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भिड़े प्रहरी न्याय के - लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

दोहे

भिड़े प्रहरी न्याय के, लेकर निज अभिमान
मुसमुस जनता हँस रही, ले इस पर संज्ञान।१।


खाकी का ईमान क्या, बिकता काला कोट
वह नेता भी भ्रष्ट है, जन दे जिसको वोट।२।


लूट पीट जन आम को, करें न्याय का खून
खाकी, काला कोट खुद, बन बैठे कानून।३।


खाकी, काले कोट को, है इतना अभिमान
आम नागरिक कब भला, हैं इनको इन्सान।४।


रहा न जिनका आचरण, जैसा सूप सुभाय
वही  सुरक्षा  माँगते, वही  कह  रहे  न्याय।५।


काली वर्दी पड़ गयी, खाकी पर अधिभार
जिस डण्डे की धौंस थी, हुआ वही लाचार।६।


चलते रहते नित अगर, न्याय धर्म की राह
लगती ऐसे ना कभी, जनमानस की आह।७।


वर्दी पिटते देख कर, चीख रहा परिवार
वैसे बोला क्या कभी, बेबस को मत मार।८।


सीखें दोनों ही यहाँ, संयम का व्यवहार
टूटेगा फिर यूँ नहीं, कभी मान का तार।९।


इस  घटना  का  बस  यही, दोनों  को  संदेश
करो नहीं अभिमान का, कभी सघन परिवेश।१०।


मौलिक अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 19, 2019 at 6:32am

आ. भाई जवाहरलाल जी, सादर अभिवादन। दोहों पर उपस्थिति और उत्साहवर्धन के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 19, 2019 at 6:30am

आ. भाई समर कबीर जी, सादर अभिवादन। पुनः मार्गदर्शन के लिए आभार ।

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on November 18, 2019 at 7:06pm

समसामयिक घटनाओं पर बेहतरीन दोहे आदरणीय लक्ष्मण धामी जी! बहुत बहुत बधाई!

Comment by Samar kabeer on November 12, 2019 at 3:45pm

'आम आदमी को कहाँ, समझे ये इंसान'

यूँ कर सकते हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 12, 2019 at 3:42pm

आ. भाई विजय निकोर जी सादर अभिवादन। दोहों पर आपकी सकारात्त्सामक पप्रतिक्रिया पा लेखन सफल हुआ। उत्साहवर्धन के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 12, 2019 at 3:39pm

आ. भाई समर जी सादर अभिवादन। उत्साहवर्धन के लिए आभार । क्या ऐसा करने से दोहे का भाव स्पष्ट हो रहा है ?

आम नागरिक हैं लगे, कब इनको इन्सान।४।

Comment by Samar kabeer on November 9, 2019 at 3:35pm

जनाब लक्ष्मण धामी 'मुसाफ़िर' जी आदाब,अच्छे दोहे लिखे आपने,बधाई स्वीकार करें ।

'आम नागरिक कब भला, हैं इनको इन्सान'

इस पंक्ति में आप जो कहना चाहते हैं,स्पष्ट नहीं हुआ,देखियेगा ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 9, 2019 at 8:12am

आ. भाई सुरेंद्र जी सादर अभिवादन। रचना पर आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए आभार।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 9, 2019 at 8:09am

आ. भाई विजय शंकर जी, सादर अभिवदन। इतनी सुविचारित सराहना और विस्त्रित टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार ।

Comment by vijay nikore on November 9, 2019 at 7:23am

इस विषय पर लिखना आसान नहीं है, फिर भी आप सफ़ल हुए हैं, आदरणीय मित्र लक्ष्मण धामी जी। हार्दिक बधाई।

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