 11:08am

जनाबे  Samar kabeer साहिब, आदाब ! आपका आशीर्वाद बना रहे , शुभेच्छा सहित ! 

Comment by Samar kabeer on March 8, 2018 at 11:42pm

जनाब सारथी जी आदाब,ये ग़ज़ल भी उम्दा है, दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।

Comment by Mohammed Arif on March 8, 2018 at 9:05pm

आदरणीय बैद्यनाथ जी आदाब,

                     बहुत ही अच्छे अश'आरों से सजी ग़ज़ल । शे'र दर शे'र दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल कीजिए । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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