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गजल((दिन बदलते....)

2122 2122 212
दिन बदलते देर लगती है?,बता।
भेड़ बनकर घूमता है भेड़िया।1

लूटकर सब ले गया हर बार ही
माँगता है जो बचा फिर से मुआ।2

मुंतजिर हम रह गये होती नजर
कह रहा बस चाहिए अपनी दुआ।3

दूध पीकर अर्चना का बेधड़क
हो गया अजगर बड़ा घर-घर छुआ।4

हर दफा इकरार करता बेशरम
खाल फेंकी,अब जहर जाता रहा।5
मौलिक व अप्रकाशित@मनन

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Comment by Manan Kumar singh on January 20, 2017 at 10:54pm
आभार
Comment by Abhishek kumar singh on January 11, 2017 at 10:03pm
लाजवाब
Comment by Manan Kumar singh on January 11, 2017 at 9:49pm
आभार आदरणीय गिरिराज भाई।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 11, 2017 at 9:36pm

आदरणीय मनन भाई , अच्छी गज़ल कही है , बधाइयाँ स्वीकार करें ।

माँगता है जो बचा फिर से मुआ ....... इस मिसरे को ऐसा कह सकते है

माँगता है जो बचा फिर  सरफिरा  --  अगर अच्छा लगे तो ?

Comment by Samar kabeer on January 9, 2017 at 2:36pm
जनाब मनन कुमार जी आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
मतले के ऊला मिसरे में ऐब-ए-तनाफ़ुर है 'कब बता'।
दूसरे शैर में "मुआ"शब्द बैगमाती ज़बान का है, मर्दों को इसके प्रयोग से बचना चाहिये ।
Comment by Manan Kumar singh on January 9, 2017 at 6:51am
आपका आभारी हूँ आदरणीय सुरेंद्र जी
Comment by Manan Kumar singh on January 9, 2017 at 6:51am
आपका आभारी हूँ आदरणीय मिथिलेश जी
Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2017 at 3:45am
आदरणीय मनन जी सादर अभिवादन, उम्दा ग़ज़ल के लिए दाद हाज़िर है, बधाई आपको। सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 8, 2017 at 9:37pm

आदरणीय मनन जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. हार्दिक बधाई. सादर 

Comment by Manan Kumar singh on January 8, 2017 at 7:29pm
आदरणीय आशुतोष मिश्र जी,आपका बहुत बहुत आभार

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