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गज़ल _तुम चाहे गुज़र जाओ किसी राह गुज़र से

(मफ ऊल_मफाईल_मफाईल_फ ऊलन) 

.

तुम चाहे गुज़र जाओ किसी राह गुज़र से
लेकिन नहीं बच पाओगे तुम मेरी नजर से

.

वो खौफ़ ए ज़माना से या रुस्वाई के डर से
देता रहा आवाज मैं निकले न वो घर से

.

तू जुल्म से आ बाज़ अभी वक़्त है ज़ालिम
पानी भी बहुत हो चुका ऊँचा मेरे सर से

.

फँसता है सदा हुस्न के वो जाल में यारो
वाकिफ़ जो नहीं उनके दग़ाबाज़ हुनर से

.

मालूम करें आओ कठिन कितना है रस्ता
कुछ लोग अभी लौट के आए हैं सफ़र से

.

ठुकरा दिया जो तू ने मुझे ये तो बता दे
जाऊँ गा कहाँ जाने जहां मैं तेरे दर से

.

ये जर्फ है अपना ये श ऊर अपना है लोगो
मैं सुनता रहा सिर्फ़ वो जब ना गहां बरसे

.

कोई भी खता वार नहीं जाने मन इसका
दीवाना हुआ हूं तेरे जलवों के असर से

.

इन्सान हैं हम कोई फरिश्ता तो नहीं हैं
ग़लती तो हुआ करती है दुनिया में बशर से

.

देखी गई उठती हुई उस सम्त क़यामत
वो हाय गुज़र जाते हैं बे पर्दा जिधर से

.

तस्दीक उन्हें कर दो ख़बर ढ़लने को है दिन
दीदार को बैठा है कोई दर पे सहर से

मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 19, 2019 at 7:23pm

वाह आदरणीय वाह बेहद खूब ग़ज़ल हुई...

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 19, 2019 at 12:35pm

जनाब भाई लक्ष्मण धामी साहिब 'आपकी इस इनायत का बहुत बहुत शुक्रिया 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on September 19, 2019 at 12:33pm

मुहतरम जनाब समर साहिब आ दाब 'आपकी इस हौसला अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया

गुज़र में (  ز) है और नजर में (ظ) है, उर्दू के हिसाब से तो मेरे खयाल से सही है l मिसरा यूं कर लिया है " अगलात हुआ करती हैं दुनिया में बशर से" 

Comment by Samar kabeer on September 19, 2019 at 11:22am

जनाब तस्दीक़ अहमद साहिब आदाब,तरही मिसरे पर अच्छी ग़ज़ल हुई है,बधाई स्वीकार करें ।

तुम चाहे गुज़र जाओ किसी राह गुज़र से
लेकिन नहीं बच पाओगे तुम मेरी नजर से'

मतले के दोनों मिसरों में 'ज़र' की बंदिश हो गई है,देखियेगा ।

'ग़लती तो हुआ करती है दुनिया में बशर से'

इस मिसरे में 'ग़लती' का वज़्न 112 होता है, "लग़ज़िश" कर सकते हैं ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2019 at 5:15am

आ. भाई तस्दीक अहमद जी, सुंदर गजल हुई है । हार्दिक बधाई ।

कृपया ध्यान दे...

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