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सदस्य टीम प्रबंधन
किसे ये सब समझाऊँ .... स्त्री की ज़िंदगी का एक पहलू // डॉ० प्राची

रात सिसकती सुबह सुलगती, है जीवन का लेख

दर्द भरा सागर आँखों में, कौन सका है देख ?

कहाँ मैं अश्रु बहाऊँ ?

किसे मैं व्यथा सुनाऊँ ?



बेटी थी जिस घर की उसने छीन लिए अधिकार

हक़ माँगा तो रिश्तों में पहुँचेगी बड़ी दरार !

क्या बोलूँ ? किससे बोलूँ ? समझेगा मुझको कौन ?

अपने हक़ की बात करूँ या रह जाऊँ फिर मौन ?

कौन सा क़दम उठाऊँ ?

कभी ये समझ न पाऊँ !!!



कठपुतली सा नाच नचाती है मुझको ससुराल

घर की लक्ष्मी का दासी से भी बद्तर है हाल,

जितना… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 7, 2017 at 9:00am — 12 Comments

इश्क की दास्ताँ यह छुपानी नही (गजल)

बहर:- 212-212-212-212



फर्ज के वास्ते बद-जुबानी नही ।

फर्ज वो राह है जिसके मानी नही ।।



हिज्र से बढ़के कोई कहानी नही।।

इश्क की दास्ताँ यह,छुपानी नही ।।



रूठ कर आप ने ही तो रुसवा किया।

आप ने ही मेरी बात मानी नही।।



शोर-ओ- गुल मे बसर हो गई जिंदगी ।

यूं लगे हम ने पाई जवानी नही।।



उम्र का हर तजुर्बा गरल दे रहा ।

इतना जहरीला अश्को का पानी नही ।।



जानलेवा रहा जिंदगी का सफ़र ।

हर कदम मौत है जिंदगानी… Continue

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 7, 2017 at 8:00am — 10 Comments

ग़ज़ल अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी

वज़्न - 2122 1122 1122 22/112



अब्रे जहराब से बरसा है ये कैसा पानी ।

भर गया मुल्क की आँखों में हया का पानी ।।



मिट ही जाए न कहीं शाख जे एन यू की अब ।

आइये साफ़ करें मिल के ये गन्दा पानी।।



मन्नतें उन की हैं हो जाएं वतन के टुकड़े ।

सर के ऊपर से निकल जाए न खारा पानी ।।



कुछ हैं जयचन्द सुख़नवर जो खुशामद में लगे ।

बेच बैठे हैं जो इमानो कलम का पानी ।।



आलिमों का है ये तालीम ख़ता कौन कहे ।

ख़ास साजिश के तहत हद से गुजारा पानी… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on March 6, 2017 at 10:30pm — 8 Comments

लौकी (लघुकथा)

‘‘ अरे, सेठजी ! नमस्कार। अच्छा हुआ आप यहीं सब्जी बाजार में मिल गए, मैं तो आपके ही घर जा रहा था। समाचार यह है कि महाराज जी पधारे हैं, उनका कहना है कि इस एरिया में अहिंसा मंदिर का निर्माण कराना है जिसमें आपका सहयोग... ..।‘‘

‘‘ जी बिलकुल ! मेरी ओर से ग्यारह हजार , शाम को आपके पास पहुॅंचा दूॅंगा।‘‘

यह सुनकर, सब्जी का थैला टाॅंगे सेठजी के शिष्यनुमा नौकर से न रहा गया वह बोला,

‘‘सेठजी ! अभी आपने सब्जी की दूकान पर लौकी लेते समय लम्बी बहस के बाद, पूरे बाजार में बीस रुपये प्रति किलो…

Continue

Added by Dr T R Sukul on March 6, 2017 at 10:00pm — 12 Comments

क्षितिज (कविता )

ढूंढ रहा है आज क्षितिज तुम्हें

हाँ वही जो परेशान तुम्हें किया करता था

तुम्हें प्यार करते देख किसीको

अपने आँसूं बहाया करता था



नदी किनारे से अक़्सर देखा करता था

देख कर तुमको वो मुस्कुरा देता था

बादलों से शरारत करने को कहता था

फिर उनमें अपने को छिपा लेता था ।



तुम फिर उसकी तलाश में खो जाती थीं

अटखेलियां करते हुए बादलों से

जब उसका तुम पता पूछा करती थीं

चुपके से वो आड़ से तुम्हें देख लेता था ।



हो तुम दीवानी उसकी जानता है जग… Continue

Added by KALPANA BHATT ('रौनक़') on March 6, 2017 at 7:06pm — 6 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
दुर्मिल सवैया ‘फाग बयार’

११२  ११२  ११२  ११२  ११२  ११२  ११२  ११२

भँवरे कलियाँ तरु  झूम उठें जब फाग बयार करे बतियाँ|

दिन रैन कहाँ फिर चैन पड़े कतरा- कतरा कटती रतियाँ|

कविता, वनिता, सविता, सरिता ढक के मुखड़ा छुपती फिरती|

जब रंग अबीर लिए कर में निकले किसना धड़के छतियाँ|…

Continue

Added by rajesh kumari on March 6, 2017 at 3:19pm — 18 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
हिस्सेदारी आज हमारी बिल्कुल सेम टु सेम .....अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष /डॉ० प्राची

नया रंग, तस्वीर नयी है, आज नया है फ़्रेम

हिस्सेदारी आज हमारी बिल्कुल सेम टु सेम



बड़े-बड़े कामों को झटपट देती हूँ अंजाम

अपनी क़ाबिलियत से मैं छूती हूँ नये मुक़ाम,

सैटेलाइट लाउंचिंग हो या हो अंतरिक्ष अभियान

फ़ाइटर जैट पायलट हो या हो दंगल का मैदान,



जीवन के हर इक पहलू में आज कमाया नेम

हिस्सेदारी...



मैं सूरज से आँख मिला कर जब करती हूँ बात

हर डर को, हर बंधन को तब-तब देती हूँ मात,

जब आवाज़ उठा कर पाया ख़ुद अपना सम्मान

सच्ची… Continue

Added by Dr.Prachi Singh on March 6, 2017 at 12:21pm — 9 Comments

पर्दा(लघुकथा)राहिला

मंदिर के पीछे मिले लावारिस नवजात शिशु को लेकर आज पंचायत जुटी थी। पंचायत ने अपने स्तर से बहुत पड़ताल की, परन्तु कोई सुराग हाथ नहीं लगा। कोई कह रहा था, ‘छोरी तो बहुतेरी मिलीं लावारिस, लेकिन आज ये छोरा?’ किसी ने कहा, ‘ खूब जान पड़ता है, जरूर नाजायज रहा होगा।’ जितने मुँह उतनी बातें। अब पंचायत चाहती थी कि यदि कोई दम्पति बच्चे को गोद लेना चाहे तो मामला यहीं निपट जाए। वर्ना बच्चा पुलिस को तो सौंपना ही था।

"सरपंच जी ! मैं और मेरी घरवाली यशोदा इस बच्चे को गोद लेना चाहे हैं।"

पंचों को प्रणाम… Continue

Added by Rahila on March 6, 2017 at 12:18pm — 5 Comments

उसकी ज़रूरत (लघुकथा)

उसके मन में चल रहा अंतर्द्वंद चेहरे पर सहज ही परिलक्षित हो रहा था। वह अपनी पत्नी के बारे में सोच रहा था, “चार साल हो गए इसकी बीमारी को, अब तो दर्द का अहसास मुझे भी होने लगा है, इसकी हर चीख मेरे गले से निकली लगती है।“

 

और उसने मुट्ठी भींच कर दीवार पर दे मारी, लेकिन अगले ही क्षण हाथ खींच लिया। कुछ मिनटों पहले ही पत्नी की आँख लगी थी, वह उसे जगाना नहीं चाहता था। वह वहीँ ज़मीन पर बैठ गया और फिर सोचने लगा, “सारे इलाज कर लिये, बीमारी बढती जा रही है, क्यों न इसे इस दर्द से हमेशा के लिए…

Continue

Added by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on March 6, 2017 at 11:00am — 6 Comments

आँसू बहते आँख से

आँसू बहते आँख से, कौन जुगत हो बंद ?

जहाँ कुशल नलसाज के, असफल सारे फंद।  

असफल सारे फंद, काम ना कोई आये।    

केवल साँचा मीत, उसे तब कर दिखलाये।।    

सत्य जगत में मीत, वही कहलाता धाँसू।     

कर देता जो बंद, आँख से  बहते आँसू।।     

 

-    मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Satyanarayan Singh on March 5, 2017 at 8:00pm — 8 Comments

हिन्दी गीतिका...​साँसों का तरपन कर दूँ

22 22 22 22 22 22 22

रम जाओ अंतस में जीवन मधुरम चन्दन कर दूँ

जो तुम झाँको आँखों में आँखों को दरपन कर दूँ



तुम बिन जीवन मिथ्या है साँसों का आना जाना

बस जाओ मम साँसों में साँसों को अरपन कर दूँ



कल देखा था ख्वाबों में दुल्हन सी तुम मुस्काईं

पलकों में आ बस जाओ सपनों का तरपन कर दूँ



प्यासी धरती प्यासा अम्बर प्यासा है उर आँगन

छा जाओ बन के बदली मरुथल को मधुबन कर दूँ



​​पलकों में आकुल आँसू बहने को व्याकुल आँसू

बन साथी झरते आँसू पतझर… Continue

Added by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 5, 2017 at 7:34pm — 8 Comments

ग़ज़ल (हसीनों में मुहब्बत ढूंढता है )

(मफ़ाईलुन-मफ़ाईलुन-फऊलॅन)

हसीनों में मुहब्बत ढूंढता है |

ज़मीं पर कोई जन्नत ढूंढता है |

दगा फ़ितरत हसीनों की है लेकिन

कोई इन में मुरव्वत ढूंढता है |

समुंदर से भी गहरी हैं वो आँखें

जहाँ तू अपनी चाहत ढूंढता है |

मिलेगा तुझको असली लुत्फ़ गम में

फरह में क्यूँ लताफत ढूंढता है |

हैं काग़ज़ के मगर हैं खूबसूरत

तू जिन फूलों में नकहत ढूंढता है |

सियासी लोग होते हैं…

Continue

Added by Tasdiq Ahmed Khan on March 4, 2017 at 9:00pm — 10 Comments

कभी न होगी यहाँ नाभिकीय वार की बात (ग़ज़ल)

बह्र 1212 1122 1212 1121/112



अगर सभी के दिलो में हो सिर्फ प्यार की बात

नही कठिन है मिटाना जहाँ से खार की बात



हिरोशिमा से सबक लें सभी जो मुल्क अगर

कभी न होगी यहाँ नाभिकीय वार की बात



जुबाँ कभी मेरी खाली न जाये इसलिए तो

कभी किसी से न की भूलकर उधार की बात



हुआ चलन जो मो'बाइल का हर जगह गोया

कि अब नही यहाँ होंगी किसी से तार की बात



दिखा न आँख हमे इस कदर समझ बुजदिल

हैं शेर हम नही करते कभी सियार की बात



दिखा रही है… Continue

Added by नाथ सोनांचली on March 4, 2017 at 3:30pm — 16 Comments

ग़ज़ल-नूर की -क्या है ज़िन्दगी,

२१२२,२१२२, २१२२, २१२ 

.

सोचने लगता हूँ अक्सर मैं कि क्या है ज़िन्दगी,

आग पानी आसमां धरती हवा है ज़िन्दगी.

.

मौत जो मंज़िल है उसका रास्ता है ज़िन्दगी,

या कि अपने ही गुनाहों की सज़ा है ज़िन्दगी.

.

बिन तुम्हारे इक मुसलसल हादसा है ज़िन्दगी,

सच कहूँ! ज़िन्दा हूँ लेकिन बेमज़ा है ज़िन्दगी.

.

ज़िन्दगी की हर अलामत यूँ तो आती है नज़र,

शोर है शहरों में फिर भी लापता है ज़िन्दगी.

.…

Continue

Added by Nilesh Shevgaonkar on March 4, 2017 at 2:37pm — 10 Comments

दिल्ली दूर है(लघुकथा)राहिला

एक बेहद पिछड़े ,सुविधाओं से कोसो दूर गाँव में अचानक कुपोषण से हुयी बच्चों की अकाल मृत्यु ने प्रशासन को गहरी नींद से जगा दिया। और इस दिशा में चल रही तमाम योजनाओं की जैसे कलई खुल गयी।आननफानन में शहर से चिकित्सकों का दल नाक मूँदे वहां पंहुचा । कई नये चिकित्सकों का तो ऐसे गाँव से ये पहला परिचय था।सब चौपाल पर इकठ्ठे हो चुके थे।

"देखिये!आप सबसे पहले ये जान लें कि कुपोषण की मुख्य वजह क्या हैं?जिसके चलते यह दुखद घटना हुयी है।"एक नई महिला चिकित्सक धारा प्रवाह बोलते हुए ,टंगे बड़े से पोस्टर पर लिखी… Continue

Added by Rahila on March 4, 2017 at 11:38am — 9 Comments

अपूर्ण रह जाती है मेरी हर रचना -आशुतोष

अपनी जाई

गोद में खिलाई

लाडली सी बिटिया

जो कभी फूल

तो कभी चाँद नजर आती है/

जिसके लिए पिता का पितृत्व

और माँ की ममता

पलकें बिछाते हैं;

किन्तु उसी लाडली के

यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही,

उसके सुखी जीवन की कामना में जब

उसके हमसफ़र की तलाश की जाती है/

तब उसके चाल चलन

उसकी बोली , उसकी शिक्षा

रंग रूप , कद काठी

सब कुछ जांची परखी जाती है .....

किसी की नजर तलाशती है

उसमे काम की क्षमता

कोई ढूंढता है… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 4, 2017 at 11:33am — 9 Comments

छोटे पेट वाले (लघुकथा) /शेख़ शहज़ाद उस्मानी

बेटे के ही नहीं, बिटिया के भी अरमान पूरे करने थे। बच्चों की ज़िद पर गांव से अपना अनचाहा, लेकिन बच्चों व पत्नी का मनचाहा पलायन कर तो लिया था, लेकिन शहर की न तो आबो-हवा रास आ रही थी, न ही शहर वालों के आचरण और कटाक्ष वगैरह! किसी तरह किराए के कमरे में बच्चों के साथ ठहरे हुए थे। सुबह चार बजे उन्हें पढ़ने के लिए जगाकर आज साइकल उठायी और चल पड़े लाखन बाबू किसी मन चाही तलाश में। कुछ किलोमीटर दूर जाकर एक लम्बी सी साँस लेकर बड़बड़ाने लगे "हे भगवान, आज साँस लेना अच्छा लग रहा है इस हरियाली में! अच्छा हुआ कि… Continue

Added by Sheikh Shahzad Usmani on March 3, 2017 at 7:50pm — 9 Comments

दर्द के निशाँ ....

दर्द के निशाँ ....

दर

खुला रहा

तमाम शब

किसी के

इंतज़ार में

पलकें

खुली रहीं

तमाम शब्

किसी के

इंतज़ार में

कान

बैचैन रहे

तमाम शब्

तारीकियों में ग़ुम

किसी की

आहटों के

इंतज़ार में

शब्

करती रही

इंतज़ार

तमाम शब्

वस्ले-सहर का

मगर

वाह रे ऊपर वाले

वस्ल से पहले ही

तू

ज़ीस्त को

इंतज़ार का हासिल

बता देता है

मंज़िल से पहले…

Continue

Added by Sushil Sarna on March 3, 2017 at 1:39pm — 6 Comments

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है

2122 2122 2122 212



पग सियासी आँच पर मधु भी जहर होने को है।

बच गया ईमान जो कुछ दर-ब-दर होने को है।।



मुफलिसों को छोड़कर गायों गधों पर आ गई।

यह सियासत आप पर हम पर कहर होने को है।।



उड़ रहा है जो हकीकत की धरा को छोड़ कर।

बेखबर वो जल्द ही अब बाखबर होने को है।।



वो जो बल खा के चलें इतरा के घूमें कू-ब-कू।

खत्म उनके हुस्न की भी दोपहर होने को है।।



जुल्म से घबरा के थक के हार के बैठो न तुम।

"हो भयावह रात कितनी भी सहर होने…

Continue

Added by आशीष यादव on March 3, 2017 at 12:00pm — 18 Comments

मैंने तन्हाई को भी पाला है। गजल

बह्र:- 2122-1212-22

जिसके तलवे में निकला छाला है।।
घर उसी हौसले ने पाला है।।।

पहले टूटा तिरा वही रिश्ता।
नौ महीने जिसे सभाला है।।

बाद मुद्दत के आज लौटी हो।
मौत कितना तुम्हे खंगाला है।।

मुश्क!.. ये ऐतबार देती है।
दिल नही जी जेहन भीआला है।।

साथ मेरे ही लौट आती है।
मैंने तन्हाई को भी पाला है।।

अप्रकाशित/ मौलिक
आमोद बिन्दौरी

Added by amod shrivastav (bindouri) on March 3, 2017 at 9:30am — 8 Comments

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