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अपनी अपनी धुन(लघुकथा)

कोयल मौसम में समरसता घोल रही थी।लोग उसकी सुमधुर धुन पर थिरक से रहे थे। लग रहा था कि पहले की रही सही रंजिश अब नहीं रही।यह सब कौवे को नागवार लगा।उसने अकस्मात अपनी पूरी कर्कशता से कांव कांव करना शुरू कर दिया।कोयल बिदकी,"यह कर्कशता कैसी भाई?अभी मेल जोल का माहौल है।खुशियां बांटें"।
"कैसा मेल जोल?तू मेरी आवाज बदल सकती है क्या?"
"नहीं।"
"तो फिर? तू अपनी गा, मैं अपना गाऊंगा।"
"ऐसा?"
"और क्या?अपनी आवाज में गाने का मुझे हक़ है,गा रहा हूं।"
फिर दोनों अपनी अपनी आवाज में गाने लगे,पर मधुरता कर्कशता पर हावी थी।
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on November 20, 2019 at 4:39am

आ. भाई मनन जी, बेहतरीन कथा हुई है । हार्दिक बधाई।

Comment by Manan Kumar singh on November 14, 2019 at 7:51pm

बहुत बहुत आभार आदरणीय समर जी,नमन।

Comment by Samar kabeer on November 14, 2019 at 4:54pm

जनाब मनन कुमार सिंह जी आदाब,बहुत अच्छी लघुकथा लिखी आपने,बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Manan Kumar singh on November 11, 2019 at 7:44am

शुक्रिया आदरणीय उस्मानी जी।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on November 10, 2019 at 10:07pm

आदाब। ग़ज़ब की प्रतीकात्मक लघुकथा। कच्चा चिट्ठा। हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह साहिब।

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