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ग़ज़ल - क़यामत का मंज़र दिखाने लगे हैं

गज़ल(122-122-122-122)

क़यामत का मंज़र दिखाने लगे हैं
अचानक ही वो मुस्कुराने लगे हैं

ये क्या कम है सुनते न थे जो हमारी
वो अब हाथ हम से मिलाने लगे हैं

बुरा हो जवानी का आयी है जबसे
वो सूरत ही मुझ से छुपाने लगे हैं

दिए जो जलाये उजाले की ख़ातिर
वही आग घर को लगाने लगे हैं

अमीरों के बंगले बचाने की ख़ातिर
वो मुफ़लिस के छप्पर जलाने लगे हैं

सरे बज्म हँस हँस के मत बात कीजिए
सभी लोग तियूरी चढ़ाने लगे हैं

ग़ज़ब है वफा जिनसे मैं कर रहा हूं
फरेबी वो मुझको बताने लगे हैं

भरोसा हुआ ही नहीं उनको मुझ पर
वफा को वो फ़िर आज़माने लगे हैं

जिन्हें मैं ने तस्दीक चलना सिखाया
वही मुझको ठोकर लगाने लगे हैं

(मौलिक व अप्रकाशित) 

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Comment by vijay nikore on November 19, 2019 at 12:13am

इस सुन्दर रचना के लिए बधाई, मित्र तस्दीक अहमद जी।

Comment by नाथ सोनांचली on November 12, 2019 at 9:39pm

आद0 तस्दीक अहमद खान जी सादर अभिवादन। एक बेहतरीन ग़ज़ल कही आपने। दाद के साथ बधाई कुबूल कीजिये। सादर

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 11, 2019 at 9:24am

जनाब भाई लक्ष्मण धामी साहिब, गज़ल पसन्द करने और आपकी इस इनायत का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on November 11, 2019 at 9:23am

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब, गज़ल पसन्द करने और आपकी इस इनायत का बहुत बहुत शुक्रिया जनाब 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 10, 2019 at 6:21am

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सुंदर गजल.हुई है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Samar kabeer on November 9, 2019 at 4:08pm

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब, अच्छी ग़ज़ल कही आपने,बधाई स्वीकार करें ।

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