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अपनी अपनी धुन(लघुकथा)

कोयल मौसम में समरसता घोल रही थी।लोग उसकी सुमधुर धुन पर थिरक से रहे थे। लग रहा था कि पहले की रही सही रंजिश अब नहीं रही।यह सब कौवे को नागवार लगा।उसने अकस्मात अपनी पूरी कर्कशता से कांव कांव करना शुरू कर दिया।कोयल बिदकी,"यह कर्कशता कैसी भाई?अभी मेल जोल का माहौल है।खुशियां बांटें"।

"कैसा मेल जोल?तू मेरी आवाज बदल सकती है क्या?"

"नहीं।"

"तो फिर? तू अपनी गा, मैं अपना गाऊंगा।"

"ऐसा?"

"और क्या?अपनी आवाज में…

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Added by Manan Kumar singh on November 10, 2019 at 7:30am — 5 Comments

जब तलक ख़ुद ख़ुदा नहीं चाहे - सलीम रज़ा

2122 1212 22

-

हौसला जिसका मर नहीं सकता 

मुश्किलों से वो डर नहीं सकता 

-

लोग कहते हैं ज़ख़्म गहरा है 

मुद्दतों तक ये भर नहीं सकता

-…

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Added by SALIM RAZA REWA on November 9, 2019 at 7:30pm — 3 Comments

ग़ज़ल - क़यामत का मंज़र दिखाने लगे हैं

गज़ल(122-122-122-122)

क़यामत का मंज़र दिखाने लगे हैं

अचानक ही वो मुस्कुराने लगे हैं

ये क्या कम है सुनते न थे जो हमारी

वो अब हाथ हम से मिलाने लगे हैं

बुरा हो जवानी का आयी है जबसे

वो सूरत ही मुझ से छुपाने लगे हैं

दिए जो जलाये उजाले की ख़ातिर

वही आग घर को लगाने लगे हैं

अमीरों के बंगले बचाने की ख़ातिर

वो मुफ़लिस के छप्पर जलाने लगे हैं

सरे बज्म हँस हँस के मत बात कीजिए

सभी लोग तियूरी चढ़ाने लगे हैं

ग़ज़ब है वफा जिनसे मैं कर…

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Added by Tasdiq Ahmed Khan on November 9, 2019 at 8:59am — 6 Comments

मुक्ति का द्वार

एक फूल दो है, माली

धर्म-कर्म की यही कहानी

आत्मा-परमात्मा में भेद करा

दुनियांदारी में हमे फसा-फसाकर, जन्म-मरण का चक्कर कटवाती ||

 

अहंकार रूपी ये पुत्र हमारा, धन रूपी सा भाई,

मोह रूपी ये पुत्रवधू, आशा रूपी ये स्त्री प्यारी

आसक्ति लगा के इनमे

कर्म बंधन से ना मुक्ति पाई||

 

ममतामयी माँ रूप बना ये, हम पर खूब ये, प्यार लुटाता

बहन बन ये जब भी…

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Added by PHOOL SINGH on November 8, 2019 at 11:52am — 5 Comments

कुण्डलिया छंद

घर में किसी बुजुर्ग ने, दिया आप को नाम

नाम बड़ा अब कीजिये, करके अच्छे काम

करके अच्छे काम, बढ़े कद जिससे अपना

जग हित हो हर श्वांस, बड़ा ही देखें सपना

पद वैभव सम्मान, ख्याति हो दुनिया भर में

उत्तम जन कुलश्रेष्ठ, आप ही हों हर घर में।।

जह्र फिजा में है घुला, नगर शहर या गाँव

बाग बगीचे काट कर, खोजे मानव छाँव

खोजे मानव छाँव, भला अब कैसे पाए

जब खुद गड्ढा खोद, उसी में गिरता जाए

धुन्ध धुँआ बारूद, बहें मिल खूब हवा में

कैसे लें अब साँस, घुला जब…

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Added by नाथ सोनांचली on November 7, 2019 at 10:30pm — 8 Comments

भिड़े प्रहरी न्याय के - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

दोहे

भिड़े प्रहरी न्याय के, लेकर निज अभिमान

मुसमुस जनता हँस रही, ले इस पर संज्ञान।१।



खाकी का ईमान क्या, बिकता काला कोट

वह नेता भी भ्रष्ट है, जन दे जिसको वोट।२।



लूट पीट जन आम को, करें न्याय का खून

खाकी, काला कोट खुद, बन बैठे कानून।३।



खाकी, काले कोट को, है इतना अभिमान

आम नागरिक कब भला, हैं इनको इन्सान।४।



रहा न जिनका आचरण, जैसा सूप सुभाय

वही  सुरक्षा  माँगते, वही  कह  रहे  न्याय।५।



काली वर्दी पड़ गयी,…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 7, 2019 at 8:09pm — 12 Comments

अहसास की ग़ज़ल

1222×4

ग़ज़ल में अपने माज़ी के कई लम्हात लाया हूँ,

परेशानी की हालत में इन्हीं से जा लिपटता हूँ.

एक ऐसा रास्ता जो देर तक खाली नहीं रहता,

मैं ऐसे रास्ते पर देर से खामोश बैठा हूँ.

लगी है आग वो घर में बुझाई ही नहीं जाती,

मैं दुनिया भर की कितनी उलझनें सुलझाता रहता हूँ.

गली के मोड़ से छुपकर तमाशा देखने वालो,

वतन का खून हूं मैं सूखकर मिट्टी से चिपका हूँ.

मुझे इससे बड़ी राहत जमाने में भला क्या माँ,

मैं…

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Added by मनोज अहसास on November 6, 2019 at 11:52pm — 2 Comments

आगे बढ़, बस बढ़ता चल

चहेरे पर मुस्कान को रख

कुछ नया करने की चाहत रख

स्वयं पर दृढ़ विश्वास को रख

आगे बढ़ बस आगे बढ़ता चल ||



सहयोग बलिदान की भावना रख

जिम्मेदारियों ना तू डर

टीम वर्क पर विश्वास जता

हौंसले संग तू आगे बढ़ ||

 

नामुमकिन कुछ नहीं है जग में

मन में थोड़ा धैर्य रख

असफलताओ से सीख ले

मुकाम को अपने हासिल कर ||

 

कहने वाले कहते हैं

उनकी बातों पर ध्यान ना धर

कठिन पर अडचने…

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Added by PHOOL SINGH on November 6, 2019 at 5:00pm — 2 Comments

ग़ज़ल -

1212 1122 1212 22/112

न पूछिये कि वो कितना सँभल के देखते हैं ।

शरीफ़ लोग मुखौटे बदल के देखते हैं ।।

अज़ीब तिश्नगी है अब खुदा ही खैर करे ।

नियत से आप भी अक्सर फिसल के देखते हैं ।।

पहुँच रही है मुहब्बत की दास्ताँ उन तक ।

हर एक शेर जो मेरी ग़ज़ल के देखते हैं ।।

ज़नाब कुछ तो शरारत नज़र ये करती है ।

यूँ बेसबब ही नहीं वो मचल के देखते हैं ।।

गुलों का रंग इन्हें किस तरह मयस्सर हो…

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Added by Naveen Mani Tripathi on November 6, 2019 at 2:51pm — 2 Comments

अहसास की ग़ज़ल

2×15

कोई दरिंदा घात लगाकर जब घर में ही बैठा हो,

सहमी हुई मासूम कली का कितना बड़ा दुपट्टा हो.

अपनी बीवी के अश्कों की वो भी कद्र नहीं करता,

जिसने मम्मी को बचपन में रोज सिसकते देखा हो.

वक्त जरूरत पर ये दुनिया बेपर्दा हो जाती है,

दुनिया वाले तू भी मुझ पर थोड़ा सा बेपर्दा हो.

मेरे बच्चों में इक बच्चा ऐसा भी हो मेरे ख़ुदा,

मेरे जैसा दिल हो उसका ,उसके जैसा दिखता हो.

हमने कल्पना ऐसी बगिया की जाने क्योंकर कर ली,…

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Added by मनोज अहसास on November 6, 2019 at 12:13am — 2 Comments

कुछ हाइकु :

कुछ हाइकु :

लोचन नीर
विरहन की पीर
घाव गंभीर

कागज़ी फूल
क्षण भर की भूल
शूल ही शूल

देह की माया
संग देह के सोया
देह का साया

झील का अंक
लहरों पर नाचे
नन्हा मयंक

यादों के डेरे
ख़ुशनुमा अँधेरे
भूले सवेरे

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on November 4, 2019 at 7:27pm — 10 Comments

धूल का परदा

ठण्डी गहरी चाँदनी

चिंताओं की पहचानी

काल-पीड़ित

अफ़सोस-भरी आवाज़ें ...

पेड़ों से उलझी रोशनी को

पत्तों की धब्बों-सी परछाई से 

प्रथक करते

अब महसूस यह होता है

सपनों में

सपनों की सपनों से बातें ही तो थीं

हमारा प्यार

या उभरता-काँपता

धूल का परदा था क्या

विश्वासों में पला हमारा प्यार

आईं

व्यथाओं की ज़रा-सी हवाएँ

धूल के परदे में झोल न पड़ी

वह तो यहाँ वहाँ

कण-कण जानें…

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Added by vijay nikore on November 4, 2019 at 5:15pm — 12 Comments

अकेलापन —डॉo विजय शंकर

जिंदगी जीने का मौक़ा ,

भीड़ से निकल कर मिलता है ,

माहौल कुछ इस कदर

असर करता है।

अकेले हों तो ख़ुद से बात

करने का मौक़ा मिलता है l

भीड़ में तो आदमी बस

दूसरों की सुनता है।

हर आदमी कोई न कोई

सवाल लिए मिलता है ,

आपको अपनी सुनाता है ,

फिर भी आपके जवाब

को कौन सुनता है ?

शायद इसीलिये अकेलापन

आपको बहुत कुछ सीखने

समझने का मौक़ा देता है।

जिंदगी जीने का मौक़ा तो

भीड़ से निकल कर ही मिलता है।

मौलिक…

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Added by Dr. Vijai Shanker on November 4, 2019 at 4:57pm — 14 Comments

काम

काम(लघुकथा)

***

"हम तुम्हें मुफ्त में सबकुछ देंगे", नेताजी ने एलान किया।

"मुफ्त में सबकुछ?" भीड़ से आवाज आई।

"हां। क्यों भरोसा नहीं तुमलोगों को?"

"अरे दे सको,तो काम दो सबको।"भीड़ से आवाज आई।

"हां, हां। काम चाहिए,काम।जैसे तुम्हे रोजगार मिले,औरों को भी दोगे,ऐसा बोलो।"भीड़ फिर से चिल्लाई।

"हम भी तो कुछ देने ही आए हैं।"

"जब सब कुछ देना ही है,तो फिर कुछ क्यों?हम बाद में ही मांगेंगे।तुम्हारा इस्तीफा भी,ज़रूरी हुआ तो।"

"ऐं?"नेताजी बगलें झांकने  लगे।

 "…

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Added by Manan Kumar singh on November 3, 2019 at 7:50pm — 5 Comments

मजदूर पर दोहे

कहने को मजदूर पर, नहीं आज मजबूर।

अपनी ताकत से सदा, करे दुखों को दूर।।

काम करे डटकर सदा, नहीं कभी आराम।

इसके श्रम से ही बने, महल अटारी धाम

जंगल या तालाब हो, रुके न फिर भी पाँव।

करता श्रम दिन-रात वो, देखे धूप न छाँव।।

कंकड़ पत्थर जोड़कर, देता उसको रूप।

निज तन चिंता छोड़कर, खाता दिन भर धूप।।

राह बनाता वो यहाँ, दुष्कर गिरि को काट।

अपने भुजबल से करे, सुंदर सरल ये बाट।।

मन निर्मल है तन कड़ा, लौह बना है…

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Added by Vivek Pandey Dwij on November 3, 2019 at 4:11pm — 7 Comments

कुण्डलिया (लोक पर्व "छठ पूजा")

अर्चन करने सूर्य का, चले व्रती सब घाट

छठ माँ के वरदान से, दमके खूब ललाट

दमके खूब ललाट, प्रकृति से ऊर्जा मिलती

हो निर्जल उपवास, मगर मुख आभा खिलती

शाम सुबह देें अर्घ्य, करें यश बल का अर्जन

चार दिनों का पर्व, करें सब मन से अर्चन।।

पूजा दीनानाथ की, डाला छठ के नाम

अस्त-उदय जब सूर्य हों, करते सभी प्रणाम

करते सभी प्रणाम, पहुँच कर नदी किनारे

भरकर दउरा सूप, अर्घ्य दें हर्षित सारे

प्रकृति प्रेम का पर्व, नहीं है जग में दूजा

अन्न…

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Added by नाथ सोनांचली on November 2, 2019 at 10:00pm — 6 Comments

पंक की कर मन्च  से आलोचना - लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

२१२२/२१२२/२१२



याद बीते कल का वो सुख क्यों करें

ऐसे दूना  अपना  ही  दुख  क्यों करें।१।



पंक की कर मन्च  से आलोचना

और गँदला बोलिए मुख क्यों करें।२।



छोड़  दुत्कारों  से  आये  तब  भला

उनके घर की ओर आमुख क्यों करें।३।



एक भी छाता  न  हो जिस शह्र में

बारिशें उस शह्र का रूख क्यों करें।४।



इसकी उनके  पास  में  जब  ना दवा…

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Added by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 2, 2019 at 5:07pm — 2 Comments

कहो, तुम पुरुष कौन?

काव्य-रुपी शब्दों का विनम्र समर्पण कविवर सुमित्रानंदन प॔त जी की कविता "कहो, तुम रूपसी कौन?" से प्रेरित हो मेरे द्वारा उनके सम्मान में किया गया एक प्रयास।

कहो, तुम पुरुष कौन?

निशक्त बतलाओ तो, क्या नाम दूँ तुम्हें ?

जान लो, पहचान लो, स्मरण कर लो,

प्रभावशाली, विराट, अखंडित,

अजेय एवं समृद्ध तुम।

हर क्षण रहे सुदृढ़, मजबूत और कर्मठ,

कुछ नहीं नामुमकिन, कठिन, दुष्कर।

प्रत्येक क्षण, रहे करनी सुदृढ़ व मजबूत,

कुछ नहीं नामुमकिन, कठिन, दुष्कर…

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Added by Usha on November 2, 2019 at 11:16am — 7 Comments

तेरा होना मेरा सर्जन है

मैं बीज पड़ा तेरे आँगन में

तेरी आर्द्रता से अंकुरण है

ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा

तेरा होना मेरा सर्जन है।

कल-कल बहती हैं नदियाँ तुझ पर

मीठे-मीठे गीत सुनातीं हैं

जीवन को सींच रही हैं पल-पल

हरियाली को लेकर आतीं हैं

नित चलती पथ पर ये बिना रुके

आगे को ही बढ़ती जातीं हैं

बाधाओं को पार करें कैसे

ऐसा सबको पाठ पढ़ातीं हैं।

फिर मीत सिंधु के जा साथ मिलें

दिख जाता क्या प्रेम समर्पण है?

ये तन पौध बना फिर देख बढ़ा…

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Added by सतविन्द्र कुमार राणा on November 2, 2019 at 11:00am — 2 Comments

कविता: स्मृति शेष

स्मृति शेष, बनी विशेष। 

कभी शूल सी चुभती हैं, 

कभी बन प्रसून महकती हैं। 

कभी अश्रु बन छलकती हैं, 

कभी शब्दों में ढलती हैं। 

स्मृति शेष, बनी विशेष। 

अशेष, अन्नत प्रवाह पीड़ा का, 

बिसराये ना बिसरती हैं। 

सब छूट गया सब टूट गया, 

शेष स्मृति का अटूट बंधेज। 



स्मृति शेष, बनी विशेष। 

कुछ…

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Added by Dr. Geeta Chaudhary on November 2, 2019 at 7:30am — 4 Comments

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