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सर्जिकल अटैक--

चिरौंजीलाल बड़े पेशोपेश में थे, एक बार तो उनको लगा कि उनकी लुगाई ने बात बस यूँ ही कह दी, शायद बिना ज्यादा कुछ सोचे ही| लेकिन जब उन्होंने गौर से सोचा तो चेहरे पर चिंता की लकीरें दौड़ गईं कि भला मजाक में भी कोई ऐसा कहता है|

हफ़्तों क्या महीनों से ही घर में चर्चा चल रही थी और उनको बार बार याद दिलाया जा रहा था| वह एक कान से सुनते और दूसरे से निकाल देते, आखिर शादी के १५ वर्षों में इतना तो उन्होंने सीख ही लिया था| जब उनको लगता कि लुगाई समझ रही है कि वह अनसुना कर रहे हैं तो हाँ हूँ भी कह देते|…

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Added by विनय कुमार on October 20, 2016 at 6:23pm — 4 Comments

ग़ज़ल-लिए दर्द दिल में पुराने चला हूँ-रामबली गुप्ता

वह्र-122 122 122 122



लिए दर्द दिल में पुराने चला हूँ

गमे इश्क के गीत गाने चला हूँ



जहाँ पल खुशी के बिताये थे तुम सँग

वहीं आज आँसू बहाने चला हूँ



बयाँ हाले' दिल भी करूँ क्या किसी से

मैं' सब खुद से' ही अब छिपाने चला हूँ



थी ये जिंदगी आप ही की ऐ' साहिब

उसे आप ही पे लुटाने चला हूँ



मुबारक तुम्हें चाँद सूरज सितारे

अँधेरों को' मैं आजमाने चला हूँ



खुली आँख का ख्वाब था प्यार तेरा

यकीं आज दिल को दिलाने चला… Continue

Added by रामबली गुप्ता on October 20, 2016 at 11:00am — 15 Comments


सदस्य कार्यकारिणी
ग़ज़ल - ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी ( गिरिराज भंडारी )

2122    1122    1122    22

बात सरहद पे अगर अब भी पुरानी होगी

तब दिलों मे हमें दीवार उठानी होगी

 

हर कहानी में हक़ीकत भी ज़रा होती है

ये हक़ीकत भी किसी रोज़ कहानी होगी

 

हाथ जिनके भी बग़ावत पे उतर आये हों

पैर में उनके भला कैसे रवानी होगी

 

सभ्य लोगों में असभ्यों की तरह बात तो कर

ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी

 

अपने अजदाद कभी राम-किसन-गौतम थे 

देखना घर मे बची कुछ तो निशानी होगी

 

रंग…

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Added by गिरिराज भंडारी on October 20, 2016 at 8:10am — 19 Comments


सदस्य टीम प्रबंधन
ग़ज़ल - तभी बन्दर यहाँ के चिढ़ गये हैं // --सौरभ

१२२२  १२२२ १२२

इन आँखों में जो सपने रह गये हैं

बहुत ज़िद्दी, मगर ग़मख़ोर-से हैं



अमावस को कहेंगे आप भी क्या

अगर सम्मान में दीपक जले हैं



अँधेरों से भरी धारावियों में

कहें किससे ये मौसम दीप के हैं



प्रजातंत्री-गणित के सूत्र सारे

अमीरों के बनाये क़ायदे हैं



उन्हें शुभ-शुभ कहा चिडिया ने फिर से

तभी बन्दर यहाँ के चिढ़ गये हैं



उमस बेसाख़्ता हो, बंद कमरे-

कई लोगों को फिर भी जँच रहे हैं …



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Added by Saurabh Pandey on October 20, 2016 at 4:00am — 26 Comments

मकबरा

भीतर पुराने धूल-सने मकबरे में

धुआँते, भूलभुलियों-से कमरे

अनुभूत भीषण एकान्त

विद्रोही भाव

जब सूझ नहीं कुछ पड़ता है

कुछ है जो घूमघाम कर बार-बार

नव-आविष्कृत बहाने लिए

अमुक स्थिति को ठेल…

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Added by vijay nikore on October 19, 2016 at 11:00pm — 14 Comments

ग़ज़ल - ये जिंदगी है यहाँ इम्तहान और भी हैं

1212 1122 1212 112



हमारे जख़्म के गहरे निशान और भी हैं ।

ये जिंदगी है यहाँ इम्तहान और भी हैं ।।



न रोक आज परिंदों की आजमाइश को ।

फ़ना के बाद कई आसमान और भी हैं ।।



समझ सको तो मेरी बात मान लो वरना ।

मेरी किताब में लिक्खी जुबान और भी हैं ।।



जरा सँभल के चलो ये मुकाम ठीक नही ।

यहां तो लोग भी रखते इमान और भी हैं ।।



न जाइयेगा कभी इश्क के समन्दर में ।

वहाँ तो दर्द के बढ़ते उफान और भी हैं ।।



जो हुक्मरां है उसे… Continue

Added by Naveen Mani Tripathi on October 19, 2016 at 2:00pm — 4 Comments

माँ ...

माँ ...

दर्द का
मंथन हुआ तो
एक सागर
बूँद बन
लहद पर
ऐसा गिरा
कि
गर्म लावे से पिघल

माँ
लहद से बाहर
आ गयी
ले के दर्द बेटे का
फिर
लहद में
समा गयी

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 19, 2016 at 1:00pm — 4 Comments

जनकवि (लघुकथा)

झील ने कवि से पूछा, “तुम भी मेरी तरह अपना स्तर क्यूँ बनाये रखना चाहते हो? मेरी तो मज़बूरी है, मुझे ऊँचाइयों ने कैद कर रखा है इसलिए मैं बह नहीं सकती। तुम्हारी क्या मज़बूरी है?”

कवि को झटका लगा। उसे ऊँचाइयों ने कैद तो नहीं कर रखा था पर उसे ऊँचाइयों की आदत हो गई थी। तभी तो आजकल उसे अपनी कविताओं में ठहरे पानी जैसी बदबू आने लगी थी। कुछ क्षण बाद कवि ने झील से पूछा, “पर अपना स्तर गिराकर नीचे बहने में क्या लाभ है। इससे तो अच्छा है कि यही स्तर बनाये रखा जाय।”

झील बोली,…

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Added by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on October 19, 2016 at 10:04am — 22 Comments

हिंदी गजल/गीतिका(टूटता रहता घरौंदा...)

#गीतिका#

***

टूटता रहता घरौंदा फिर बनाना चाहिये

जोड़कर कड़ियाँ जरा-सा गीत गाना चाहिये।1



जिंदगी से दर्द का बंधन बड़ा मशहूर है

जब समय थोड़ा मिले तो मुस्कुराना चाहिये।2



तीर ये कबके सँजोये चल रहे हैं आजतक

बात पहले की भुला नजदीक आना चाहिये।3



आदमी को आदमी के दर्द का अहसास हो

बस हवा ऐसी बहा गंगा नहाना चाहिये।4



मिल रहीं नजरें यहाँ परवान पन चढ़ता नहीं

आपके दिल में जरा मुझको ठिकाना चाहिये।5



फूल छितराये नहीं ऐसी करूँ… Continue

Added by Manan Kumar singh on October 18, 2016 at 8:00pm — 8 Comments

अल्लाह जानता है (लघुकथा)/शेख़ शहज़ाद उस्मानी

अस्पताल में आई. सी. यू. में भर्ती बेगम साहिबा को अपने जीवन के अंतिम पलों का अहसास होने लगा था । लेकिन मज़ाकिया स्वभाव के ज़िंदा दिल मिर्ज़ा साहब उनका हौसला बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे।

"अब तो जा रहीं हूँ जनाब, अपना ख़्याल रखियेगा, ऐसे ही ख़ुशमिज़ाज बने रहियेगा!" बेगम ने मिर्ज़ा जी की हथेली थामते हुए कहा।

"पगली, ये भी कोई मज़ाक का वक़्त है, लोग 'करवा चौथ' मना रहे हैं आज और तू जाने की बात सोच रही है, ऐं!" मिर्ज़ा जी ने उनके माथे पर बोसा देते हुए कहा।

"मैं कहती थी न कि मैं तुम्हारे…

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Added by Sheikh Shahzad Usmani on October 18, 2016 at 7:00pm — 7 Comments

देखा देखी--

पूरा दिन धूप में गुजर गया रग्घू का, लेकिन आज ठीक ठाक दिहाड़ी मिल गई थी उसको| आजकल मौसम कुछ बदल सा गया है, इस समय तो ठण्ड शुरू हो जाती थी और काम करने में दिक्कत नहीं होती थी, रग्घू सोचते हुए घर की तरफ चला| ठेला चलाना वैसे तो काफी श्रमसाध्य होता है, लेकिन जब घर पर पत्नी और बच्चे इंतज़ार में हों तो कोई और रास्ता भी नहीं बचता| मंडी के पास से गुजरते हुए उसकी नज़र किनारे बैठे एक बुढ़िया पर पड़ी जो केले बेच रही थी| केले पिलपिले और काले हो गए थे लेकिन काफी सस्ते मिले तो उसने एक दर्जन खरीद लिए|…

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Added by विनय कुमार on October 18, 2016 at 4:24pm — 4 Comments

वामा ( लघुकथा)

"आज तो इसकी सारी फरमाइशें पूरी कर दूंगा",सोई पत्नी के चेहरे पर स्नेहिल दृष्टि डालते हुए जैसे उसने स्वयं को याद दिलाया।



सोती हुई स्त्री के चेहरे पर बीते दिन की उदासी अब भी दिख रही थी। पलकें घण्टों रोते रहने से अब भी सूजी हुई थीं। आंसुओं के साथ बह गए काजल ने गाल पर धब्बे छोड़ दिए थे। सोई हुई पत्नी उसे बहुत सुंदर लग रही थी। जाने कितने दिन बाद उसका चेहरा इतने गौर से देखा था। वो और भी निहारता पर उसने कुलबुलाकर सिर थोड़ा और घुमा लिया और बिना आँख खोले फिर सो गई।



"कौन कहेगा ये दो… Continue

Added by Seema Singh on October 18, 2016 at 1:48pm — 4 Comments

लम्हा ...

लम्हा ...

ख़ामोश था
मैं जब तलक
हर तरफ़
इक शोर था

खोली जुबाँ
जो मैंने ज़रा
तो
हर शोर
ख़ामोश हो गया

इक लम्हा
ज़लज़ले में सो गया
इक लम्हा
ज़लज़ला हो गया

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Added by Sushil Sarna on October 18, 2016 at 1:44pm — 4 Comments

ईमानदारी (लघु कथा)

एक ही क्लास में पढ़े हुएI साथ साथ रहते बड़े हुएI मेरे दोस्त ने बेईमानी का रास्ता चुना और नजदीक के शहर में रहते हुए राजनेता बना और में ईमानदारी से गरीबी से लड़ते हुए टीचर बनाI लेकिन दोस्त की अच्छी बात ये रही की वो आज भी मुझसे बातें करता हैI और हर संभव मदद भी करता हैI और अपने शहर में आने का न्योता भी देता हैI आज उन से मिलने का प्लान बना लियाI बजाज का स्कूटर को बीस पच्चीस किक मारकर गर्म किया और अपनी भाग्यवान से धक्का मरवा कर चालू कियाI जैसे ही दोस्त के शहर पंहुचाI एक चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस ने…

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Added by harikishan ojha on October 18, 2016 at 10:43am — 2 Comments

पहल (लघुकथा)

निशा अपने सात साल के बेटे के साथ दिवाली की खरीदारी करके घर वापिस आ रही थी। रस्ते में कुछ बच्चे पटाखे जला रहे थे। सारे वातावरण में बारूद की गंध और धुँआ फैला हुआ था। अचानक उसके बेटे को तेज खाँसी शुरू हो गई और इतनी बढ़ गई कि वह बेहोश हो गया। लोगों ने मदद करके उनको जल्दी से हस्पताल पहुँचाया। थोड़ी देर बाद वह सामान्‍य हो गया।

"डॉक्टर साहब, मेरे बेटे को क्या हुआ था? चिंता की बात तो नहीं है ना?"- निशा ने घबराते हुए पूछा।

"हाँ, यह अब ठीक है, लेकिन चिंता की बात तो है। इसे साँस…

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Added by विनोद खनगवाल on October 18, 2016 at 10:43am — 3 Comments

शत्रु ना छू पाय सीमा दोस्तों (ग़ज़ल)

२१२२ २१२२ २१२

शत्रु ना छू पाय सीमा दोस्तों
सावधानी का ज़माना दोस्तों |
वीर हो बलवान हो तुम पासबाँ
हो बुलंदी पर तिरंगा दोस्तों |
शूरवीरों पर ही आश्रित भारती
शिर न झुकने पाय इसका दोस्तों |
माज़रा सरहद पे उलझा है बहुत
साथ मिलकर ठान लेना दोस्तों |
प्राण से प्यारा हमें कश्मीर है
हाथ से जाने न देना दोस्तों |

मौलिक /अप्रकाशित

Added by Kalipad Prasad Mandal on October 18, 2016 at 10:30am — 8 Comments

जिन्दगी है जो सफर राह पे चलते रहिये

तरही गजल

बह्र* - 2122 1122 1122 22



जिन्दगी है जो सफर राह पे चलते रहिये,

वक्त के साथ भी अंदाज बदलते रहिये।



माँ पिता और हैं उस्ताद धरा पर जिनकी

नेह और ज्ञान की छाया में ही पलते रहिये।।



रिश्ते होते है सदा चाक की मिट्टी जैसे

आप चाहेंगे उसी रूप में ढलते रहिये।।



शह्र है एक अमन का, वो बनारस मेरा

प्यार सुख चैन जिधर चाहे निकलते रहिये।।



परवरिश में तो है अत्फ़ाल पे सख़्ती लाज़िम,

आँख में देख के आंसू न पिघलते… Continue

Added by नाथ सोनांचली on October 18, 2016 at 4:46am — 2 Comments

अनबोले लम्स ....

अनबोले लम्स ....

आज मेरे

दिल के आईने में

मुझे

तुम नज़र आये थे

तन्हाई थी

मैं थी

और

तुम थे

अपने लम्स के साथ

मेरे ज़िस्म पर

बे-आवाज़

हौले हौले

रेंगते हुए

मेरी

हर

न को

तुम कुचलते रहे

खामोशियाँ

सरगोशियां करती रहीं

लौ भी

कहीं तारीक में

खो गयी

बस

शेष रही

मैं

और

मेरे ज़िस्म के

हर मोड़ पर

तुम्हारे…

Continue

Added by Sushil Sarna on October 17, 2016 at 7:51pm — 2 Comments

ज़लज़ला /सुरेश कुमार ' कल्याण '

छब्बीस जनवरी

दो हजार एक

भारत का

बावनवां गणतंत्र दिवस

खुशियां थी अपार

सारी खुशियाँ

एक झटके से

बह गई ।



दिन चढ़ते ही

शुरू हुआ

विनाश का तांडव

अटारियाँ सारी

एक झटके से ढह गई ।



लील गया

हजारों जिंदगियां

लाखों घर

हुए नेस्तनाबूत।



गुजरात प्रांत

इक्कीस जिले

जलजले से

सारे हिले।

लाखों लोग

बेघर हो गए।



गांव के गांव

शहर के शहर

मिट्टी में मिल गए

जमींदोज हो… Continue

Added by सुरेश कुमार 'कल्याण' on October 17, 2016 at 7:46pm — 4 Comments

जनाज़ा(लघुकथा)राहिला

"सर!ये भागवती हत्याकांड के कई पहलू सामने आ रहे है।"

"जैसे कि?"फिर कुछ सोचकर 

"ये वही सरकारी स्वास्थ्य कर्मचारी वाली घटना की बात कर रहे हो?जिसकी उसी के कार्यालय में गांव के किसी दबंग ने कुल्हाड़ी मारकर हत्या कर दी है।"

हाँ ,हाँ..!वही।दरअसल जितने मुंह उतनी बातें है सर! छोटा सा गांव है जहाँ मृतका पदस्थ थी।कुछ का कहना ये है, कि उच्च जाति का होने के कारण हत्यारे को  दलित महिला का अपनी बराबरी से बैठना नहीं सुहाता था ।"

"तो क्या वो भी कर्मचारी था? "

"जी,और मृतका के…

Continue

Added by Rahila on October 17, 2016 at 4:00pm — 7 Comments

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