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Vivek Pandey Dwij
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Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-116
"आदरणीय सतविंद्र राणा जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद।"
Jun 13, 2020
Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-116
"अतिसुन्दर रचना भाई सुरेंद्र नाथ सिंह जी"
Jun 13, 2020
Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-116
"सादर आभार आदरणीय सतविंद्र राणा जी।"
Jun 13, 2020
Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-116
"तुकांत कविता। हम और हमारे लोग अरे! देखो किस राह चले जाते।नित करते पान गरल का सब, अभिमान अनल से झुलसाते।। सुंदर वसुधा की क्यारी में,क्या लगा रहे ये भूमि तले।जो पाप पनपता चहु दिश में, धू धू कर अपना देश जले।। अभिमान इन्हें किस बल का है, जब कल को नहीं…"
Jun 13, 2020
नाथ सोनांचली commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"आद0 विवेक जी सादर अभिवादन। नववर्ष पर अच्छी रचना की कोशिश की है आपने,, बधाई स्वीकार कीजिये।"
Jan 7, 2020
Vivek Pandey Dwij commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"बहुत बहुत धन्यवाद भाई विजय जी।"
Jan 7, 2020
vijay nikore commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"रचना अच्छी बनी है। बधाई, मित्र विवेक जी।"
Jan 7, 2020
Vivek Pandey Dwij commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"आo भाई लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर’बहुत बहुत धन्यवाद "
Jan 3, 2020
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"आ. भाई विवेक जी, सुन्दर गीत हुआ है । हार्दिक बधाई ।"
Jan 3, 2020
Vivek Pandey Dwij commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"धन्यवाद आशीष जी।"
Jan 2, 2020
आशीष यादव commented on Vivek Pandey Dwij's blog post नव वर्ष गीत
"बहुत अच्छी कृति। हार्दिक बधाई।"
Jan 2, 2020
Vivek Pandey Dwij posted a blog post

नव वर्ष गीत

हुआ है उजाला धरा पर नया अब। मिटा घन अँधेरा छटा ये धुआँ सब। नया साल आया नई आस लाया। करो काम दिल से न जो भी हुआ सब।।रहे जग हमेसा ख़ुशी की सफ़र पे। न काटें मिले अब किसी की डगर पे। करो प्यार सबसे की जीवन है प्यारा। न कीचड़ उछालो हमारे नगर पे।।गया दिन पुराना नया साल देखो। चमकते हुए देश का भला देखो। हिंसा के रथ पर कहाँ तक चलोगे। चला जो न माना ज़रा हाल देखो।।नया प्रात है ये इसे सब सवारें। ख़ुशी का समय है ख़ुशी से गुज़ारे। मिले जो उसे द्विज गले से लगा लो। नहीं बस लगाओ कि नव वर्ष नारे।।मौलिक व अप्रकाशित।See More
Jan 2, 2020
Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-109
"द्वितीय प्रस्तुति (कवित्त छंद) दिल से भला है यहाँ जो भी इंसान आज,नर वो नहीं यह पे देवता के जैसे हैं।दूसरों के सुख में जिसे है सुख मिलता,आदमी जहाँ में बस शेष कुछ ऐसे हैं।चर व अचर यहाँ जो भी हमें दिखता है,रचा है विधाता ने ये स्वर्ग यहाँ कैसे हैं।दिल…"
Nov 10, 2019
Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-109
"प्रथम प्रस्तुति (दोहा छंद) करता हूँ आराधना, दिल से प्रभु मैं आजज्ञान सिन्धु बस चाहिये, नहीं चाहिये ताज।। देख जगत व्यवहार को, दिल से निकले आहमानव दिल पत्थर हुआ, उपजे दिल में डाह।। हर जीवन है एक सा, इसको समझो यार'वसुधा एव कुटुम्ब' है,…"
Nov 10, 2019
Vivek Pandey Dwij replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-109
"आo सुरेंद्र सिंह कुशक्षत्रप जी इस सुंदर रचना के लिये बधाई स्वीकार करें।"
Nov 9, 2019
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Vivek Pandey Dwij's blog post मजदूर पर दोहे
"आ. विवेक जी, मज़दूर की समस्याओं पर अच्छे दोहे रचे हैं। हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।"
Nov 8, 2019

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Male
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Varanasi
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Varanasi
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Writing is my hobby

Vivek Pandey Dwij's Blog

नव वर्ष गीत

हुआ है उजाला धरा पर नया अब। 

मिटा घन अँधेरा छटा ये धुआँ सब। 

नया साल आया नई आस लाया। 

करो काम दिल से न जो भी हुआ सब।।
रहे जग हमेसा ख़ुशी की सफ़र पे। 

न काटें मिले अब किसी की डगर पे। 

करो प्यार सबसे की जीवन है प्यारा। 

न कीचड़ उछालो हमारे नगर…
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Posted on January 1, 2020 at 9:00pm — 7 Comments

मजदूर पर दोहे

कहने को मजदूर पर, नहीं आज मजबूर।

अपनी ताकत से सदा, करे दुखों को दूर।।

काम करे डटकर सदा, नहीं कभी आराम।

इसके श्रम से ही बने, महल अटारी धाम

जंगल या तालाब हो, रुके न फिर भी पाँव।

करता श्रम दिन-रात वो, देखे धूप न छाँव।।

कंकड़ पत्थर जोड़कर, देता उसको रूप।

निज तन चिंता छोड़कर, खाता दिन भर धूप।।

राह बनाता वो यहाँ, दुष्कर गिरि को काट।

अपने भुजबल से करे, सुंदर सरल ये बाट।।

मन निर्मल है तन कड़ा, लौह बना है…

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Posted on November 3, 2019 at 4:11pm — 7 Comments

पर्यावरण पर कुंडलिया

यारो! किस ये राह पर, चला आज इंसान

वृक्ष हीन धरती किया, कहा इसे विज्ञान

कहा इसे विज्ञान, नहीं कुछ ज्ञान लगाया

सूखा बाढ़ अकाल, मूढ़ क्यूँ समझ न पाया

कह विवेक कविराय, नहीं खुद को यूँ मारो

निशदिन बढ़ता ताप, इसे अब समझो यारो।।1

 अभिलाषा प्रारम्भ है, मृगतृष्णा का यार

अंधी दौड़ विकास की, हुई जगत पे भार

हुई जगत पे भार, मस्त फिर भी है मानव

हर कोई है त्रस्त, विकास लगे अब दानव

कह विवेक कविराय, प्रकृति की समझो भाषा

पर्वत नदियाँ झील, नष्ट करती…

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Posted on June 15, 2019 at 9:46am

'आम चुनाव और नेता'

आल्हा छंद (16, 15 अंत में गुरु लघु)

लोकतंत्र के महापर्व में, हुए सभी नेता तैयार

शब्द बाण से वार करें वे, छोड़ छाड़ के शिष्टाचार।।

युध्द भूमि सा लगता भारत, जहाँ मचा है हाहाकार

येन केन पाने को सत्ता, अपशब्दों की हो बौछार।।

खून करें वे लोकतंत्र का, जुमले हैं इनके हथियार

हित जनता का भूल गए वे, ऐसा इनका है आचार

हे जन मन तुम जाग उठो अब, व्यर्थ न जाये यह त्योहार

ऐसा कुछ इस बार करो तुम, राजनीति बदले आकार ।।

रंग बराबर बदलें ऐसे,…

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Posted on April 13, 2019 at 8:27am — 6 Comments

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At 5:26pm on May 17, 2025, Erica said…

I need to have a word privately,Could you please get back to me on ( mrs.ericaw1@gmail.com)Thanks.

 
 
 

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