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ग़ज़ल -कि सरकार भी मोतबर आपकी है-- ( गिरिराज भंडारी )

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जिधर भी मैं जाऊँ डगर आपकी है

हवा मे फज़ा में ख़बर आपकी है



महज़ रात थी आपके हक़ में लेकिन

सुना है कि अब हर पहर आपकी है

 

हरिक पुत्र को मुफ़्त मिलती है ममता

तो, ममता भी अब उम्र भर आपकी है

 

रपट कौन लिक्खे सभी आपके हैं

कि सरकार भी मोतबर आपकी है

 

ज़ियारत करें ना करें आप लेकिन

सियासत पे टेढ़ी नज़र आपकी है

 

नज़ीर आपकी अब मैं दूँ भी तो कैसे

हरी-सावनी सी नज़र आपकी…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 12, 2017 at 10:30am — 13 Comments

ग़ज़ल,,

वज़्न : 1222 1222 1222 1222

मिलेंगी कुर्सियाँ लेकिन सियासी फ़न ज़रूरी है ।।

जुटाना है अगर बहुमत लचीलापन ज़रूरी है ।।(1)



कई पतझड़ यहाँ आके गये अफ़सोस मत करिये,

बहारों के लिए हर साल में सावन ज़रूरी है ।।(2)



हवाओं नें कसम खा ली जले दीपक बुझाने की,

उजाला ग़र बचाना है खुला दामन ज़रूरी है ।।(3)



वफ़ा की बात करते हो मियाँ इस दौर में तुम भी,

जहाँ शतरंज की बाज़ी बिछी हो धन ज़रूरी है ।।(4)



अगर कोई कहे तुमसे बताओ प्यार के मानी,…

Continue

Added by कवि - राज बुन्दॆली on January 11, 2017 at 11:30pm — 12 Comments

दफ्तर को अपने घर मे भी सहचर बना दिया

221 2121 1221 212 पर एक प्रयास

दफ्तर को अपने घर मे भी सहचर बना दिया
वो वक्त अपना और भी बद्तर बना दिया

जब तक रहा वो गांव मे संजीदा हीं रहा
शहरों ने उसको तोड़के पत्थर बना दिया

चैनो अमन की बात हीं करता था जो, उसे
दंगों की फैली आग ने कट्टर बना दिया

जबसे चुनावी रैलियाँ होने लगी यहां
सुंदर सलोना गांव थियेटर बना दिया

बिखरी हुई पड़ी थी जो भी ख्वाहिशें मेरी
फिलहाल उनको जोड़ के गट्ठर बना दिया
मौलिक तथा अप्रकाशित

Added by Abhishek kumar singh on January 11, 2017 at 10:12pm — 12 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
शांत है सोया हुआ जल --(गीत)-- मिथिलेश वामनकर

उफ़! करो कोई न हलचल,

शांत सोया है यहाँ जल ।

 

नींद गहरी, स्वप्न बिखरे आ रहे जिसमें निरंतर।

लुप्त सी है चेतना,  दोनों दृगों पर है पलस्तर।

वेदना, संत्रास क्या हैं? कब रही परिचित प्रजा यह?

क्या विधानों में, न चिंता, बस समझते हैं ध्वजा यह।

कौन, क्या, कैसे करे?  जब,

हो स्वयं निरुपाय-कौशल।

 

पीर सहना आदतन, आनंद लेते हैं उसी में।

विष भरा जिस पात्र में मकरंद लेते हैं उसी में।

सूर्य के उगने का रूपक, क्या तनिक भी ज्ञात…

Continue

Added by मिथिलेश वामनकर on January 11, 2017 at 3:00pm — 27 Comments

जूते की जुबानी (हास्य व्यंग्य)

मैं बेबस लाचार पड़ा, अपनी बात बताता हूँ |

मैं जूता सुन यार तुझे, किस्से आज सुनाता हूँ ||



शोभा नही हमारे बिन, राजा या रँक फकीर की |

हम चरणों के दास हुए, माया यहीं तकदीर की।



हमें पहन इंसान यहाँ, काँटों पर भी चलते हैं |

राह भले हो पथरीली, कदम नहीं ये रुकते हैं ||



इंसाँ तुच्छ समझता है, गिनता हमको रद्दी भर |

भूल गया इतिहास सभी, हम बैठे थे गद्दी पर ||



चौदह वर्षों तक हम भी, अवध देश की शान रहे |

शीश झुकाते श्रद्धा से, देते सब सम्मान… Continue

Added by नाथ सोनांचली on January 11, 2017 at 2:30pm — 14 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
सारे जहाँ को आप तो नादाँ समझते हैं

221 2121 1221 212

सारे जहाँ को आप तो नादाँ समझते हैं

हद ये है अपने आप को इंसाँ समझते हैं

 

अह्ल ए अदब जो चमके है औरों के ताब से

खुद को मगर वो लाल ए बदख़्शाँ समझते हैं

 

आमाल में हमारे ही कमियाँ न हों जनाब

शैतान को भी लोग मुसलमाँ समझते हैं

 

बातों से जब न बात बनी, सर झुका लिया

धोखे में हैं जो उसको पशेमाँ समझते हैं

 

फिरती है वो हलक में लिए जान, और आप

कुत्तों के बीच जीने को आसाँ समझते…

Continue

Added by शिज्जु "शकूर" on January 11, 2017 at 11:40am — 12 Comments

ये दुनिया है भूलभुलैया (नवगीत)

ये दुनिया है भूलभुलैया

रची भेड़ियों ने

भेड़ों की खातिर

 

पढ़े लिखे चालाक भेड़िये

गाइड बने हुए हैं इसके

ओढ़ भेड़ की खाल

जिन भेड़ों की स्मृति अच्छी है

उन सबको बागी घोषित कर

रंग दिया है लाल

 

फिर भी कोई राह न पाये

इस डर के मारे

छोड़ रखे मुखबिर

 

भेड़ समझती अपने तन पर

खून पसीने से खेती कर

उगा रही जो ऊन

जब तक राह नहीं मिल जाती

उसे बेचकर अपना चारा

लायेगी दो…

Continue

Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 10, 2017 at 8:13pm — 6 Comments

जजमेंट- लघुकथा

"सर, मिश्राजी का फोन आया था, थोड़ी देर में किसी के साथ आ रहे हैं", जैसे ही वह ऑफिस में आया, सेक्रेटरी ने आकर बताया|

"ठीक है, अंदर भेजने से पहले एक बार मुझसे पूछ लेना", उसने कहा लेकिन उसके चेहरे पर थोड़ी तिक्तता फ़ैल गयी| मिश्राजी उसके अध्यापक थे, जब वह हाई स्कूल में था और पिछले महीने ही वह उनसे मिला था| इस नए स्थान पर पोस्टिंग के समय तो उसे उम्मीद भी नहीं थी कि इस तरह से कोई पुराना परिचित मिल जायेगा, लेकिन मिश्राजी को उसने देखते ही पहचान लिया था| दो बार पहले भी वह आ चुके थे यहाँ लेकिन कभी…

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Added by विनय कुमार on January 10, 2017 at 7:58pm — 16 Comments

ग़ज़ल (हिन्दी हमारी जान है)

बहर 2212 2212 की रचना।



हिन्दी हमारी जान है,

ये देश की पहचान है।



है मात जिसकी संस्कृत,

मा शारदा का दान है।



साखी कबीरा की यही,

केशव की न्यारी शान है।



तुलसी की रग रग में बसी,

रसखान की ये तान है।



ये सूर के वात्सल्य में,

मीरा का इसमें गान है।



सब छंद, उपमा और रस

की ये हमारी खान है।



उपयोग में लायें इसे,

अमृत का ये तो पान है।



ये मातृभाषा विश्व में,

सच्चा हमारा मान… Continue

Added by बासुदेव अग्रवाल 'नमन' on January 10, 2017 at 6:24pm — 7 Comments

अधूरी प्रीत से ....

अधूरी प्रीत से ....

लब
खामोश थे
पलकें भी
बन्द थीं
कहा
मैंने भी
कुछ न था
कहा
तुमने भी
कुछ न था
फिर भी
इक
अनकहा
नन्हा सा लम्हा
आँखों की हदें तोड़
देर तक
मेरी हथेली पे बैठा
मुझे
मिलाता रहा
मेरे अतीत से
अधूरी तृषा में लिपटी
अधूरी प्रीत से

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 10, 2017 at 2:22pm — 4 Comments

" कैसे कहूँ ...."- कविता /अर्पणा शर्मा

कैसे कहूँ मन की व्यथा,

सारे दुख-सुख का,

सब लेखा-जोखा,

किसने कितनी दी पीड़ा,

किस-किसने कब,

दिया मुझे धोखा,

वो गठरी पीछे छोड़ ,

बस बढ़ जाती हूँ,

निरंतर आगे की ओर,

समयधारा में धुल जाते हैं,

बहुत गहन घाव भी,

सप्रयास बिसरा देती हूँ ,

पीड़ा की सघन छाँव भी,

मुँह कर खड़ी होती हूँ,

झिर्री से आती धूप की ओर,

लेती हूँ उसका ताप भी,

भरती हूँ उसकी आब भी,

अपनी देह और अंतस में,

आशा की दरारों से,

वहाँ बिखर जाने देती हूँ… Continue

Added by Arpana Sharma on January 10, 2017 at 2:03pm — 9 Comments

क्षणिकाएं (171 ) - डॉo विजय शंकर

प्यार भी कितना
अजीब होता है ,
वहां भी होता है
जहां नहीं होता है ,
तब भी होता है ,
जब नहीं होता है।......1.

नाराज़गी की
सौ वजहें होतीं हैं ,
एक प्यार है
जो बिला वजह होता है।.....2.

इस बेवफ़ाई की
कोई तो वजह होगी ,
हमारी ही वफ़ा में
कुछ कमी रह गई होगी। ......3.

मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Dr. Vijai Shanker on January 10, 2017 at 6:16am — 12 Comments

ग़ज़ल- बिजलियाँ कुछ गिराया करो

212 212 212

रुख से जुल्फें हटाया करों ।

तुम नज़र यूँ ही आया करो ।।



चाँद पर हक़ हमारा भी है ।

अब तो नज़रें मिलाया करो ।।



है अना ही अना चार सू ।

जुल्म इतना न ढाया करो ।।



कर दो आबाद कोई चमन ।

खुशबुओं को लुटाया करो।।



बारहा जिद ये अच्छी नही ।

बात कुछ मान जाया करो ।।



गो ये सच है की मजबूर हूँ ।

आइना मत दिखाया करो ।।



है ज़रूरी तो जाओ मगर ।

वक्त पर लौट आया करो ।।



बेवफा मत कहो तुम उसे… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 10, 2017 at 1:30am — 9 Comments

ग़ज़ल -- मैं अगर क़तरा हूँ दरिया कौन है ( दिनेश कुमार )

2122--2122--212



जो समेटे मुझको ऐसा कौन है

मैं तो इक क़तरा हूँ दरिया कौन है



ग़ौर से परखो मेरे किरदार को

मुझ में ये मेरे अलावा कौन है



कश्तियों का है सहारा नाख़ुदा

नाख़ुदाओं का सहारा कौन है



कृष्ण से मिलने की चाहत है किसे

द्वारिका में अब सुदामा कौन है



पत्थरों में आग बेशक है छिपी

ध्यान से इनको रगड़ता कौन है



सामने है पूर्वजन्मों का हिसाब

कौन है अपना, पराया कौन है



ज़हन में जिसके भरा है ' मैं ' ही… Continue

Added by दिनेश कुमार on January 9, 2017 at 10:00pm — 9 Comments

हिम बसंत ...

हिम बसंत ...

प्रथम प्रणय का
प्रथम पंथ हो
हिय व्यथा का
तुम ही अंत हो
शिशिर ऋतु का
शिशिरांशु हो
विरह पलों का
शिशिरांत हो
शीत पलों की
मधुर सिहरन हो
नयन सिंधु का
मौन कंपन्न हो
मधु पलों में
मेरे प्रिय तुम
मधु स्मृतियों का
हिम बसंत हो

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on January 9, 2017 at 8:40pm — 8 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
मेरे कानों में मुहब्बत फुसफुसाया कौन था (ग़ज़ल 'राज ')

2122  2122  2122  212

किसने  होंटों पे तबस्सुम को  सजाया कौन था

छुप के दिल में वस्ल का दीपक जलाया कौन था

 

साँसे मेरी जीस्त मेरी मेरा अपना था वजूद

धडकनों पे मेरी जिसने हक जमाया कौन था

 

जब कभी भीगी तख़य्युल में कहीं पलकें मेरी

शबनमी उन  झालरों से मुस्कुराया कौन था

 

गुफ्तगू के उस सलीके पर मेरा तन मन निसार

बातों बातों में मुझे अपना बनाया  कौन था

 

जब तेरी फ़ुर्कत…

Continue

Added by rajesh kumari on January 9, 2017 at 3:00pm — 18 Comments

बेटियाँ(गजल)

2122 2122 212



चोटियों को हैं चिढातीं बेटियाँ

अब गगन को भी लजातीं बेटियाँ।1



हो रहे रोशन अभी घर देखिये

रूढ़ियों को तो खपातीं बेटियाँ।2



अब नहीं काँटे चुभेंगे पाँव में

रास्ते फिर से बनातीं बेटियाँ।3



बाँटते- चलते यहाँ सब घर अभी

टूटने से तो बचातीं बेटियाँ।4



फूल की ख्वाहिश पिरोना छोड़िये

शूल को माथे चढातीं बेटियाँ।5



साफ दामन तो रहा है आपका

कालिमा कितना उठातीं बेटियाँ?6



बन धरा जो आसमां को ढ़ो… Continue

Added by Manan Kumar singh on January 9, 2017 at 7:00am — 8 Comments

ग़ज़ल --दर्द की तासीर बन दिल में ठहर जाते हैं लोग

2122 2122 2122 212



इस तरह कुछ जोश में हद से गुज़र जाते हैं लोग।

जुर्म की हर इन्तिहाँ को पार कर जाते हैं लोग ।।



हर तरफ जलते मकाँ है आदमी खामोश है ।

कुछ सुकूँ के वास्ते जाने किधर जाते हैं लोग ।।



अहमियत रिश्तों की मिटती जा रही इस दौर में ।

है कोई शमशान वह अक्सर जिधर जाते हैं लोग ।।



यह शिकन ज़ाहिर न हो चेहरा न हो जाए किताब।

आईने के सामने कितना सवर जाते हैं लोग।।



गाँव खाली हो रहा कुछ रोटियों की फेर में ।

माँ का आँचल छोड़ कर… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on January 8, 2017 at 4:09pm — 8 Comments

गजल((दिन बदलते....)

2122 2122 212
दिन बदलते देर लगती है?,बता।
भेड़ बनकर घूमता है भेड़िया।1

लूटकर सब ले गया हर बार ही
माँगता है जो बचा फिर से मुआ।2

मुंतजिर हम रह गये होती नजर
कह रहा बस चाहिए अपनी दुआ।3

दूध पीकर अर्चना का बेधड़क
हो गया अजगर बड़ा घर-घर छुआ।4

हर दफा इकरार करता बेशरम
खाल फेंकी,अब जहर जाता रहा।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

Added by Manan Kumar singh on January 8, 2017 at 12:30pm — 11 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल -डरता हूँ घर जले न कहीं इस शरर से, मैं -- ( गिरिराज भंडारी )

221    2121     1221       212

तंग आ गया हूँ हालते क़ल्ब-ओ-ज़िगर से मैं

उकता गया हूँ ज़िंदगी, तेरे सफर से मैं

 

होश ओ हवास ओ-बेख़ुदी की जंग में फ़ँसे

दिल सोचने लगा है कि जाऊँ किधर से मैं

 

मंज़िल मेरी उमीद में जीती है आज भी

पर इलतिजाएँ कर न सका रहगुज़र से मैं

 

ऐसा नहीं गमों से है नाराज़गी कोई

उनकी ख़बर तो लेता हूँ शाम-ओ-सहर से मैं

 

अब नफरतों, की शक़्ल भी आतिश फिशाँ हुईं

डर है झुलस न जाऊँ कहीं इस शरर से…

Continue

Added by गिरिराज भंडारी on January 8, 2017 at 10:00am — 19 Comments

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